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राम राज्य
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हताशा
ISBN: 81-7220-092-7

 

हताशा 

 

 

शून्य में

जा टिकी हैं मेरी आँखे

और

मन जैसे शब्दहीन बना

अथाह गहराईयों में सागर की

डूब गया है

- अस्तित्वहीन हुआ पड़ा मैं ... !

सामने

- ये स्याह छब्बे

नई-नई आकृतियों में  

प्रतिक्षण परिवर्तित होते

भय के दुरूह जंगल में

धकेलते जा रहे हैं मुझे,

मैं जानता हूँ

लेकिन

शीघ्र ही समय आएगा

मेरे पास

सिर्फ हताश होने के

कुछ न शेष रह जाएगा

और

चाह भी तो

करने की अब शक्ति नहीं

कि

कोई अदृश्य शक्ति मुझे

खींचकर

बाहर की दुनिया के

छल-प्रपंचों में

पुनः लीन कर दे

ताकि मैं हँस सकूँ

खिलखिलाऊँ,

विश्वास पने की  

किसी से चाह न हो

लेकिन

हर किसी को अपना

प्यार देता जाऊँ!