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बिखरे क्षण
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दिनचर्या (Dincharya) 2
ISBN: 81-901611-0-6

न्ना-शहर की एक अंधेरी-संकरी गली के अन्तिम छोर पर साधूराम का घर था। दुकान से लगभग एक किलोमीटर दूर। स्वच्छन्द वातावरण में सांस लेता हुआ, मन्द गति से चलता हुआ वह गली के किनारे तक आ पहुँचा। दो क्षण के लिए ठिठका, फिर धीरे-धीरे कदम रखता हुआ आगे बढ़ने लगा। गली के बीच तक पहुँचने पर वातावरण पूर्णरूपेण परिवर्तित हो चुका था। गली के दोनों ओर बहती गंदी नाली से उठती घुटन भरी, बदबूदार वायु उसके नथुनों में घुसने लगी थी। नवागन्तुक शायद ही वहाँ दो पल ठहर पाता। परन्तु साधुराम और उस-सम गली के अन्य निवासी बरसों से यहाँ रहते इसके अभ्यस्त हो चुके थे। जिसे ज्ञात है कि यहीं वह पैदा हुआ है, यही पलकर बड़ा हुआ है, यहीं उसे मरना है, यही उसका जीवन है, वह इस गली की घिनौनी-घुटन भरी वायु से नहीं घबराता...

इस वातावरण में उसे अपना दम घुटते नहीं महसूस होता। नर्क नर्कवासी के लिए स्वर्ग है। हल में जुते बैल को, ताँगे में जुते घोड़े को नित्य अनगिनत चाबुक पड़ते हैं। मगर वह सब कुछ चुपचाप सह लेता है... "उफ्फ" तक नहीं करता। शायद यही सोच कर कि उसका प्रयोग निर्माणकार्य में हो रहा है। या फिर इसलिए कि उसे ज्ञात है रोटी खानी है तो चाबुकों की मार सहनी होगी, गुलामी सहनी होगी, इच्छाओं को कब्र में दफनाना होगा। कोई और राह-थाह नहीं इन गुलामों के लिए जीने की। जानते हैं कि सिर्फ मौत ही उनको छुटकारा दिला सकती है। और मौत की इच्छा किसे...?

जीवन है शिव-रूप। छोटा-सा, दुर्लभ। मिला है तो हँस कर बिताओ। मार भी पड़ेगी, फूल भी मिलेंगे। सब कुछ मिलेगा। खाना पड़ेगा, सहना पड़ेगा। किसी से बच नहीं सकते। आज दु:खों से मुख मोड़ कर भागोगे तो कल भूल जाओगे सुख किसे कहते हैं। सुख पाने के लिए दु:ख भी सहने पड़ते हैं। सुख-दु:ख से आँख-मिचौली खेलना ही तो जीवन है।

भय के हथौड़ों की चोट खाकर साधूराम का मस्तिष्क सुन्न हुआ पड़ा था। जीवन के अन्तिम क्षणों की कल्पना करने के पश्चात उसे साँस लेने में भी कठिनाई महसूस हो रही थी। घर की चौखट पर उसने पग रखा ही था कि खाँसी के एक लम्बे दौर ने उस पर आक्रमण कर दिया। खाँसते-खाँसते उसकी बुरी दशा हो गई। शांति भीतर थी। आवज सुनकर बरामदे में आ गई। शांति की उम्र पैंसठ वर्ष की है। उसकी काया इतनी क्षीण पड़ चुकी है कि अस्सी बरस की बूढ़ी लगती है। उसके सिर के बाल पक चुके हैं। चेहरे पर अनगनित झुर्रियाँ हैं। शरीर का माँस भी झुर्रीदार-कांतिहीन बन चुका है। मुहँ भी दंतविहीन…….।

“आ गए ?” - मुख से निकलता स्वर भी क्षीण है।

"हाँ……… " - खाँसी को कुछ चैन मिलते ही साधूराम ने कहा।

"दवाई लेने गए थे ?" - पूछा शांति ने।

"ध्यान ही नहीं रहा…….. " - भावहीन मुख लिए साधूराम आँगन मे बिछी खाट पर बैठ चुका था।

"कैसे विचित्र जीवट के हैं आप। रात सारी खाँसते-खाँसते बीत जाती है और दवाई लेने का नाम नहीं लेते। इतनी भी चिन्ता काहे की कि सुध-बुध भूल चुके हो।" - क्षीण-स्वर में एक दर्द था। मगर साधूराम ने कुछ जैसे सुना ही नहीं। वह अपनी सूनी-गहरी दृष्टि से आँगन को निहार रहा था। बाहर की टूटी-फूटी, अभेध्य दिवाल को अपनी उदास दृष्टि से चीरकर कहीं दूर देखने का प्रयत्न कर रहा था। मगर उसका यह प्रयत्न सफल नही हो सकता था। उसकी दृष्टि बार-बार भटक जाती थी और सूने आँगन का निरक्षण करने लगती थी। टूटे-फूटे जर्जर व्यवस्था में खड़े घर को वह बड़ी गहरी नजर से देखने लगता था। बिल्कुल छोटा-सा घर है उसका। दो कमरे हैं। रसोई घर है। गुसलखाना है। शौच के लिए भी स्थान है, अलग एक कोने में आँगन के। इस घर में उसने अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतीत किया है। नन्हा-सा था तो मामा-मामी ले आए थे। यहीं पला, पलकर बड़ा हुआ, यहीं रहते उसने जीवन के सभी रंग देखें इस घर के साथ उसका स्नेह का नाता है। यह घर उसके बचपन, उसके लड़कपन, उसकी जवानी और उसके अब तक के जीवन की स्मर्तियाँ संजोए है। यहाँ बिताए दिनों के सभी चित्र इधर-उधर बनी इन पुरानी, टूटी-फूटी दिवालों में बिखरे पड़े हैं, उन्हीं को चुन-चुन कर इकट्ठा करके साधूराम ने शांति को पुकारा - "शांति....।" उसकी वाणी में कंपन था।

"कहो……….।" - शांति को उसका यूँ पुकारना कुछ अजीब लगा।

"हम कितने अकेले हैं, शांति...। कभी-कभी बहुत डर लगता है इस अकलेपन को देखकर और जब कभी ध्यान आता है अपने अंत का…….. हाँ, शांति कौन देगा मुझे कंधा……..शांति, कौन मेरी चिता में अग्नि लगाएगा……..?" एक व्यर्थ के भय ने उसको जकड़ लिया था। उसे अपनी मृत्यु आँखों के सम्मुख नाचती प्रतीत हो रही थी।

