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राम राज्य
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वीणा
ISBN: 81-7220-092-7

वीणा

 

प्रिय! देख रही हूँ बरसों से

तुम तो वीणा के वादक थे,

हर पल मुस्काते रहते थे

स्वर-साम नित्य सुनाते थे।

 

बाल-रवि जब उगता था

धरती का रुप निखरता था

किरणें जब रंग दिखाती थी

वीणा पर मस्ती छाती थी।

 

रुप प्रखर पा दिनकर का

जग जब जीवन पाता था

वीणा गतिरत हो उठती थी

पथ आलोकित हो जाता था।

 

फिर ताप भरी दोपहरी में

फूलों की छाँव में जाकर,

शीतल वायु के झोंकों संग

समता का खेल दिखाते थे।

 

टूटे तिनकों को जोड़-तोड़

एक नीड़ नया बनाते थे,

स्वर वीणा के निर्माता थे

नित नया राग बनाते थे।

 

संध्या-वेला को देख सदा

नत मस्तक तुम हो जाते थे,

जीवन को निर्झर कहते थे

वीणा में जीवन पाते थे।

 

वीणा के सच्चे साधक थे

शिवरूप की प्रतिमा कहते थे,

वीणा की झंकार में मस्ती

वीणा को जीवन कहते थे।

 

परिवर्तनशील जीवन को देख,

क्यों वीणा से मुख मोड़ लिया?

समता मे विषमता की छवि पा,

क्यों कर्म-पथ को छोड़ दिया !

 

भूले क्यों वीणा टूट गई,

भूले क्यों जीवन टूटा है?

अरे ! टूट गई केवल लय,

टूटा केवल स्वर है !

 

वीणा अब भी सुन्दर है,

वादक पर क्यों कर रोता है?

देखो ! अब भी जीवन-निर्झर

साम-स्वर में बहता है !

 

दो क्षण में क्यों कर परिवर्तन,

सुन्दर जीवन में क्यों रुद्वन?

प्यासा रहकर भी चातक

नहीं करता कभी क्रंदन !

 

पर क्यों क्रंदन तुम कर रहे,

क्योंक्या कुछ तुमने खोया है?

प्रिय ! आज तुम्हारे चेहरे पर

शून्य रुप क्यों छाया है?

 

क्यों टूट रहे बिन टूटे ही,

क्यों आँखों में है नीर भरा?

तिनका एक क्या कुछ कर सकता

कभी भाग्य लिखा क्या मिट सकता?

 

क्यों दीन दशा में पडा़ हुआ

पावक की भाँति जलता है?

पथ आगे भी तो फैला है

उस ओर नहीं क्यों चलता है?

 

जीवन को तुमने क्या समझा 

क्या लक्ष्य को तुमने पाया है?

टूटी नैय्या को देख आज

मन क्यों विचलित हो आया है?

 

मन को क्यों  समझाया,

क्यों कह डाला- "हाय टूट गया!"

कहते थे "वीणा सुन्दर है!"

क्यों सुर समता का टूट गया?

 

स्वप्न खेल है जीवन का !

स्वप्न सत्य क्यों मान लिया?

मृग-तृष्णा के पीछे पड़

वीणा का संग क्यों छोड़ दिया?

 

उजडा़ सपनों को देख आज

अस्तित्व-ज्ञान क्यों भूल गए?

रंग-रुप बदलते जीवन का

क्यों प्रखर रुप  देख सके?

 

रवि की भाँति अपनी ज्योति से

तुमने सबको पथ दिखलाया,

ऐसा भी क्या हुआ आज

क्यों निज पथ अवरुद्ध पाया?

 

टूटे पथ को कभी जोड़ना

तुमने मुझको सिखलाया था,

आशा की किरण दिखाकर

जीवन सफल बनाया था।

 

ऐसी भी क्या बात हुई

सत्य रुप क्यों भूल चूके?

भटक रहे बिन भटके ही

तन में क्यों कर शूल चूभे?

 

वीणा के वादक बनकर भी

तारों को क्यों कर तोड़ रहे?

जो टूट चुका उसका जोडो़,

क्यों टूटे ही को तोड़ रहे?

 

प्रिय! पथ अपना देखो,

क्यों देख रहे टूटे पथ को?

देखो सुन्दर वीणा को,

क्यों देख रहे टूटे स्वर को?

 

तुम वीणा के आराध्य,

वीणा के सच्चे साधक हो,

वीणा तुम बिन टूट रही

तुम वीणा बिन हो टूट रहे।

 

नीरसतानिराशा अपनाकर

भला कहाँ तुम जाओगे?

गतिशीलता जीवन की तजकर,

कभी क्या तुम कुछ कर पाओगे?

 

भूल जाओ वैराग्य तुम्हें,

जीवन संगीन सिखाएगा,

टूटा जीवन तो पहले है

टूटन जीवन को बताएगा !

 

समता का स्वर ये जीवन,

वीणा जीवन की उमंग,

उठो! झंकृत कर तारों को

समता की छेड़ो तरंग !