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सूर्योदय से सांझ ढले
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सूर्योदय से सांझ ढले Voice and Text
     
सूर्योदय से सांझ ढले
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सूर्य सदा सर्वदा विधमान है। न छिपता है, न रूकता है, सदैव अपनी आलौकिक किरणें बिखेरता है। सभी कहते हैं उगते सूर्य को जल दो-वह तुम्हें तेज देगा, वह तुम्हें शक्ति देगा। जैसे-जैसे उसकी गर्मी बढ़ेगी जैसे-जैसे उसका प्रकाश बढे़गा-देखो ! वैसे-वेैसे वह तुम्हारे आसपास का अंधियारा मिटा देगा ----तुम प्रकाशमान हो जाओगे। उसी के साथ-साथ दिन-दुनी, रात-चैगुनी उन्नति करोगे। 


शाम तो नित्य होगी ----सूरज तुम्हें ढ़लता दिखेगा-लेकिन वह तुम्हारे लिए आराम का समय होगा। अगली सुबह तुम फिर उठोगे-एक नए उत्साह के साथ-नए दिन की शुरूआत करोगे-जहाॅं से कदम पीछे छोड़ा था-वहीं से उसे आगे बढ़ाओगे ! देखना तुम्हारे रास्ते में आई हर रूकावट तुम्हें अपने पथ से हटाने का भरपूर प्रयत्न करेगी, लेकिन तुम रूकना नहीं-मन की लगाम को ढ़ीला न छोड़ना। वह स्कावट राह तुम्हारी अवरूद्ध नहीं कर पाएगी।

लेकिन अमित इससे आगे की सोचता है सदा से। वह बचपन से ही न केवल उगते सूर्य को बल्कि पश्चिम दिशा में डूबते सूर्य को भी नमस्कार करता है। जाने-अन्जाने उसके मुख से बहुत पहले बीत चुके बचपन में एक वाक्य निकला था। अस्त होते सूर्य को नमस्कार करते देख किसी प्रियजन ने जब उससे कहा था---- ‘‘बेटा ! उगते सूर्य को नमस्कार किया करो। डूबते सूर्य को प्रणाम करना अच्छा नहीं होता।’’

अपने बुजुर्ग की बात सुनकर अमित के मुख से स्वतः बोल निकल पडे़े थे, ‘‘ऐसा क्यों ? मेरा मन तो यही मानता है कि सूर्य उगता और डूबता है इन आॅंखों को ही ऐसा दिखता है। हम जहाॅं खड़ें हैं उसी दिशा की बातें करते हैं। सूर्य कभी ढलता है क्या ? मैं तो समझता हॅूं सूर्य पूरब से निकलता है हमारी सुबह को और सूर्य पश्चिम में जाकर डूबता नहीं ----वह वहाॅ पश्चिम में फिर से उगता है। मैं सुबह पूरब से उगते सूर्य को नमस्कार करता हूँ और शाम को पश्चिम में उगते सूर्य को फिर से प्रणाम करता हॅूं ! मेरा दिशा ज्ञान इतना सीमित नहीं ----मेरा पश्चिम दूर समुद्र पार बसे लोगों के लिए तो पूरब है, बाबूजी !’’

यह बात अमित कैसे कह गया था, वह नहीं जानता। यह गूढ-ज्ञान की बात है। वास्तव में सूर्य तो स्थिर है। जहाॅं है, जैसा है वैसा ही बना है। हम ही नहीं देख पाते अपनी हर शाम को उसे। इसलिए नहीं कि वह डूब जाता है, बल्कि इसलिए कि हम दूर भागते हैं हर दिन उससे। हम दूर भागते हैं इस साक्षात सत्य से नित्य प्रति। और सूर्य से जितना भागते हैं, वह झट से हमें फिर अपनी जकड़ में ले लेता है। वह फिर से हमारे लिए नई सुबह का निर्माण कर देता है। हम फिर से भागने लगते हैं उससे दूर।

यह बात तो तीस बरस पुरानी है। तीस बरस पहले कही बात को साक्षात् देखा अमित ने जब पहली बार वह विदेश के लिए रवाना हुआ। सुबह-सवेरे छः बजे की फ्लाईट थी उसकी दिल्ली एयरपोर्ट से। उसे वेन्कूवर जाना था। सूर्य की पहली किरण अभी दिखी ही थी कि फ्लाईट उड़ चली। नौ घंटे बाद लंदन एयरपोर्ट पर पहॅुंचा। दिल्ली के हिसाब से उसकी घड़ी में तीन बज रहे थे और लंदन में तब समय था सुबह के साढ़े दस बजे का ! वह ! सूर्य तो सिर्फ चार घंटे पहले ही उगा था ! छः घंटे विश्राम के बाद लंदन के समय के अनुसार साढे चार बजे की फ्लाईट थी वेन्कूवर की ! हवा में उड़ा तो समय आगे की बजाए फिर से पीछे दौड़ने लगा था ! दस घंटे बाद जब वह लंदन से चला था। पच्चीस धंटे की थकावट और समय तेरह धंटे पीछे जा पहॅुंचा ! दिल्ली में तब फिर सूर्योदय हो चुका था और यहाॅं वेन्कूवर में सूर्य ढलने की तैयारी थी।

एकाएक अमित हंस पड़ा। वह किस सूर्य को जल दे। अपने देश में इस समय उगते सूर्य को या फिर उसी समय वेन्कूवर में डूबते सूर्य को। बचपन की बात उसे फिर से स्मरण हो आई। मन लड़कपन में फिर से लौट गया।

उसी लड़कपन में जहाॅं उसने हर दिन नए युग को देखा था उसी लड़कपन में जहाॅं, उसने नए-नए रूप में जीवन की सच्चाईयों को देखा था। उसी लड़कपन में जहाॅं से चलकर वह आज यहाॅं वेन्कूवर पहॅुचा था। बचपन से लेकर प्रौढावस्था आ गई लेकिन सूर्य वहीं का वहीं था।
 
(नोट: यह किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है। प्रकाशन के बाद जल्द ही इसे पाठकों के लिए वेबसाइट पर जारी किया जाएगा।)