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राम राज्य
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निराशा (एक)
ISBN: 81-7220-092-7

निराशा (एक) 

 

तमन्ना मेरी

पीछे कहीं

किसी के आगोश में

बैठी है शायद.....! 

 

बरस पहले

स्वच्छंद भौंरें-सी

उड़ान थी मेरी,

लगता है

कहीं और जाने की चाह ने

दबा लिया है उसे  

अपने नीचे....! 

 

मुक्त होकर

अब कुछ कर सकूँ

शायद

अब नहीं हो पाएगा

- क्योंकि

अब नहीं रही तमन्ना 

 

- कहीं और जाने की  

बस....!

सोचता हूँ

बैठा रहूँ

और  

सोचता रहूँ

बस....!

निठल्लेपन से

घबरा जाऊँ

तो दो घूँट पी लूँ !