समझदार साधूराम के मुख से ऐसी बात सुनकर शांति को आश्चर्य हुआ। वह बोली, "आज ये आपको क्या हो गया है ? क्यों बुरी बात मुँह से निकाल रहे हो ? भगवान मुझे ऐसा दिन दिखाने से पहले ही ऊपर उठा लेगा।" - उसकी वाणी में करुणा आ गई थी। साथ ही वह सोचने भी लगी थी, "जग की सुईयाँ निरन्तर आगे बढ़ती जा रही हैं। हम जग में आते हैं, आगे बढ़ते हैं और निरन्तर गतिशील रहते हुए एकाएक अज्ञात में विलीन हो जाते हैं। गतिशीलता हमारा कर्तव्य है और अज्ञात में विलीन होना हमारी इस सृष्टि की परम्परा है। तब परम्परा के प्रति निराशा क्यों ? उसे याद करके स्वयं को भयभीत करना, दूसरों को उस अंत का स्मरण कराना उचित तो नहीं। आज कुछ निराश से जान पड़ते हैं तभी ऐसा महसूस कर रहे हैं।

साधूराम ने शांति की बात नहीं सुनी, वह उसके भावों को भी न समझ सका। उसकी विचारशक्ति, उसकी श्रव्यशक्ति शायद सुन्न पड़ गई थी। वह केवल भयग्रस्त शब्द बोल पा रहा था, वह देख पा रहा था तो केवल एक सूना पथ, चिलचिलाती धूप, चार व्यक्तियों के कंधों पर लदी अर्थी और पीछे रोती-बिलखती शांति। स्वनिर्मित भूल-भुलैया में भटक रहा था……., वहीं भटकते बोला- "शांति। विधि के विधान भला कौन टाल सकता है? जो होना है, सो होगा ही। शक्ति नहीं किसी में इतनी की इसको रोक ले। कौन जानता है कब मरना है। क्षण का भी भरोसा नहीं……….., भविष्य पुर्णत: अनिश्चित है, शांति ।"

शांति ने साधूराम की बात सुनी। स्वर समझा। समझदार थी। जान गई सब कुछ भय-निराशा का किया-धरा है। जानती थी सांत्वना से भय दूर हो सकता है। घंटे पर सीधी चोट मारने से ही झनझनाता स्वर उत्पन्न होता है। कुछ क्षण सोचकर बोली -

"भय ने आपकी आत्मशक्ति, आपकी विचारशक्ति को नीचे दबाकर कुंठित कर दिया है। आप यूँ ही व्यर्थ सोचकर समय नष्ट कर रहे हैं। मरना तो एक दिन सभी ने है। जो निश्चित है उससे डर क्यों? उसके विषय में चिंता कर समय खराब करने का क्या लाभ ? हमारा कर्तव्य तो अनिश्चित के प्रति है। इस अनिश्चित जीवन का अंत तो एक न एक दिन होना ही है। कुछ पता नहीं कब क्या होगा, फिर ऐसी बातें सोचकर समय नष्ट करके हमें क्या मिलेगा ?.........आज आपने ऐसा क्या देख-सुन लिया है जो मौत की रट लगाए हैं? इसका ध्यान छोड़िए अपने "राम" को स्मरण कीजिए। जैसे अब तक व्यर्थनीय बातों से तटस्थ रहकर जीवन बिता दिया है, वैसा ही शेष बीत जाए तो कितना अच्छा हो।"

अंधेरे में तनिक प्रकाश पाकर उसे कुछ चेतना आई। क्षणभर सोचकर उसने शांति से कहा- "आज अर्थी देखी एक जवान की…….. क्या करूँ मन हटता ही नहीं उधर से….। पहले राजा याद आता रहा…….., रह-रह कर उसकी वह सूरत आँखों में घूमती रही, जिसे देखकर मेरी जुबान को ताला लग गया था और आँखें पथरा गई थी……., और फिर शांति, सतीश याद हो आया। यूँ लगा एकाएक अर्थी में मेरी लाश है और जो यूँ ही लावारिस पड़ी है। उसे कोई कंधा देने वाला नहीं...।" - साधूराम ने अपनी बात खत्म की, तब तक उसकी आँखों से आँसू निकलकर उसके गालों तक आ गए थे।


साधूराम के स्वर ने, शब्दों के प्रवाह ने शांति के बदन में झुरझुरी उत्पन्न कर दी……, उसकी आँखों के सम्मुख काला पर्दा छा गया। अश्रु स्वयं ही प्रवाहित हो उठे। आद्र स्वर में बोली - "हाँ...। ये आपको क्या हो गया है………., क्यों अपशब्द मुख से निकाल रहे हो ?"

"मैं सच कह रहा हूँ, शांति। मुझे अर्थी देखकर अपने अंत समय की याद हो आई थी। मैं सतीश को याद करने लगा था। वह हमसे दूर कहीं अपनी धुन में मस्त बैठा है। नहीं आएगा शायद अब कभी। ……..शांति। लगता है बहुत प्यासा हूँ मैं, बिना उससे मिले शायद तड़प-तड़प कर आएगी मौत...। कभी-कभी बहुत जरूरत महसूस होने लगती है उसकी। ………. और कोई है भी तो नहीं उसकी जगह लेने वाला। क्या गलत कह रहा हूँ मैं……?"

भावुकता से लिपटकर साधूराम अपने ह्रदय में उमड़ी प्यास को निरन्तर बढ़ाता जा रहा था। अश्रु बहाते उसने आँगन में बैठे अपने चारों ओर निराशा भरी दृष्टि डाली। लगा, सभी कुछ निराशामयी है। जिस दिवाल के चित्र कभी उसे सांत्वना देते थे, वह आज धुंधले पड़े थे। केवल दिख रही थी एक सपाट-सूनी, जगह-जगह से झड़े पलस्तर को लिए दिवाल। कल्पना में कोई ऐसी ही खुरदरी वस्तु पर वह अपना काँपता हाथ फेरने लगा। उसे लगा, कोई मवादयुक्त फोड़े को छू-छू कर वह एक नया दर्द उत्पन्न कर रहा है। उस दर्द की अनुभूति की कल्पना उसके शरीर को कंपकंपाने लगी।

साधूराम का सादा-सरल-सुन्दर जीवन कभी-कभी न जाने कहाँ विलुप्त हो जाता था। ऐसे में वह अपने जीवन के टूटे क्षणों में इतना लीन हो जाता कि उसे इस बात का तनिक भी एहसास न होता कि वह वही साधूराम है जो अपने सम्पर्क में आने वाले मनुष्यों को सदैव शांति पाठ पढ़ाया करता है। साधूराम अक्सर एकांत के क्षणों में किसी दृष्य को देखकर विचार करने लगता, उसे अपने जीवन का प्रतीक मानकर कहीं दूर पहुँचकर सोचने लगता - आज उसने अर्थी को देखा, अपने अंत की कल्पना करने लगा। अपने भविष्य को अधंकारमयी मान, अंधेरे में कुछ खोजने की चेष्ठा करने लगा। निराशा की कड़ियाँ जुड़ती गयी और खीचंकर उसे अतीत के खंडहर में ले गई। बीते क्षण उसे स्मरण आने लगे, पुत्र की याद हो आई। सूने भविष्य से उसका सम्बन्ध जोड़ दिया और अतीत के सूनेपन की याद और, भविष्य के सूनेपन का एहसास उसके वर्तमान को निराशामयी बना गया। फलस्वरूप साधूराम की आँखों से आँसूओं की अविरल धारा बहने लगी….

