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राम राज्य
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ओस की बूँद
ISBN: 81-7220-092-7

ओस की बूँद 

 

पत्तों पर गिरी

ओस की बूँदें जब

धरती पर गिर पड़ी

तो एहसास हुआ

हर एक पत्ते को

कि

ओस की बूँद के बिना

वह कितना अकेला है!

 

दिन भर सूरज की रोशनी

में झुलसना

अब उसकी नियति है

और

प्रतीक्षा है अब उसे

रात की!

रात चादँनी भी होगी साथ

और

ओस की बूँद भी मिल जाएगी

 

- रच जाएगी

हर एक पत्ते में,

ऐसे में

कितने सुखों की अनुभूति होगी

हर एक पत्ते को

 

यह मेरा मन जानता है,

क्योंकि

मेरी चादंनी

मेरी ओस की बूँद

- सभी तो दूर है

मुझसे

और

चाँदनी की शीतलता,

बूँद की ठंडक

की अपेक्षा

तन झुलस रहा है

मेरा

सूरज की रोशनी में

निरन्तर!