+91-11-41631787
राम राज्य
Select any Chapter from
     
निराशा (दो)
ISBN: 81-7220-092-7

 

निराशा (दो) 

 

 

देखो!

कितने ही बाशिंदे हैं ऐसे

जिनका मन भूखा है! 

 

कितनी इच्छाएँ

आकाक्षाएँ कितनी

लेकिन

सभी अधूरी ही तो! 

 

कुछ कहने की तमन्ना

कुछ करने की ललक ....  

सिसकियाँ हैं

अंधेरा है...! 

 

गत्यातमक अनुभूतियाँ,

प्रावैगिक व्यवस्था

लेकिन मन अधूरा है! 

 

संवेदनाओं से परे

मन टूट जाने को कहता है,

गतिशील मन

विचलित हुआ

दर-दर की ठोकर खाता है....! 

 

देखो!

कितने ही बाशिंदे हैं ऐसे

जिनका मन भूखा है!