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खोखली नींव
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खोखली नींव (पहली कड़ी)
ISBN: 345

न-टन-टन-टन-टन ..........!

---छुटटी की घंटी बज गई। विधार्थियों ने अपनी पुस्तकें संभाली और हो-हल्ला करते हुए विधा-भवन से बहार निकलने लगे। टोलियों में बंटकर, बातें करते हुए, वो अपने घरों की ओर जाने वाले पथों पर चल दिये।

अमित टोलियों से अलग-थलग ही अकेला चल रहा था। उसकी मुख-मुद्रा पर शांति छायी थी। पैरों की गति तीर्व थी। उसकी चाल को देखकर यूं लगता था कि उसका आगे बढ़ता हर कदम कह रहा हो ---- गतिवान मनुष्य सदा प्रगति-पथ की ओर अग्रसर रहता है। वो स्वयं को परिस्थितियों के अनुकुल ढालने में समर्थ होता है। पतझड़-ऋतू में भी बसंत-ऋतू के रंग-बिरंगे, मनमोहक फुल उसकी बगिया में खिल रहते हैं।

विचारमग्न अमित राह में पड़ने वाले क्रीड़ावन तक पहुंच चूका था शाम को समय था क्रीड़ावन में रौनक थी। उसके सुन्दर-द्रश्यों को देखते हुए आगे बढ़ने लगा। एकाएक, किसी द्रश्य को देखकर, ठिठका और रुक गया। उसकी द्र्ष्टि क्रीड़ावन के एक कोने में किशोरों की एक टोली पर स्थिर होकर रह गई। उस टोली के सभी सदस्य उसके सहपाठी थे। उममें सुदर्शन भी था। वही उसके आकषर्ण का मुख्य केंद्र था।

वे सब जुआ खेल रहे थे। सभी के ओंठो के बीच सिगरेट शोभायमान थी। कुछ-कुछ बोल भी रहे थे... रह-रह कर ठहाका भी गूंज जाता। सुदर्शन बार-बार सिगरेट का एक लम्बा कश खींचता और क्षण पश्चात छल्लों में परिणित कर, धुंए को वातावरण की सुनहली चादर में फैला देता।

अमित उनको इस प्रकार के कर्म करते देख कर दुखी होता था। कुछ पल तक वह फुटपाथ पर खड़ा होकर उन्हें...उनके कर्मों को निहारता रहा। फिर एक गहरी सोच लिए आगे बढ़ने लगा।

सुदर्शन, उसका सहपाठी होने के साथ-साथ, उसका पडोसी भी था। बचपन के दिन दोनों ने एक संग बिताये थे। तब दोनों एक साथ खेलते थे...एक साथ खाते थे और एक साथ स्कूल जाते थे। परन्तु परिस्थितियों ने बड़ी नाटकीयता के साथ पलटा खाया। संयमहीन, संस्कारहीन सामान्य-पथ का पथिक अपनी राह त्याग बैठा। असत्य को सत्य समझने लगा..तामसी विचार उसे सात्विक-भावों से भरे जान पड़ने लगे। वह सुदर्शन था !

किशोरावस्था जीवन का एक ऐसा पहलू है जिसके दौरान हमारे विचारों में सदा संघर्ष होता रहता है। आज जो हम सोचते हैं, कल वही हमें गलत लगने लगता है और हम तब एक नई विचारधारा अपनाने को उतारू हो जाते हैं। उस वक्त हम अच्छा-बुरा नहीं सोचते। बस तब हमारे सिर पर एक भूत सवार होता है--- प्रबल इच्छाओं का भूत ! ...जिनकी पूर्ति करना हमारे लिए आवश्यक बन जाता है ; क्योंकि अगर आवश्यकताओं की पूर्ति न की जाए तो मानसिक-अशांति उत्पन्न होती है, मानसिक-कुंठाओं के आघातों को सहना पड़ता है, चाहे आवश्कता किसी बुरी वस्तु की क्यों न हो !

