+91-11-41631787
राम राज्य
Select any Chapter from
     
नारों की भरमार
ISBN: 81-7220-092-7

नारों की भरमार 

 

बचपन में देखा था

- एक ही राजा

- एक सरकार

देश उन्नति की ओर अग्रसर,

सबको अपने काम से मतलब! 

 

थी बेरोजगारी की लम्बी कतार

हाथ कमजोर,

लेकिन

कुछ करने की तमन्ना

बढ़ा रही थी सबको अपने गन्तव्य की ओर! 

 

था भ्रष्टाचार भी

भूखमरी बहुत थी

- लेकिन वह मेरे किसी अपने की नहीं

एक बाहरी फिरंगी की बदौलत थी! 

 

उत्साह था मन में

हर किसी के,

नया दिन, नय सवेरा

लाने का हौंसला बुलंद था,

- "मैं भारतवासी हूँ

मुझे देश के लिए

कुछ करना है,

अपने भविष्य को

देश के भविष्य को

सुधारना है!" 

 

कल-कारखाने बनते रहे

देश आगे बढ़ता रहा,

फिरंगी कहीं फिर से

अपनी पैठ बढ़ाने लगा

- किताबों से

- कलपूर्जों से

- रंगीन सपनों की दुनिया में

ले जाकर

आदमी को खड़ा कर गया! 

 

और आम आदमी

अपनी चादर को भूल कर

दूसरों की चादर खींचने लगा

- दूसरे के घर को झाँकने लगा! 

 

मैं बड़ा हुआ

देखा मेरा अस्तित्व कहीं नहीं

बढ़ती भीड़ का हिस्सा बनकर

मैं जी नहीं सकता

- मैं स्वतन्त्र देश का नागरिक

- मुझे अधिकार है

- कुछ करने का,

कुछ करके बड़ा बनने का!

 

ऐसे में

मुझे भीड़ का अंग नहीं,

मुझे भीड़ से अलग हटकर

सबसे ऊपर उठना है,

ऊपर उठकर कुछ करना है

- कुछ करके दिखाना है! 

 

मेरा "मैं" जाग्रत था

कुछ करने की ललक थी

मन में

लेकिन

फल पहले से निश्चित था!

 

मैं करुँगा देश के लिए कुछ

ऊपर उठाउँगा देश को

- नए कल-कारखाने लगाऊँगा

- बेरोजगारी की कतार कम करुँगा

- भूखमरी मिटाऊँगा

लेकिन तभी जब

मैं भी राजा बन जाऊँ! 

 

यह राजा बनकर कुछ करने की

कतार में

केवल मैं नहीं

हर कोई आ खड़ा हुआ है! 

 

आज मैं भी राजा बनकर

कुछ करने को उत्सुक

- तुम भी

- तुम भी

- हर कोई!   

 

भीड़ को नियन्त्रित करने का  

 जिम्मा तो ले सकता हूँ

- काम का नियंता बनने

की चाह लिए

हरदम तैयार!

लेकिन काम करने वाले

मुझे जैसे राजा की

प्रजा बनने को

तैयार कौन....?

- चंद लोग

- वे जो मेरी सरकार चलाएंगे

जो देश को आगे बढ़ाएंगे -

लेकिन

वो भी अफसर शाही के मद में चूर

कठपुतली की मानिंद नाचते

कभी कुछ करते

कभी कुछ और करने को कहे जाते....!

 नारों की भरमार  

 

लेकिन राजा मुझसा

एक नहीं

कई सौ

कई हजार....!