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राम राज्य
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सुबह का भूला
ISBN: 81-7220-092-7

सुबह का भूला 

 

 

कभी-कभी शब्द

अपनी राह भूल जाते हैं,

- भटक कर अपनी गली

कहीं और जाकर

अपनी गाथा सुनाने को

ललायित हो उठते हैं!

उनके कदम,

यूँ लगता है,

लड़खड़ा रहे हैं!

उनकी आँखें,

यूँ देखा है,

निरीह बनी

भटके हुए कदमों के

निशान तलाशती हैं! 

 

कदम खुद-ब-खुद

अपनी राह पर लिए,

शब्द जब लौटते हैं

- तब यही मुख से निकलता है

- "शाम ढले घर लौट आना

अक्सर इन सुबह के भूलों को

सूरज छिपने के बाद ही सूझता है!"