मन उसका फिर से उसी घटना के विषय में सोचने लगा था फिर से - सतीश की शादी के विषय में - जब से एक बीज फूटा था उनके सम्बन्धों में एक आक्रोश के उत्पन्न होने का।

माँ के नाम आए पत्र को एक महीना हो चला था। लेकिन उन्होनें सतीश को एक भी शब्द नहीं लिखा था। इस बीच सतीश का पत्र भी नहीं आया था। साधूराम व शांति की दिनचर्या भी अस्त-व्यस्त हो चुकी थी। न साधूराम का दुकान पर मन लगता है और न शांति का घर के कार्यों और पूजा पाठ में। दोनों हरदम खोये-खोये, उदास-उदास रहते थे। जानने वाले उनकी यह दशा देखकर हैरान थे। खुशी के बजाए वह अब मुँह पर एक गहरी निराशा की झलक लिए अपने में ही लीन रहने लगे थे, ऐसी दशा देखकर उनकी दो-एक ने कारण पूछने की भी कोशिश की लेकिन न साधूराम के मुख से बात फूटी, न ही शांति के।

उस दिन साधूराम दुकान पर नहीं गया था। सुबह-सवरे से ही आँगन में बिछी खाट पर औँधे मुँह लेटा था। शांति ने दो-एक-बार उससे नहा-धोकर कर नाश्ता कर लेने को कहा, लेकिन - "अभी उठता हूँ।" कहकर साधूराम पुन: आँखे मूँद लेने की चेष्टा करता रहा।

दस बजे गए। दरवाजे पर थाप पड़ी और "डाकिया" आवाज पड़ते ही साधूराम उठ बैठा। एक चिट्ठी दरवाजे के निकट फेंक कर डाकिया चला गया था। धीमे कदमों से साधूराम चिट्ठी उठा लेने को बढ़ा। उसकी मुख-मुद्रा पर आज कोई खुशी नही थी जो पहले सतीश का पत्र आने पर एकाएक आ जाती थी। शांति भी उसके निकट चली आई थी। लेकिन वह गम्भीर थी। पत्र खोलकर साधूराम ने पढ़ना शुरु कर दिया। सतीश ने लिखा था –


"आदरणीय बाबू जी,

सादर प्रणाम।


मैंने इससे पहले माँ के नाम एक पत्र लिखा था। महीने से ऊपर हो गया है, लेकिन अपने अभी तक कोई उत्तर नहीं दिया। मैं समझ गया हूँ कि आप मुझसे नाराज हो गए हैं। दु:खी भी हैं शायद। लेकिन बाबू जी, यदि आप शांति से बैठकर विचार करें तो जान जाएँगें कि मैंने कोई गलती नहीं की। हाँ, मैं इतना जरूर दोष मानता हूँ कि मैंने आपको समय से पहले कुछ नहीं बताया और आपकी इच्छा को पूरा नहीं कर सका। लेकिन मैं आपको कैसे कहूँ कि सुमिता से मेरा परिचय बहुत पुराना हो चुका था, कॉलेज में हम दोनों साथ थे और एकाएक एक परेशानी सामने आ गई थी, सोसाइटी में बदनाम होने से उचित समझा जो काम कल करना है, वह आज ही कर लेना उचित रहेगा..."

इतना ही पढ़कर साधूराम व्यंग्यपूर्ण स्वर में शांति से बोला - "सुन रही हो, बदनामी से बचने के लिए शादी की है उसने...। समझती हो न कैसी बदनामी से बचने के लिए ? - एक तरफ काबिल अफसर और दूसरी तरफ कितने बड़े काम...। शुक्र है भगवान का, जो दिल्ली में ही रहता है। ऐसा कुछ किसी के साथ यहाँ कर बैठता तो शायद चुल्लू भर पानी में डूबना पड़ जाता हमको...। - उसकी बात सुनकर शांति कुछ भी न कह सकी। तब कुछ देर रुककर साधूराम ने पत्र आगे पढ़ना शुरू कर दिया।

"... लेकिन बाबू जी, मेरी पसन्द कोई गलत नहीं। आप जब सुमिता को देखेंगे तो यही कहगें। सुमिता मेरे चीफ साहब की लड़की है। पढ़ी-लिखी है और आज मैं जिस सोसाइटी का सदस्य हूँ उसमें वह मेरे साथ अपना हर कदम मिला कर चलने में सक्षम है।……. और बाबू जी, आप तो सदा मेरी खुशी के लिए कुछ भी करने को तैयार रहे हैं, फिर अब मुझसे नाराज क्यों ? क्यों समझते हैं और यह क्यों मान बैठे हैं कि मैंने आपकी भावनाओं का गला घोंटा है। मैं आपको समय पर सूचित नहीं कर सका, आपकी राय नहीं ले सका इसके लिए मैं आपसे माफी माँग रहा हूँ, बार-बार माँगता रहूँगा, तब तो आपको नाराज नहीं होना चाहिए। मैं खुश हूँ, तब क्या आपको खुश नहीं होना चाहिए……. ?"

पत्र इतना ही पढ़कर साधूराम की आँखें डबडबा आई थी। शांति की ओर देखते हुए बोला था - "लिखता है आप मेरी खुशी के लिए सब कुछ करते रहे, तब आज नाराज क्यों।…… सुन रही हो न, शांति, इतना भी नहीं समझता कि हमने सोचा था वह सब कुछ करेगा हमारी खुशी के मुताबिक। मकान अच्छा बनाने का सपना टूटा, तुम्हारे गहने बनवाने की बात गयी, तीर्थ जाने की बात तो भूल जाओ – उसके बिना कुछ कहे ये अरमान खुद ही खुद दब गए उसके इतना पराया हो जाते देख। ………. हर घटना को बच्चों की बात समझ कर बिसरा देने को कहता है। जैसे जानता नहीं कि हम अब बूढ़े हो गए हैं। हमारा दिल अब कठोर नहीं रहा जो हर घात सह सके। हमारा मोम जैसा दिल है अब, अरमान ही अरमान हैं जिसमें शेष। वह भी टूट गए तो शेष क्या है, शांति, हमारे पास…। एक जिन्दा लाश का बोझ ही तो……….।" तब सतीश को मन में सम्बोधित करते हुए बोला -"तू ठीक कहता है बेटा, तू खुश है। भगवान से प्रार्थना है मेरी नित नई खुशियाँ तुझे मिलती रहें। लेकिन जानता है हमारे अरमानों को तू ने कहाँ ला पटका है। तू भला अभी से अरमानों की कीमत क्या समझे। तेरा दिल तो अभी जवान है..।" - साधूराम के आँसू जैसे स्वयं को रोके हुए थे, लेकिन शांति की आँखे फूट पड़ी। कुछ देर तक साधूराम पत्र आगे न पढ़ सका। मन जब ठहरा उसका और शांति ने सिसकना बंद कर उसकी ओर देखना शुरु किया तो वह पुन: पढ़ने लगा –

