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राम राज्य
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नियति
ISBN: 81-7220-092-7

नियति

 

अस्त हुआ सूरज

फिर निकलेगा

रात के अंधियारे को

नए सिरे से चीरकर !

 

 ठहरना

 घबराना

 दिल फेंक कर

गिर पड़ना किसी किनारे

और

फफकना

अंधेरे को देखकर!

 

नियति का दस्तूर है

चलना,

चलते रहना

और

नए सिरे से

अपनी मंजिल की ओर

बढ़ते रहना !

 

और फिर

सूरज की मंजिल तो शाम है

अंधियारा नहीं !

शाम की लालिमा

सौंदर्य का चर्मोत्कर्ष है

और

यही सौन्दर्य

ललायित करता है

सूरज को फिर से निकलकर

उसी शाम तक पहुँच जाने को

-- हर दिन

-- हर क्षण !