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राम राज्य
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उड़न तश्तरी बनी जिंदगी
ISBN: 81-7220-092-7

उड़न तश्तरी बनी जिंदगी 

(1 नवम्बर 1984 की स्मृति में)

 

आतंक

 घने बादल-सा आया,

बरस उठी बंदूक,

कहर बरसा !

शोर मच गया

शोर

- उड़ा डाला,

- मार डाला

मेरे मसीहा को !

 

किसने मारा ?

- कैसे मारा ?

कौन जात का ?

कहाँ से आया ?

- ऐसी जात को

ऐसे प्रांत को

खत्म कर दो

भून डालो !

बीज बोया था किसी ने

एक को नहीं,

पूरे जंगल को ही काट डालो !

 

फैली दहशत

मचा कुहराम !

भीड़ का रेला

रेले में चंद लोग

- रिमोट कंट्रोल

के बल पर

नाचते कठपुतले !

स्वार्थसिद्धि को

रातों-रात हीरो बनने की –

 

बंद कमरों में बैठे

चंद नेता

सहानुभूति,

नहीं-नहीं

स्वार्थपूर्ति के बल पर

भड़का गए

भाई को –

भाई के खून का प्यासा बना गए !

- उठा लो बंदूक,

तलवार-चाकू

काट डालो अपने भाई को !

लूट लो घर-बार,

खत्म कर डालो

एक वंश !

- एक वंश

ऐसा

जिसका बच्चा

लड़ा लहू से –

जिसका बच्चा

मिटा

माँ’ की रक्षा में !

उसी रक्षक को

लूट डालो !

 

उसी रक्षक को

भक्षक मानो,

जला डालो 

मार डालो !

- राज करने का यही समय !

 

थी एक हिंसा    

एक नफरत

जो फिरंगी की बदौलत,

एक हिंसा

अब हुई

जो मेरे अपने की हिमाकत !

 

लुटा देखा 

मैंने घर-घर

लुटा देखा

सिंदूर बहन का !

पत्थरों से मरते

सुना था पहले,

पत्थरों से मरते

देख लिया अपना जिगर !

 

इक सुबह हुई

- एक नया इतिहास

लिख गई

- बच्चे रोते

- माएं रोती

- रोते देखे बूढ़े दर-दर !

किसकी झोली में

मोती आए,

किसे मिली ख़ुशी

कोई नहीं समझा

किसे नहीं खबर !

शाम ढलने तक

आकाश धूएँ से भरा

देखा लहू सड़क पर !

 

यह लंका नहीं

जिसे जला डाला हनुमान ने,

यह रावण नहीं

जिसे मार डाला राम ने !

यह मेरा-तुम्हारा भाई,

 

जिसे मैंने या तुमने मार डाला !

- नफरत के राक्षस ने

इस कलियुग में

अपने घर के हर राम को मारा !

- ‘राम’ के हर बंदे को मारा !

- ‘राम’ की इस भूमि पर

लहू बहा हर लक्ष्मण का

कलियुग में अवतार हुआ

नफरत का,

कलियुग में अवतार हुआ

राक्षस का !

 

उड़नतश्तरी अब बनी जिंदगी,

न देखी

न सुनी

सभी कहतेयही जिंदगी !

 

यही जिंदगी !