बाबू जी। यहाँ मुझे एक बड़ा-सा बंगला मिला हुआ है रहने के लिए। ऐसे में मैं आपको उस पुराने, टूटे-फुटे मकान में रहने के लिए नहीं कह सकता। आप मेरा पत्र मिलते ही दुकान और घर बंद करके मेरे पास दिल्ली चले आएं। यहाँ आपको किसी चीज की कमी महसूस नहीं होगी।

"मुझे उम्मीद है मेरा पत्र मिलते ही आप मुझे अपने आने की तारीख लिखेंगे। सुमिता आप दोनों को प्रणाम कहती है और आशा करती है आप अवश्य आएँगे।


आपका पुत्र

सतीश।"


पत्र समाप्त कर वह शांति को पुन: सम्बोधित करते हुए बोला- "तुमने सुना, शांति, यह घर पुराना हो चुका है। टूट-फूट गया है। अब इसका कोई मूल्य नहीं। इसे आकर वह देखना भी नहीं चहता। मैं तो सोचता था कि वह इसमें निखार लाएगा, कहेगा मेरा बचपन यहाँ बीता है। मेरे माँ-बाप ने यहीं रहकर मुझे इतना बड़ा बनाया है। लेकिन शांति मैं भी कितना पागल हूँ। भूल जाता हूँ बार-बार कि बचपन का कभी कुछ मूल्य नहीं हुआ करता। बचपन, बड़प्पन की रंगीनियाँ देखते ही, बिसर जाता है सबको। यहाँ उसका बचपन बीता है, लड़कपन नहीं, जवानी नहीं। उसमें हमनें ही ऊँचेपन का अहसास जगाया था। अब देखें उसका ऊँचापन, बस और तो कुछ नहीं मिल सकता।" - साधूराम सतीश के सामने, उसके विचारों के सामने स्वयं को आज उसके पत्र के माध्यम से बहुत छोटा पा रहा था। इस मकान के बारे में कहे गए सतीश के शब्द उसे जहर के कड़वे घूँट के समान लग रहे थे, जिन्हें अपने गले से नीचे उतार पाना उसे कठिन महसूस हो रहा था।

तब तक शायद शांति अपने विचार कुछ बदल चुकी थी। बोली- "कैसी बात कर रहें हैं आप। उसने एक गलती कर दी तो उसके लिए बार-बार माफी मांग रहा है। जरा सोचो, यदि उसमें बड़प्पन आ गया होता तो क्या वह इतने प्रेम से हमें अपने पास आ जाने का आग्रह करता ? और बड़प्पन है भी तो हमें खुश होना चाहिए। तुम उसे बड़ा आदमी ही तो बनाना चाहते थे।


उसकी यह बात सुनकर साधूराम ने कहा- "उसे बड़ा आदमी बनाना चहता था- बड़े आदर्शों वाला आदमी। बड़प्पन अलग चीज है। उससे घंमड की बू आती है। अपने आपको अधिक समझदार मानने की गलती कर बैठा है तुम्हारा बेटा………।"

"बेटा सिर्फ मेरा ही तो नहीं, आपका भी है। और आप बेकार में ऐसी बातें सोच कर अपना मन जला रहे हैं। जो होना था वह तो हो चुका और उसने माफी भी माँग ली है। अब हमें और जिद्द नहीं करनी चाहिए। दिल्ली चलकर बहू से तो मिल आना चाहिए। बेशक हम वहाँ रहे नहीं"- शांति ने अपनी लालसा जो एकाएक तीव्र हो उठी थी प्रकट कर दी साधूराम के सम्मुख। तब साधूराम ने जरा तीखे स्वर में कहा - "क्या कह रही हो, बहू से मिल आना चाहिए ? क्यों ? कौन बड़ा है ? बहू या कि हम ? एक गलती वह कर बैठा है, दूसरी मैं कर बैठूँ और अपनी इज्जत बहू की आँखों में बिल्कुल घटा दूँ, यह मेरे बस की बात नहीं। बहू वह इस घर की बनी है। शादी सतीश ने अपनी मर्जी से कर ली है, यह भूल भी सकता हूँ, लेकिन तभी जब वह बहू के साथ आए यहाँ हमारा आशीर्वाद लेने।

साधूराम अपनी भावनाओं के बोझ से दबा पड़ा था। उसकी तमन्ना तो थी सब कुछ उन्हीं के अनुरूप करने की, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया, इसलिए जो भी भाव उसके निराश मन में उभरता, वह उसे शांति के सम्मुख प्रकट कर देता। शांति को उसकी यह बात उचित प्रतीत हुई - "....तो लिख दो उसे, ले आए बहू को। तब उनके साथ ही चल पड़ेंगे………।"

"हाँ, लिख दूँगा। मालूम पड़ जाएगा तुम्हें कितने पानीं में है वह...। " - साधूराम का मन कुछ ठहर चुका था तब तक। उठकर वह दुकान की ओर चल दिया और शांति अपने घर के काम को निपटाने में लग गई।

सतीश का उत्तर जल्दी आ गया। उसने लिखा था, छुट्टी की कोशिश वह पिछले कई दिनों से कर रहा है। और महीने-पन्द्रह दिन की मिल जाए तो वह उनसे मिलने का और आगे कहीं कुछ दिन बिता कर आने का प्रोग्राम बनाएगा। लेकिन अब यदि छुट्टी न भी मिली तो वह उनसे मिलने शनिवार की शाम को आकर अगले दिन दोपहर को लौट जाएगा। पत्र पढ़कर साधूराम व शांति के मन को थोड़ा सा ढाढ़स बंधा। कुछ देर पश्चात शांति ने कहा - "चलो अब मिल तो जाएगा। छुट्टी नहीं मिल रही उसे, पर बहू को तो कुछ काम नहीं है, कुछ दिन यहीं रह लेगी हमारे पास और फिर अगर कहा उसने तो साथ चले जाएँगे उसके...।"

उसकी यह बात सुनकर साधूराम बोला- "अभी आने तो दो उनको। जाने कैसी हो तुम्हारी बहू। तुम्हें अच्छी लगे भी या नहीं..., और वह बड़े घर की लड़की यहाँ रहना पसन्द करेगी भी या नहीं...।"

"....बड़े घर की लड़की है तो क्या हुआ, अब तो उसका घर यही है। और हम किसी से कम तो नहीं। इतना बड़ा अफसर है हमारा बेटा...

