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राम राज्य
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कल्प-वृक्ष
ISBN: 81-7220-092-7

  कल्प-वृक्ष 

 

मेरे मन में

एक बीज बोया था

तुम्हारे सलौने मुखड़े ने,

जो आज कल्पवृक्ष की मानिंद

फैल गया है

मेरे चारों ओर कई टहनियाँ लिए,

असंख्य पल्लव जिसे ढ़क कर 

नित नया रूप दिए जा रहे हैं

लेकिन

हर पल्लव में जानती हो 

एक ही छवि है -

मेरी प्रिया की,

और कुछ नहीं !

बस,

वह मुस्कुरा रही है

कहीं,

झुंझला रही है कहीं,

कहीं उदास खड़ी है

- जिसे मैं

अपने मन के हाथों से

सहला रहा हूँ

- जिसे मैं हरदम

हँसते-मुस्कुराते-गुनगुनाते

देखता हूँ !


मेरे लिए कितनी छाँव

की है इसने

- मेरा मन इन पल्लवों

को निहार

शीतल हो गया है

- ये मैं जानता हूँ !


तुम्हारे हर रूप का पहलू

मेरे लिए कितना 

सुखकर है

- ये मैं जानता हूँ !


चाहत है,

यह वृक्ष अडिग रहे

मेरे वजूद के रहने तक

ताकि

हम-तुम

दोनों

इसकी छाँव में बैठकर

खिलखिलाएँ

मुस्कुराएं

और खुशी से हर रूप में इसके आन्नद पाएं !