सुदर्शन के साथ भी यही हुआ। किसी ने उसकी कच्ची-विचारधारा के प्रवाह को बदल दिया।

...अमित और सुदर्शन के विचोरों में आश्चर्यजनक अंतर दिखाई पड़ने लगा। अमित उज्ज्वल पथ का राही था और सुदर्शन अच्छे-बुरे की प्रवाह किए बिना, अंधकार की गर्तों से भरे रास्ते की ओर बढने लगा...

...अमित ने सुदर्शन के बदले चेहरे को देखा, उसे समझाया। मगर सुदर्शन न माना। ...दोस्ती की जड़ सूख गई। दोनों ने एक-दूसरे से बोलना बंद कर दिया...उनका मिलना-जुलना, खेलना-कूदना खत्म हो गया। घरवालों ने कारण पूछा, मगर वो सत्य न जान पाये...न जान सके कि विचारों की भिन्नता के कारण फल का रस सूख गया है।

...मगर अमित के उर में एक शूल चुभ गया, उस मुरझाए वृक्ष का। उसके दिल में दर्द होने लगा। कारण था –सुदर्शन ! ...परिणाम, अमित चाहता था कि नए-सिरे से, सुंदर-सत्यस्वरूप मित्रता हो। इसीलिए वो सुदर्शन को समझाना चाहता था, फिर से. मगर सुदर्शन के पास समय कहाँ, बेकार की बातें सुनने का...!

‘क्यों करता है वो ऐसे कर्म ?...क्या मिलता है उसे इनसे ?’ --- अमित स्वयं से ही तर्क-वितर्क करने लगा---माँ-बाप का पैसा धूल में मिला रहा है। ...वो समझते हैं कि सुदर्शन पढने स्कूल गया है। परन्तु वास्तविकता से वो परिचित नहीं। उन्हें ज्ञात नहीं कि उनका बेटा स्कूल जाने के बजाए क्या करता है। ...क्यों न मैं उसके माता-वीटा को उसके दैनिक कार्य-कलापों से अवगत करा दूँ !’

---अमित ने इतना ही सोचा कि विपक्षी-अंश की वाणी उसे सुनाई दी ---‘पागल हो गए हो क्या अमित ?... इस युग के माँ-बाप अपनी सन्तान की कमियों को सुनते भी हैं ?...अमित ! अपने खून की आलोचना सुनने कि शक्ति उनमे नहीं। तुम कहोगे, तो बाद में पछताना पड़ेगा। बेहतर है चुप रहो ...चुप रहकर रंग-बिरंगे जग के चित्रों को देखो !...दर्शक बनो, निर्माणकर्ता नहीं !

‘चित्रकार अपनी रचना की कमी का आभास पाते ही, उसे दूर करने का प्रयत्न करता है। परन्तु इस जग के ये चित्रकार अपनी बनाई वस्तु की आलोचना नहीं सुन पाते ये उसकी कमी को जानकर भी उसे दूर करने का प्रयत्न नहीं करते, उलटे आलोचक को फटकारने लगते हैं। ...पिछले सप्ताह की बात भूल गए क्या ?...मामा जी के सम्मुख उनके लाडले की बुराइयों को पेश करने का क्या परिणाम मिला था ?...मामा जी ने यही कहा था न कि--वो हमारी नजरों में अच्छा है, दुनियां वालों की नजरों में जैसा-मर्जी हो। दुनिया वालों से हमारा क्या सम्बन्ध ! ...और अगर बुराइयों का दामन पकड़े भी तो बड़े होने पर स्वयं सब कुछ छूट जाएगा। ---वो तो मामाजी थे, इतना ही कहकर चुप हो गए। परन्तु ये तुम्हारे पड़ोसी हैं. इनकी नजरों में क्यों बुरे बनते हो ?...वो जैसा है, उसे वैसा ही रहने दो।.