सतीश को उसने अपनी मर्जी से ही पसन्द किया है। अब उसे हमारे जैसा ही बनना होगा...।"

"तुम्हारे जैसा....। क्यों भूलती हो नए जमाने और हमारे जमाने के फर्क को। तुम अपने को बदल लो शांति अगर बहू से इतना प्यार हो गया है तुमको। पर भूल जाओ कि बहू ऊँचे घर में पलने के बाद आकर तुम्हारे इस छोटे से घर में रहकर तुम्हारे जैसी बन जाएगी...। यह तो अपने पुत्र की बदौलत तुम्हें बड़े घर की बहू मिली है। मेरा कहा मानो तो इस भ्रम को निकाल दो अपने मन से। उसने तुम्हें या मुझे या इस घर के वातावरण को देखकर सतीश से विवाह नहीं किया, बल्कि सिर्फ सतीश को, उसके ऊँचे-उज्जवल भविष्य को, समाज में बनने जा रहे उसके मान को देखकर ही उसे अपनाया है। वह सतीश के लिए है, इसलिए आग्रह ही न करना उससे यहाँ रहने का । ठुकरा दी उसने अगर तुम्हारी चाह तो व्यर्थ में आँसू बहाओगी…….।" - साधूराम का स्वर शांत था, लेकिन उसकी आँखों में दूर कहीं निराशा की झलक स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी। उसे अन्दाज था ऊँची सोसाइटी के मान-मूल्यों का।

उसकी यह बात सुनकर शांति ने कहा- "तुम तो हर बात की कल्पना पहले से ही करने बैठ जाते हो, जैसे वह तुम्हारी देखी-परखी हो। कई लड़कियाँ होती है जो हर कहीं भी अपने को ठीक कर लेती हैं।……… और मैं यह तो नहीं चाहती कि वह सदा हमारे साथ बँधी रहे। दो दिन इस घर में रह लेगी तो जान जाएगी हमारे विचारों को। फिर हमें ही तो चलकर रहना है उसके पास…….।"

"………तो शांति, तुम भी इस घर को छोड़ देना चाहती हो...।" - साधूराम जैसे निराश हो गया था शांति की बात सुनकर।

"मैनें ऐसा तो नहीं कहा…….। अपना घर कभी दूर हो सकता है क्या ? लेकिन सतीश जहाँ रहे वह घर हमारा अपना नहीं क्या ? हम यहाँ रहें या उसके पास इसमें फर्क ही क्या है ?.........फिर इस घर को बेच तो नहीं रहे और न ही वह ऐसा कोई आग्रह कर रहा है। मन जब करेगा, यहाँ आ सकेंगे और क्या वह कभी यहाँ नहीं आएगा या पहले नहीं आता था क्या ?......"

तब साधूराम ने कहा - "यह तुम कह रही हो, जानकर भी कि वह इसे भूल जाना चाहता है - उसे यहाँ रहना बिल्कुल पसन्द नहीं। सिर्फ अपनी चिठ्ठी में ही तो उसने यह नहीं लिखा, वह तो शुरू से ही तो कतराता रहा है यहाँ के माहौल से....।"

तब शांति ने और अधिक कल्पना क्षेत्र में उतरते हुए कहा- "और अगर वह तुम्हें अच्छा एक बड़ा घर दे दे इसके बदले तब भी क्या तुम नहीं छोड़ोगें इस घर को ? "

"शांति। भावनाओं में बहकर तुम ऐसा कह रही हो, पर यह मत भूलो कि अपने घर से दूर जाना संभव नहीं बन पाता कभी। भूल नहीं पाता कभी कोई पुराने घर को जहाँ अनेकों यादें छिपी पड़ी हों। पड़ोसी मेहरचंद को भूल गई क्या ? मजबूरी से घर बेच गया था, लेकिन क्या नई जगह जाकर इसे भूल पाया। उसके भटके कदम अक्सर इस गली के किनारे पर उसे ला खड़ा करते थे और वास्तविकता का ध्यान कर आँसूओं की झड़ी उसके गालों पर खेलने लगती थी। आदमी कितनी भी दूर क्यों न हो जाए, अपने घर की याद उसे हमेशा सताती है और मैं इस याद में तड़पना नहीं चाहता। यहां क्या दु:ख है हमको। पुत्र चिट्ठी लिखता रहे, आकर मिलता रहे और अपनी खुशी में हमें शामिल करता रहे। हमें इससे ज्यादा और क्या चाहिए……… ?"

कल जो साधूराम मान गया था, कहता था बहू के इस घर में कदम रखने के बाद वह पुत्र के पास दिल्ली जाने की सोचेगा। आज जब सतीश उसे लेकर आ रहा था, तब साधूराम पुन: इस घर से अपना रागात्मक संबंध बताकर उससे दूर न होने की कह रहा था। कैसे विचित्र जीवट का बना हुआ था वह।पहले पल जो सोचता था, दूसरे पल उसे भूलकर फिर उसी पुराने ढर्रे पर आ जाता था। पुत्र से बढ़कर उसे घर से प्यार था। क्या वास्तव में बंध जाता है घर के मोहजाल में प्राणी इतना कि उससे दूर जाने की कल्पना से भी कतराने लगता है ?

"तुममें यह परायापन उसके प्रति क्यों आ गया है एकाएक?  क्या वह हमारा पुत्र नहीं ? क्या उसका घर हमारा नहीं ?......" - शांति ने फिर अपनी बात दोहराई।

".....शांति। सतीश को अब अपने लिए यादें बनानी हैं, लेकिन मेरी सभी यादें तो यहाँ पड़ी हैं। यहाँ बीत रही हर घड़ी मुझे कुछ न कुछ याद दिलाती रहती है। मैं क्या अपना सब कुछ यहीं बिखरा छोड़कर उसकी यादों का सहारा बन जाऊँ ? अब वक्त मेरा नहीं, उसका है। फर्ज उसका बनता है, मेरी यादों को और सुरक्षित बनाने का। पहले ये घर मेरा है, बाद में कोई दूसरा ही हो सकता है। इस घर को सुन्दर बना दे बस यही मेरी तमन्ना है। लेकिन यदि तुम भी ऐसे सोचने लगी तो लगता है सब कुछ अधूरा रह जाएगा…….. ।"

- साधूराम भावनाओं में बह गया था। शांति ने देखा, वातावरण फिर पहले के दिनों बोझिल बनने लगा है, तब वह बोली - "अभी तो हम यहीं हैं और वह अभी आया भी नहीं। कुछ होने से पहले यूँ ही क्यों सोचकर मेरा और अपना मन खराब कर रहे हो। अभी उसे आने तो दो……।"

