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राम राज्य
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चितौड़गढ़ (दो)
ISBN: 81-7220-092-7

 

चितौड़गढ़ (दो)

 

 

इतनी चुप्प

जिन्दगी नहीं देखी जाती! 

ढेर से सुख हों चाहे

लेकिन

जिन्दगी की चाल

इतनी सुस्त नहीं देखी जाती! 

 

यहाँ आकर

महसूस हुआ कि

लोग सुस्त क्यों हो जाते हैं

या फिर

उन्हें

जल्दी जंग क्यों लग जाता है....! 

 

महानगर में रहने का अर्थ

और

स्वाद  

यहाँ आकर मालूम पड़ा - 

 

हम भागा-दौड़ी में

अपने को व्यस्त किए

अपनी "मशीन" से

कुछ और नहीं

कम-से-कम

न्याय तो कर रहे हैं! 

 

यदि रोना ही था

या फिर

तरक्की पसंद नहीं होना था

तो अच्छा यही होता

कि

जहाँ ये समझते हैं

- ईश्वर बसता है

- चैन की वंशी बजाता है

- हमारी नियति बनाता है

- वहीं के वहीं बने रहते,

यहाँ आकर रहने की

ललक फिर कैसी? 

 

यह समाज बनाकर

ढीले-ढाले बनकर

नमक-तेल

और सूखी रोटी के

चक्कर में

सुबह से शाम बिता देने की

दिनचर्या भला किस काम की? 

 

आज महसूस किया

कि

जिन्दगी वास्तव में

जीना वह नहीं

कि

ऐसे जिएँ

- वैसे जिएँ

कि

कोई गम न हो

बस

सुबह से शाम होकर

रात में ढले

और

आँख खुलते ही  

सामने

नया सवेर हो! 

 

इस शहर में घूमा  

तो यही देखा

- बस,

नमक-तेल की दुकाने

दो-एक जूते-चप्पल की

या फिर

सिगरेट-बीड़ी की,

अन्त में

एक ताड़ी की

और

उससे आगे

एक किले की ऊँची दिवार!

जैसे

जिन्दगी

और आगे कहीं नहीं

- जैसे

यह दिवार अभेघ है

और

उसे चीर कर आगे बढ़ जाना

कोई धर्म का काम नहीं!

मैं

शहर की ढेर-सी चिन्ताएँ

कभी-कभी

व्यर्थ की समझता था

लेकिन

यहाँ की जिन्दगी तो व्यर्थतम है! 

 

मेरा शहर

कितना जीवित है

और

मेरे शहर का

हर क्षण

जीवन का यौवन है

- यह इस बूढ़े शहर

और  

चुपचाप बैठे

या फिर

सोये लोगों को देखकर

जाना मैंने! 

 

मेरे शहर ने

सिखाया है मुझे

अथक प्रयत्न,

हर नई सुबह के साथ

जीने की लग्न

और

नित नई कल्पनाओं को

साकार रुप देने में

स्वयं को मग्न! 

 

- यहाँ ऐसा कुछ क्यों नहीं?

- क्यों इस शहर की जड़े

सूखती जा रही हैं ....?  

क्या मुर्दाने इस शहर में

हमारे शहर का पानी

जान फूँक देगा ....?  

 

क्या यहाँ

जागृति आएगी?

- और क्या

हमारे शहर का हर प्रयत्न  

यहाँ

लोगों में

प्रयत्न करने की चाह,

कुछ करने की ललक लाएगा

या फिर

उन्हें और सुविधाएँ देकर

इसे बिल्कुल मरघट में बदल

देगा?

 

- क्या कोई

ऐसा मंत्र फूँक सकता है

कि यहाँ के लोग

स्वयं कुछ करने की ललक लिए,

हमारे शहर की और

भागने के बजाए,

हमारे शहर से मिली

एक राह पर

खुद-ब-खुद चलने की

कोशिश करें

और इसे किसी बड़े शहर

की भाँति  

आबाद कर दें

ताकि लगे यहाँ मुर्दे नहीं

तरक्की पसन्द

इन्सान बसते हैं !