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राम राज्य
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माया का जाल
ISBN: 81-7220-092-7

माया का जाल 

 

माया के जाल में

उलझे लोग

बाहर निकलने की चेष्टा

नहीं करते

- छटपटाते भी नहीं

बस

जलते हैं

इर्ष्याग्नि से

और घने जालों में

जकड़े लोगों को देखकर,

"और मिले और"

 - बस, नहीं कहीं! 

 

सूरज निकलकर  

ढल जाता है

पसीने की बूँदें

एयरकन्डीशनरों के बल पर

अन्दर ही अन्दर

घुट कर

मर जाती हैं

लेकिन

मन नहीं थकता|

 

जाले को घना

करने की ललक,

रात के अन्धेरे

को चीर कर

उचकाती है

दीवारों के उस पार,

दूसरे के जालों से

अपने जाले की

मोटाई मापने

और 

मन्नतों के जोर पर  

 

अपने जाले को

और घना देखने

की तमन्ना लिए

स्काँच के दो घूँट

हलक से उतरने तक!