"हाँ, आ लेने दो। देर ही कितनी है आने में उसके....।" - और तब दोनों चुप हो गए।

दरवाजा खुला हुआ था। साधूराम व शांति दोनों बाहर बरामदे में ही बैठे सतीश व सुमीता के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। शांति ने सुबह ही दोनों के लिए दोपहर का खाना तैयार करके रख छोड़ा था। लेकिन एक बजते ही साधूराम को भूख लग आई। तब उसके कहने पर शांति ने चुपचाप उसे खाना परोस दिया। एक बार भी नहीं कहा कि उसे कम-से-कम थोड़ा देर और पुत्र की प्रतीक्षा करनी चाहिए।


साधूराम ने खाना समाप्त करके शांति से कहा - "तुम भी खा लो अब.....।"

"थोड़ी देर और देख लेती हूँ।" शांति इतना ही कहकर घुटनों पर मुँह टिका कर बाहर के दरवाजे की ओर प्रतीक्षा भरी दृष्टि से देखने लगी। बैठे-बैठे तीन बज गए लेकिन सतीश अभी तक नहीं आया था। साधूराम उकता चुका था। वहीं बिछी खाट पर लेटते हुए शांति से बोला - "तुम खाना खा लो। अब वें आए भी तो रास्ते में खाना खाकर ही आएँगे…..।"

शांति ने कोई उत्तर नहीं दिया लेकिन चुपचाप रसोईघर घर की ओर बढ़ गई। तभी दरवाजे पर किसी की थाप पड़ी। शांति तेजी से रसोईघर से निकलकर बाहर की ओर बढ़ गई। तब तक सतीश दरवाजा खोलकर भीतर आ चुका था।

"सतीश।.... बेटा....।" - शांति खुशी से चिल्ला-सी पड़ी। तब तक सतीश और उसके पीछे-पीछे, आसमानी रंग की सिल्क की साड़ी बाँधे, सुमीता भी निकट आ गई थी। सतीश ने झुककर माँ के चरण स्पर्श किए और सुमिता की ओर इशारा करते हुए बोला - "ये हैं माँ, तुम्हारी बहू।" तब सुमिता ने शांति की चरण वन्दना की। सतीश तब तक साधूराम की ओर बढ़ चुका था। धीमे से "बाबू जी" कहकर उसने साधूराम के चरण स्पर्श किए और सुमिता को सम्बोधित करते हुए बोला - "सुमिता, ये बाबू जी हैं।" - तब सुमिता आशीर्वाद लेने आगे बढ़ी और साधूराम के चरणों में झुक गई। साधूराम ने कहा - "सौभाग्यवती रहो...।" - और कुछ भी न कह सका।

"तुमने बहुत देर कर दी, बेटा....।" - शांति ने तब बड़ी व्यग्रता से पूछा।

"माँ, रास्ते में कार खराब हो गई थी....।" सतीश ने माँ के प्रश्न का उत्तर दिया। अभी वे सब बरामदे में ही खड़े थे। सुमिता छुपी-छुपी नजरों से घर की दशा को देख रही थी। लेकिन जिस हेयपन की आशा साधूराम अपने इस घर के प्रति अपनी बहू से कर रहा था, वह कहीं भी सुमिता की नजरों में दिखाई नहीं पड़ रही थी। शायद सतीश ने पहले ही सुमिता को अपने माँ-बाप और इस घर की दशा से परिचित करवा दिया था।

"तुम कार पर आए हो....।" बच्चों जैसी खुशी के भाव अपने मुख पर लाती हुई शांति बोली- "तुमने अपनी ली है....? "

"अरे, अभी कहाँ, माँ, यह तो सुमिता के पिता की है।" - सतीश ने कहा और फिर एकाएक साधूराम की ओर, जो अभी भी चुपचाप किसी सोच में पड़ा था, देखकर बोला -"बाबू जी। मैं आ गया हूँ यहाँ आपकी बहू को लेकर, लेकिन लगता है अभी भी आप मुझसे नाराज हैं।"  लेकिन साधूराम जी को उसकी बात का उत्तर देने का अवसर ही नहीं मिला। शांति पहले ही बोल पड़ी- "तुम सब बाहर ही खड़े रहोगे या भीतर भी चलोगे। ……… चलो, कमरे में चलो……..।"

तब सतीश कमरे की ओर बढ़ा, उसके पीछे सुमिता, और साधूराम व शांति उन दोनों के पीछे। कमरे की दशा भी वैसी ही थी, जैसे उनकी बातों की सादगी से प्रतीत होती थी। सतीश को तो इसकी जानकारी थी, लेकिन सुमिता घर में प्रवेश करने से पहले केवल अनुमान ही लगा सकती थी और शायद घर की बाहरी दशा देखकर उसने जो अनुमान लगाया था, वह ठीक ही निकला था। एक तरफ दो कुर्सियाँ पड़ी थी पुरानी-सी, सामने दो चारपाईयाँ बिछी थी, जिन पर पुरानी चादर बिछाई हुई थी। और एक किनारे पर एक छोटा-सा मेज पड़ा था। यही कमरा था जिसे बाहर से आने वालों को बैठाने के काम में लाया जाता था। सतीश कोई मेहमान तो था नहीं, लेकिन सुमिता आज पहली बार इस घर में आई थी, इसलिए उसे एक मेहमान की नजर से ही देखा जा रहा था।

सतीश चारपाई पर बैठ गया और सुमिता को भी वहीं बैठने का इशारा करते हुए साधूराम से बोला - "आप भी बैठिए बाबू जी।"

तब शांति ने पूछा उनसे, "तुम खाना खाओगे न ?"

"नहीं माँ।" सतीश ने उत्तर दिया, "रास्ते में ही खा लिया था। हाँ, कुछ देर ठहर कर चाय पिला देना। अभी पानी पिला दो।"

सतीश के शब्दों से शांति को वही अपनापन महसूस हुआ, जो पहले होता था। सुमिता से न अभी तक किसी ने कोई बात करने की चेष्ठा की थी और न ही उसने अपनी नजरें उठाकर उनकी ओर देखा था। शांति के दिल में जो उल्लास था, उसके आने से पहले, उसकी बलाएं लेने का, उसकी आरती उतारने का, वह न जाने क्यों सुमिता को देखकर ठंडा पड़ गया था। ऐसा तो नहीं था कि सुमिता रूपवती नहीं थी।

वह सुन्दर थी, अति सुन्दर। लेकिन न जाने क्यों शांति उसे पुकारने में उससे बात करने में हिचक महसूस कर रही थी। उसमें अपने पन की थाह नहीं ले पाई थी अभी तक।

