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खोखली नींव
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खोखली नींव (छह)
ISBN: 345

 

 
टिक्-टिकृ-टिकृ-टिक्-टिक्-टिक्
 
घड़ी सदा ये आवाज करती रहती है। समय सदा आगे बढ़ता रहता है। कभी थकता नहीं, नहीं ठहरता नहीं । इसकी कोई मंजिल नहीं। एक खानाबदोष-सभी है ये ! इसका लक्ष्य चलना हे।
 
समय चक्र सदा घूमता रहता है। घड़ी सदा टिक्-टिक् करती रहती है ! दिन आता है, चला जाता है। मौसम आते हैं, अपनी, छटा का प्रदर्षन करते हैं और फिर चले जाते हैं !
 
समय-चक्र गतिषील है !
 
ऋतु-चक्र उसका साथी है !
 
परीक्षा समाप्त हो चुकी थी। आनन्द भरा मौसम था अब। किसी को कोई काम नहीं था। सुदर्षन और उसके साथी दिनभर आवारागर्दी करते, सिगरेटें, फूंकते, जुआ खेलते। रात के समय किसी रेस्तरां में जाकर षराब पी लेते। बगुला-भगत बने घर लौटते, किसी को षक् न होता !
 
अर्पल का पहीना था। सबने दिल्ली से दूर जाने की सलाह बनाई।
 
मगर कहां ?
 
किसी पहाड़ी प्रदेष श्रीनगर, मसूरी, षिमला नहीं, बल्कि बम्बई जाने की ! बम्बई देखने की बड़ी चाह थी उनको ! बम्बई को वो स्वर्ग से बड़ कर समझते थे !
 
सबने अपने घरवानों को किसी-न-किसी तरह मना लिया और जाने की तैयारी करने लगे। रेलगाड़ी की सीटें सुरक्षित करवा ली गई। जेब खर्च के लिए उन्हें घर से तो रूप्या मिला ही, साथ ही जिस-जिस का बैंक के खाते में अच्छा-खासा रूप्या जमा था, वो भी सारा सबने निकलवा लिया। मां-बाप ने यह सोच कर कि भविष्य में बेटे का भला होगा, रूप्या बैंक में जमा करवाया था। और ये बेटे रंगरलियां मनाने के लिए उस पेैसे को निकलवा ले गए थे। षायद इससे उनके भविष्य का निर्माण होना था। हां, निमार्ण तो होगा ही, मगर सुंदर सुखमय भविष्य का नहीं, अमितु उनके नाष के पुतले का !
 
रेलगाड़ी रात दस बजे रवाना होनी थी। ठीक साड़े आठ बजे सब स्टेषन पहंच गए। जाने वाले चार थे, सुदर्षन, गरजीत, सुरेन्द्र और विजय।
 
रेलवे-स्टेषन पर काफी कोलाहल था। मुसाफिरखाना मुसाफिरों से खचाखच भरा हुआ था। टिकटघर के आगे एक लम्बा बरामदा था। उस पर भी कई यात्री अपने सामान के साथ बैठे अथवा लेटे हुए थे। भड़ी को चीरते हुए ये प्लेटफार्म मे प्रवेष कर गए। अभी गाड़ी आने में एक घंटे की देरी थी। सारे सामान को एक जगह रखकर चारों एक बेंच पर बैठ गए और सिगरेट् पीते हुए गप्पे माने लगे।
 
ठीक साढें़ नौ बजे गाड़ी प्लेटफार्म पर आ गई। कुछ नए डिब्बे उसके साथ जाड़े दिये गए। अपना डिब्बा ढूंढने में उन्हें कुछ देर न लगी।
 
गार्ड की सीटी बजने के कुछ क्षण पष्चात गाडी ने भाप छोड़ी और धीमी गति से प्लेटफार्म पीछे छोड़ने लगी। धीरे-धीरे स्टेषन का कोलाहल दूर हो गया, और कुछ मिनटों पष्चात षहर का भी। अब गाड़ी अपनी पूरी रफतार पकड़ चुकी थी।
 
अब मन हर प्रकार के भय से दूर था। चारों बातें करते हुए षराब पीने लगे। थीेड़ी ही देर में वो पूरी बोतल खाली कर चुके थे। चारों को झपकिया अपने लगी। लेट गए। थोड़ी ही देर में सो चुके थे।
 
रेलगाड़ी निरंतर अपनी गति से आगे बड़ती जा रही थी। वो चारों हर बात से बेखबर पड़े थे। रात को अंधेरा धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा था। भोर हो गई। चारों जाग गए। नित्य कर्म में लीन हो गए।
 
अगले स्टेषन पर गाड़ी रूकी तो उन्होंने नाषता किया। पंद्रह मिनट के पष्चात गाड़ी फिर से चल पड़ी।
 
‘‘अब ?’’
 
सुदर्षन ने तीनों की ओर देखा।
 
‘‘पते लगाते हैं !’’
 
