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राम राज्य
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खंडित मन
ISBN: 81-7220-092-7

खंडित मन 

 

खंडित मन

मेरा क्यों हो गया है...?

बर्फ की शिला कोई

किसी पर्वत शिखर से फिसलकर

राह अवरुद्ध कर गई!

सर्द हवाएँ

जमी हुई धूप,

गहन कोहरे के आँचल में

पल-प्रतिपल यूँ ही ठिठुरते

व्यतीत करता मेरा मन,

प्रतीक्षारत नयनों से  

सिर्फ यही चाहत लिए

कि समय पंख लगाकर उड़ जाए

कहीं दूर वीराने में

इन बर्फ की शिलाओं को साथ लेकर

और

इन सर्द हवाओं को भगाने

कोई प्रकाश-पुंज

गर्त से बाहर आकर

उजियारा कर दे!