कुछ देर तक कमरे में चुप्पी छाई रही। तब सतीश ने साधूराम को सम्बोधित करते हुए फिर से कहा - "बाबू जी। आप चुप हैं बिल्कुल, और मुझे यह देखकर लगता है कि आप अभी तक नाराज हैं मुझसे……. ।"

तब साधूराम ने ठन्डी आह भरते हुए कहा - "बेटा, मैनें नाराज होकर क्या करना है। तुम अब समझदार हो, तुमने जो भी किया अच्छा ही किया होगा। जब मैं कुछ जानता ही नहीं तो कैसे अपनी राय दे सकता हूँ। बहू तुम्हारी देखी-परखी है, उसके माँ-बाप तुम्हारे जानकार हैं, तुम्हीं कह सकते हो सब कुछ मैं क्या कहूँ…….. । मेरा चुप रहना अच्छा ही है" - दो क्षण चुप रहकर सुमिता की ओर देखकर साधूराम ने फिर कहा - "पर तुम्हें यह अच्छा लगा आज कि किस खामोशी से इस घर की लक्ष्मी ने यहाँ कदम रखा। क्या यही तमन्ना पाल रखी थी हमने तुम्हारी शादी की बेटा……..?" तब सुमिता को सम्बोधित करते हुए उसने कहा -"तुम बुरा मत मानना, बेटी, मेरी किसी बात का। मैं तो तुम्हें देखकर ही इस बात का अन्दाज लगा सकता हूँ कि तुम मेरे बेटे की तुलना में हर दर्जे उसके समान हो। तुम्हारी जोड़ी बहुत सुन्दर है, और मेरी भगवान से यही प्रार्थना है कि तुम दोनों सदा सुखी रहो।…….. पर तुम्हीं कहो, यदि तुम ही अपने माँ-बाप को बताये बिना, किसी दूसरे शहर में, मेरे बेटे से विवाह कर घर बसा लेती तो क्या अच्छा लगता उन्हें? आज जो सतीश वहाँ अपना स्थान बनाए है, तब क्या इतनी जल्दी उनमें घुल-मिल सकता.....? "

"पर ऐसा होता ही क्यों……..? ऐसी चोटें तो हम जैसे अनपढ़-गंवार, छोटें आदमियों के भाग्य में लिखी हैं। बहुत भावनाएँ पाल लेते हैं हम लोग………., और कुछ होता जो नहीं पास समेट कर रखने के लिए………..। काश। मैं भी पढ़ा-लिखा होता, बहुत बड़ा अफसर होता या किसी मिल का मालिक होता - जानता भी न होता भावनाओं को और तब शायद आज के दिन घर भर में खुशी मनाई जाती…….. " - दो आँसू साधूराम की आँखो से टपक पड़े।

कहना कुछ सुमिता को था, लेकिन सतीश पहले ही बोल पड़ा- "बाबू जी। इतना कुछ तो मैंने नहीं किया जो आप भावनाओं में इस कदर बह गए। आपको मैं भी एक अजनबी लगने लगा हूँ। आप क्यों अपने को छोटा समझते हैं, छोटा तो मैं महसूस कर रहा हूँ स्वयं को यह देखकर कि आप मेरी किसी गलती को अब माफ करने से हिचकिचाने लगे हैं। मैं क्या अब आपके लिए बहुत बड़ा हो गया हूँ ?"

"यह तो तुम अपने से पूछो, बेटा। मैंने तो तुम्हें पहले ही कहा है कि तुम अब समझदार हो गए हो। किसी भी बात का निर्णय स्वयं कर सकते हो।" - बिल्कुल सपाट स्वर था साधूराम का।

"आप, बाबू जी, बिल्कुल एक अनजान भाव उपजा बैठे हैं मेरे प्रति अपने मन में। क्या मेरी खुशी आपकी नहीं ?"

"सब कुछ मेरा अपना था बेटा, लेकिन मेरी तमन्ना थी किसी को कहने की, "आओ। इस घर में आओ। इस घर की हर चीज तुम्हारी है। हमारी हर खुशी तुम्हारी हैं।" - लेकिन बेटा, ऐसा कहने का अधिकार तुमने छीन लिया मुझसे। आज बहू को यह कहने की हिम्मत ही नहीं हो रही, बेटा। लगता है, अब वह कहेगी, उसकी हर खुशी हमारी है। ………" - साधूराम भावुक हो चला था- "जो मेरे मन के अरमान थे इस घर की बहू के लिए, वह नहीं रहे। - एकाएक मर गए सभी।" तब सुमिता से बोला- "बेटी तुम्हें अच्छा लग रहा है आज का दिन। क्या ससुराल में ऐसे स्वागत की चाह पाल रखी थी तुमने……….? " - फिर क्षण भर कुछ सोचकर उसने कहा- "लेकिन शायद मैं ही गलत हूँ…. ।" - आगे उसने कुछ नहीं कहा। मन में ही दबा गया जो कुछ भी कहना चाहता था। सतीश की आँखे भर आई थी और सुमिता, उसने देखा, उसका चेहरा इस कदर हो रहा था कि उसने जान लिया यदि दो शब्द भी और कह डाले तो वह फूट-फूट कर रो देगी। कोई अज्ञात-सा बंधन जकड़ चुका था उसे सुमिता की भावनाओं से अपनापन महसूस हो रहा था, इसीलिए नहीं बोला आगे कुछ।


उधर शांति इस वार्तालाप के दौरान कभी सतीश को देखती, कभी साधूराम को और कभी सुमिता को। उसे पहली नजर में ही ऊपर से नीचे तक निहार कर शांति समझ गई थी कि वह इस समय चौथे महीने में जा रही है। विवाह को उनके अभी दो महीने भी नहीं हुए थे। तब मन ही मन शांति ने शुक्र मनाया कि उसने मौहल्ले में अभी तक सतीश की शादी का जिक्र नहीं किया । कहीं बता चुकी होती उन्हें तो सबको उनके आने का पता होता तो बहू को देखकर कौन नहीं जान पाता इस बात को।

शांति ने सतीश की आँखों में आँसू देखे तो आगे बढ़कर अपने आँचल से उन्हें पोछते हुए, ममत्व भरे स्वर में बोली- "रोते क्यों हो उनकी बात पर। तुम्हारे पिता हैं, कुछ भी कहने का अधिकार है उन्हें।"


और तब शांति चाय बनाने रसोईघर की ओर चली गई। कमरे में चुप्पी छा गई।

कुछ देर तक वे यूँ ही चुप बैठे रहे। शांति चाय तैयार करके ले आई। साथ में खाने के लिए बिस्कुट भी थे और उसके अपने हाथ की तैयार की हुई बेसन की मिठाई। सतीश उसके हाथ की बनी मिठाई बड़े चाव से खाता था, इसीलिए सुबह उठते ही उसने सबसे पहला काम यही किया था।

साधूराम का मन कुछ ठीक हो चुका था। चाय का एक घूँट भरते हुए उसने पूछा - "छुट्टी मिली क्या.....?

