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राम राज्य
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निराशा (तीन)
ISBN: 81-7220-092-7

निराशा (तीन) 

 

रुक जा मन!

हत्या मत कर मन की,

विस्फरित नयनों से

देखती हैं

देखों!

अपनी ही कितनी अनुभूतियाँ....! 

 

कितने ही बोझिल

ऐसे क्षण,

कितने अधूरे तेरे स्वप्न ---

सिसकियों के स्वर भटकते

दम किसमें कि सह ले

अधूरी आकंक्षाओं का रूदन! 

 

धिक्कार नहीं

एक बार और,

और एक प्रयत्न ....! 

 

रुक जा मन

हत्या मत कर मन की!