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राम राज्य
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अतीत का दर्द
ISBN: 81-7220-092-7

अतीत का दर्द 

 

 

अस्थिरता

इतनी कि

मन शून्य में जा पड़ा है,

अपने आज को

विस्मृत कर

मन

पीछे के दिनों में लौट गया है!


वे दिन

अजनबी बने  

मुझे घूरते हैं,

वह आँगन

जो कभी मेरा था,

नए चेहरों की पर्त लगाए

मुझे भूल चुका है!

कोई चेहरा ऐसा नहीं

जो मुझे पहचानता हो| 


पलस्तर की एक नई पर्त

दीवारों के सभी घाव

भर चुकी है,

सफेदी चमचमाती हुई

पलस्तर के खुरदरेपन को

छिपा चुकी है!

 

कहीं कोई नहीं

जो मेरे आज के लिए

चिंतित हो....

अपने आज से

मुझे स्वयं

झूझना है,

समृतियों के घेरे से

निकल कर

आने वाले कल की

ओर बढ़ना है!