परन्तु आत्मा के दूसरे पक्ष द्वारा इस विचार का विरोध उसी क्षण किया गया – अमित ! तुम तो सदा यही कहते हो कि रिश्ता खून से नहीं प्यार से बनता है। बचपन के सुदर्शन को तुम अपना भाई कहते हो। बचपन की मित्रता की यादें अब भी तुम्हारे ह्रदय में सुरक्षित हैं। तुम बचपन के प्यार के कारण ही तो आज के सुदर्शन को सुन्दर-सत्य्सात्विक कर्म करते देखना चाहते हो। अमित ! सुदर्शन का तुम संग भाई का रिश्ता है। फिर क्या तुम्हारा यह कर्तव्य नहीं बनता कि तुम उसे सुधारो...गलत-पथ पर जाने से रोको ?...फिर क्यों अवास्तविक-अनादर के भय के कारण तुम अपने कर्तव्य-पथ से विचलित होते हो ? ...कर्मण्य फल के स्वरूप के बारे में विचार किये बिना निरंतर कर्तव्य-पथ की ओर अग्रसर रहता है...तुम कर्मण्य होकर भी अच्छा कर्म करने से डरते हो !...

कितना लीन हो गया था अमित सुदर्शन में ! उसे अपनी सुध ही नहीं रही थी। उसने अपना सारा ध्यान विचारों की दुनिया में गडा रखा था। सुदर्शन में लवलीन होकर वो भूल चूका था कि वह इस समय पदपथ पर चल रहा है, ...और अब उसकी राह में एक खम्भा आ चूका है......।

हाँ, अगर एक क्षण पश्चात् उसे अपनी स्थिति महसूस होती तो अब वह पीछे मुड़कर न देख रहा होता, बल्कि अपने माथे को सहलाते हुए निचे बैठ गया होता...वह खम्भे से टकराने ही लगा था कि एक तीर्व हंसी ने उसे चोंका दिया और वही क्षण उसके माथे के लिया वरदान साबित हुआ।

“अरे ओ फिलासफर साहब !...किस विषय में रिसर्च कर रहे हैं आजकल आप ?”---अमित को लक्ष्य करके यह लवलेश ने हँसते हुए कहा था। उसकी हंसी ने ही आज अमित के सर को बचा लिया था। लवलेश अमित का प्रिय मित्र था।

व्यंग्य सुनकर अमित मुस्कुरा पड़ा और झेंपते हुए इतना की बोला___”ओह !...लवलेश !”

“रातों को नींद नहीं, दिन में भी चैन नहीं !...अरे हो भी क्यों ? फ़सर्ट डिविजन जो लेनी है !” ---एक और व्यंग्य-बाण छोड़ा लवलेश ने उस पर।

...दोनों बातें करते हुए, साथ-साथ चलने लगे।

“...और पढाई कैसी चल रही है ?”

---मजाक भूल कर लवलेश पढाई की बैटन पर आ गया।

“बस भाई, छकड़ा चल रहा है।”

---मुस्कुराते हुए अमित ने कहा।

“हमेशा यही कहते हो। कभी यह भी कह दिया करो कि वायुयान की भांति तेज चलने वाला सड़क यातायात का सबसे आधुनिकतम साधन, जो उबड़-खाबड़ भूमि को समतल बनाता हुआ बड़ी तेजी से आगे बढे जा रहा है।”

लवलेश की बात सुनकर अमित हंस पड़ा। दोनों फिर एक–दूसरे से कोर्स के विषय में पूछने लगे। अमित ने लवलेश को, और लवलेश ने अमित को बताया कि वो किस-किस विषय में कितना-कितना कोर्स समाप्त कर चुका है।

ये दोनों ही ऐसे मित्र थे जो ज्यादातर पढाई की बातें किया करते थे। बहुत ही कम ऐसे अवसर आते थे जब ये अपनी मुलाकात के समय को फिजूल बातों में बिता दिया करते थे। दोनों अपने-अपने विधालय के सबसे होशियार छात्र थे। परन्तु कभी भी उनको अपनी होशियारी की डींगें हांकते नहीं सुना गया था। प्रवीणता का घमंड उनमे नहीं था। वो अपने कमजोर सहपाठियों पर भरपूर ध्यान दिया करते थे। उनकी कठिनियों को सुलझाने में भरपूर सहायता करते थे। इन्ही गुणों के कारण कोई भी उनसे सच्चे दिल से ईष्र्या नहीं करता था।

अमित का घर आ गया। लवलेश ने उससे हाथ मिलाकर विदा ली।

 

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