"जी, दस दिन की मिली है।" - सतीश ने उत्तर दिया।

"तब तो रहोगे अभी....।"

"जी....।" - सतीश एकाएक अटकटा-सा गया। एकाएक कुछ कहते न बना उससे -"जी वो ऐसा है, बाबू जी, हम प्रोग्राम बना कर निकले हैं की कल ही हफ्ते भर के लिए कश्मीर चले जाएगे और लौटती बार आपको साथ लेते हुए दिल्ली चले जाएगे....।"

"ओह....।" -- कहकर हल्की-सी नजर डाली उसने शांति के चेहरे पर उसकी भाव-भंगिमा पढ़ने के लिए। लेकिन वह चुपचाप बड़ी हसरत भरी नजरों से कभी सुमिता को देखती, कभी सतीश को और कभी उसे। जैसे चाह थी उसकी कहीं कोई फूट न पड़े और उसकी ममता कभी उसे तड़पाये नहीं। कुछ क्षणोपरांत साधूराम ने कहा - "परन्तु तुमने यह कैसे सोच लिया की हम तुम्हारे साथ चल पड़ेंगे.... ।" - साधूराम के शब्दों से जान पड़ता था कि पुन: आक्रोश भाव उसमें उमड़ने लगे हैं। लेकिन सतीश उसके उन भावों से बेखबर हुआ बोला- "आपको यहाँ रहकर करना भी क्या है? दिल्ली में सब कुछ है। वहाँ आपको पूरा आराम मिलेगा....।"

"आराम मिलेगा, ठीक है। लेकिन यह घर, यह दुकान, सब कुछ यहाँ का अपना मैं किसके हवाले करूँगा........?"

यह सुनकर सतीश ने कहा -"आप अभी तो इसे बंद कर चल पड़िए, फिर समय मिलते ही मैं आपको साथ ले कर यहाँ आ जाऊँगा और एक-दो दिन में सब बेच जाएँगे......।"


"क्या...... ? क्या कहा तुमने......।" - साधूराम यह सुनकर एकाएक उग्र हो उठा- "ये तुम कह रहे हो ? क्या कमी पड़ी है तुमको या की में भूखों मर रहा हूँ जो इस मकान को बेचने की सोच ली तुमने ?....." - कुछ देर कमरे में इधर-उधर बड़ी भावनामयी दृष्टि से देखता रहा वह, फिर बोला - "मुझे माँ-बाप का जिन्होंने प्यार दिया, उस मामा-मामी की यादों से भरे इस घर को मैं बेच दूँ। एक दुकान देकर जिस मामा ने मुझ हथकटे में एक नया साहस पैदा किया था, उसकी दी वही दुकान बेंच देने की सोचूँ।

- धिक्कार है मुझ पर। ....... ठीक है, तुम्हें मैं बचपन से बड़ा अफसर बनाना चाहता था, पर इसका मतलब नहीं कि तुम अपनी अफसरी में एकदम इतने ऊँचे उठकर सोचने लगो कि अपने सामने तुम्हें माँ-बाप, उनकी हर चीज छोटी लगने लगे......।"

तब सतीश ने बड़े शांत स्वर में कहा - बाबूजी। मैंने आपके सम्मान में तो ऐसी कोई बात नहीं कि और अगर आपको ऐसा महसूस होता है कि मेरे साथ चलकर रहने से आपकी इज्जत घटेगी और आपकी भावनाओं को चोट पहुँचेगी, तो बेशक आप यहीं रहें। मैं पुन: कभी आपसे आग्रह नहीं करूँगा। लेकिन बाबू जी मैं यह महसूस कर चुका हूँ कि अब आपके मन में मेरे लिए वह प्यार नहीं रहा, जो पहले हुआ करता था। क्या मेरा गुनाह इतना बड़ा है बाबू जी, कि जिसे आप कभी माफ़ नहीं करेंगे ?"

तब साधूराम रो पड़ा था फूट-फूट कर। सुमिता-सतीश, दोनों उसके एकाएक इतने भावावेग में बह जाने से डर गए थे। कुछ कहते भी न बना एकदम उनसे। चाय के प्याले आधे भरे यूँ ही पड़े रह गए थे। सब का ध्यान साधूराम की ओर लगा हुआ था। कुछ देर बाद साधूराम का रोना थमा तो सतीश ने कहा - "बाबू जी। यदि आपको इतना ही दु:खी होना था मेरे आने पर, तो मुझे लिख देते, मैं आता ही नहीं।" - सतीश कि आँखें पुन: भर आई थी।

तब शांति ने कहा - "और तेरे न आने का जो दुःख हमने पाल लेना था, कौन दूर करता बेटा ? ऐसे कहेगा तो बेटा, तेरे बिना सिवा तड़पने के हमारे पास क्या रहेगा ?" फिर एक क्षण साधूराम की ओर देखकर पुन: उससे बोली -"तू इनकी भावनाओं को पढ़ नहीं पाया बेटा। अपना कोई मेरे-तेरे सिवाए कौन है अब इनका। मैं तो बंधी हूँ इन संग इस तरह कि साँस भी अकेले नहीं ले सकती। और तेरे साथ इन्होंने अपनी सारी इच्छाएँ, अपने सारे अरमान बाँध रखे हैं। कुछ ऐसा यदि हो जाए जिसकी कल्पना न कि हो, तो मन एकाएक टूट-सा जान पड़ता है कभी-कभी। ऐसा ही हुआ है इन संग। समझते-सँभलते कुछ देर तो लगेगी ही.......।"

तब सतीश ने साधूराम से कहा था - "बाबूजी। मैं जानता हूँ आपको दुःख पहुँचा, लेकिन अब क्या यह उचित रहेगा कि उसी भावना की रौ में बहाकर आप आगे के सब दिन भी यूँ ही गुजार दें। अब सब भूलकर बाबू जी, हँस कर आने वाले दिन बिताने की कोशिश कीजिए....। अपना हठ छोड़िए और दिल्ली मेरे पास रहने की तैयारी कीजिए। यदि मन न लगा वहाँ आपका तो लौट आइएगा। यह घर कहीं जा तो नहीं रहा.....। आप कहते हैं तो मैं कश्मीर भी नहीं जाता। सुबह ही दिल्ली लौट चलते हैं....।"

सतीश के ये शब्द सुनकर साधूराम का मन कुछ हल्का पड़ गया था। धीमे से बोला - "तुम क्यों अपना प्रोग्राम ख़राब करते हो। जाओ घूम आओ, लौटती बार हमें ले जाना साथ ही।"

और तब न केवल सतीश के चेहरे पर मुस्कान उभरी, बल्कि सुमिता और शांति भी प्रसन्न हो उठी......।


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