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राम राज्य
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दिनचर्या
ISBN: 81-7220-092-7

दिनचर्या 

 

(कॉलेज छोड़ते हुए मन उदास था, रह-रह कर एक ही बात मस्तिष्क-पटल पर उठ रही थी| अब कहीं और, कहीं और, जीवन चर्या का यही उद्देश्य! - इसका एहसास मोह जागृत करता है, जिसके शब्दों में आँसू हैं, और उन आंसुओं में वर्तमान के प्रति स्नेह!)

 

इस प्रांगण में मेरा

यह अन्तिम वर्ष है|

पिछले कुछ वर्षों से मैं

यहाँ बैठा

जीवन की कुछ

घड़ियों का निर्माण कर रहा हूँ| 

 

अब

इस वर्ष के अन्त में

मुझे इस प्रांगण में,

व्यतीत किए क्षणों को

बिखेरना होगा,

और

किसी दूसरे विकल्प की खोज में

कहीं और जाना होगा| 

 

एक नव-विकल्प...,

एक ऐसा विकल्प मुझे खोजना होगा

जिससे मैं और ग्यानार्जन कर सकूँ,

जिसकी छाया में बैठ मैं

जीवन की कुछ और

घड़ियों का निर्माण कर सकूँ! 

 

हम सब यहाँ

कुछ वर्ष पूर्व मिले थे...,

कुछ वर्ष

इस प्रांगण की छाया में

मिलकर हमने व्यतीत किए....,

कई बातें की...,

कई स्वप्न देखे|

 

अब  

इस वर्ष के अन्त में

हमें बिछुना होगा! 

हम अब बिछु जाएंगे,

कभी न मिलेंगे -

मिलेंगे भी तो एक

नए परिवेश में,

यह वर्तमान परिवेश

पुनः कभी सजीव न होगा|

 

हम दूर चले जाएँगे

एक-दूसरे की आँखों से

अपनी-अपनी दुनियाँ बसाने| 

 

नए पथ के साथी,

नई इच्छाएँ होंगी...,

हम अपनी उन्ही

भविष्य के वर्तमान की

इच्छाओं की पूर्ति में रत हो जाएँगे|

प्रयत्न करेंगे

मगर शायद कभी

हमारी चेष्टा न होगी

(और शायद ऐसा कभी होगा भी नहीं...)

कि

हमारा अतीत सजीव हो सके|

 

हमारे बिखरे-क्षण कभी

पुनः नहीं आएँगे...

कभी यदि स्मृतियों के पट

खुलेंगे भी तो

वही अतीत न आएगा...,

आएगा -

एक नया परिवेश,

परिवर्तित मुखाकृतियाँ

- बिखरा स्नेह,

विस्मृत क्षण,

नवीन परिस्थितियां! 

 

हम मिलेंगे कभी

बातें भी करेंगे...,

पता नहीं...

मगर....!

इस वर्ष के अन्त में  

हमें बिछुना होगा! 

 

(1975 रामजस कॉलेज दिल्ली की पत्रिका "आनंद पर्वत" से साभार)