गुरजीत आषय समझ कर बोला।
 
‘‘हां, फलैष चलेगी !’’
 
सुरेंद्र ने समर्थन किया।
 
‘चलो फिर, निकालो ताष !’’ सुदर्षन ने कहा।
 
तभी विजय उठते हुए बोला ‘‘भाई, तुम लोग खेला। मैं तो प्रकृति की सुंदरता देखूंगा !’’
 
‘‘लाला ! ये कंजूसी कब से ?’’
 
सुदर्षन ने मुंह में सिगरेट दबाए पूछा !
 
‘‘अरे भाई ! लम्बा सफर है। हार गए तो कबाड़ा हो जाएगा। वैसे मेरा मूड भी नहीं हैं !’’ विजय यह कहकर खिड़की के समीप चला आया और बैठ कर बाहर के दृष्यों को निहारने लगा।
 
हरे-भरे, लहलहाते खेज मीलों दूर तक बिखरे पड़े थे। कहीं-किसान हल जोत रहे थे। गाड़ी में बैठे विजय को यंू लग रहा था कि वो खेत दौड़ रहे हैं। एकाएक खेतों का क्रम समाप्त हो गया। कब्रिस्तान का दृष्य देखते ही विजय चौंक पड़ा। बहुत बड़ा कब्रिस्तान था वो। हजारों कब्रें थी ! हां ! मानव के अस्तित्व को यहा दफनाया जाता है ! ओह ! दर्द नहीं होता होगा क्या ? दम नहीं घुटता होगा क्या ? विजय अजीब बातें सोचने लगा। तभी उसे एक कब्र के पास संुदर लड़की खड़ी दिखाई दी। क्षण पष्चात वो पीछे रह गई गाड़ी आगे बड़ चुकी थी। खेतों का क्रम फिर से षुरू हो गया था। मगर विजय की आंखों के सामने वही दृष्य तैर रहे थे, कब्रिस्तान, कब्रें, लड़की ! वो कल्पनालोक में विचरने लगा। वो लड़की उसकी प्रेमिका है, काल का ग्रास बन जाती हे। विजय उसकी मृत-देह को उठाए उस कब्रिस्तान में जाता है। कब्रों की सख्ंया ‘एक’ बढ़ जाती है। विजय प्रतिदिन अपनी प्रेमिका की कब्र पर दीप जलाने आता है। प्रेम और दीपक !
 
विजय ने एक कविता बना ली। उसे लिखने लगा। सुदर्षन ने उसे ऐसा करते देख लिया। विजय ने लिखना समाप्त किया तो वो बोला ‘‘क्या लिख रहे थे !’’
 
‘‘कविता !’’
 
‘‘दिखाओ जरा !’’
 
‘‘क्यों ?’’
 
‘‘पढूंगा !’’
 
‘‘क्या करोगे पढ़ कर ?’’
 
‘‘अचार डालूंगा !’’
 
सुदर्षन ने खीझ कर कहा।
 
विजय हंस पडा। दो क्षण चुप्पी रही। सुदर्षन, सुरेन्द्र, गुरजीत ताष खेलते रहे। सुदर्षन जल्द ही उब गया। पतों को एक तरफ फेंकते हुए बोला ‘‘बोर ! साले हरता जा रहा हूं।’’
 
‘‘हार-जीत तो बनी हुई है !’’
 
गुरजीत बोला।
 
‘‘छोड़ो भी ! हां लाला ! सुना तो दो अपनी कविता !’’
 
सुदर्षन ने विजय से कहा।
 
‘‘क्यों सुनाउं
 
मुस्कुरा कर विजय बोला।
 
मरो फिर !’’
 
सुदर्षन फिर चिढ़ उठा।
 
‘‘अच्छा, सुनाता हंू ! हंसागे तो नहीं ?’’
 
तुम्हारी कमस !’’
 
गुरजीत ने मुस्कुरा कर कहा। इस पर विजय संयत होकर बैठ गया। दो क्षण की चुप्पी के पष्चात उसने कविता कहनी षुरू कर दी:
 
‘‘दिए तेरी मजार पर
जलें हर घड़ी
यही मेरी कामना,
यही मेरी भेंट तुझे।
दो दिन का मिलन हीे था
भाग्य में अपने,
रूप तेरा बस् देखा ही था
हाय ! टूट गए सब सपने।
जीवन में बस तड़फन है
और नही कोई रस बाकी।
धूल भरा आंगन मेरा हे
बस कुछ यादों का साथी।
प्रिये ! याद दिलाती हरपल तेरी
मुझको ये मजार।
दिन ढलता, षाम होती
तेरी याद चली आती।
दीपक की लौ जला
विछोह के आंसू बहा
करता हंू तेरी इंतजार !’’
 
‘‘वाह ! वाह ! !’’
 
‘‘कमाल कर दिया लाला तूने !’’
 
‘‘मैं तुझ पर कुर्बान जाउं मेरे याड़ी !’’
 
सुदर्षन विजय की बलायें लेते हुए बोला। सभी हंसने लगे।