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राम राज्य
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कलियुग
ISBN: 81-7220-092-7

कलियुग

 

मेरी आकाक्षांओं  

का असीम आकाश

गिरने को है -

इसे प्रिया की बाँहों

में समेट कर,

अपना सिर

उसके वक्ष से  

टिकाकर भी  

अपने उपर गिरने से

नहीं बच सकता! 


यह गिरेगा

टूटेगा

और तोड़ जाएगा

मेरी आकाक्षांओं

की हर नई इमारत को!  

मेरी नई-नवेली

दुल्हन  

मेरी कल्पना की भी

इसे परवाह नहीं! 


काश!

इस आकाश को

गिरने से

कोई रोक लेता! 


काश!

इस आकाश को

अपनी उँगुली से

न सही

अपने दोनों हाथों से ही  

कोई थाम लेता! 


द्वापर का कृष्ण

न सही,

इस कलियुग में

कोई कंस ही आकर

मेरी आकांक्षाओं के

इस महल को बचा ले

क्योंकि

मैं जानता हूँ

कि

कलियुग में

कोई कृष्ण आकर

(या कोई कृष्ण है तो चाहकर)

भी  

कंस को मार नहीं सकता!