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राम राज्य
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भाईचारा
ISBN: 81-7220-092-7

 भाईचारा

(यह कविता सन १९८९ में लिखी थी लेकिन आज भी यह सार्थक है इसका आनंद लें और सब को दें ......अश्वनी)

 

 कहीं जाति

कहीं धर्म के नाम पर

नारा बुलन्द है 

- एक हो जाने का!

भारत पर नहीं

अपनी जाति

अपने धर्म पर

मर-मिटने की आवाजें

घर-घर,

गली-गली

गूँज रही हैं -  

 

लगता है,

भारत पर मर-मिटने वाला

अब

देश का प्रहरी ही रह गया है! 

कोई आत्मदाह को बेचैन

कोई आमरण अनशन को,

कोई राईफल की गोली चलाने को बेताब,

तो कोई

बम के आतंक का नियोजक! 

दिशाहीन जीवन की गाड़ी

अनवरत चल रही है

- बहसें हो रही हैं,

- बंद-हड़तालों का आयोजन है

- आतंक फैला कर

अपना राज कायम करने का प्रयोजन है! 

 कोई दमन-चक्र में

पिसने की दुहाई दे कर

‘जे.के.एल.एफ’ बनाता है,

तो कोई धर्म की दुहाई देकर

अपने घर में एक नया घर

बनाने को उतारू है

और कोई

इतिहास की दुहाई देकर

इतिहास दोहराना चाहता है !

 

मेरा धर्म क्या है ?

मैं हिन्दू

मैं मुसलमान

मैं सिख

मैं ईसाई .....

लेकिन मेरा ‘मैं’

मुझमें छिपी-बसी

भारतीयता को भूल चूका है !

मेरा भारत कहाँ है ---!

किसी मंदिर में ---?

किसी मस्जिद में ...?

किसी गुरुद्वारे में ---?

या कि फिर गिरजे में ---?

 

और

मेरा विकास कहाँ है ?

जाति की दुहाई में,

धर्म  की चादर में,

बंद-हड़तालों में,

या बम-गोली की आवाज़ों में ---?

या कि फिर

अनवरत बढ़ते कदमों में,

मशीनों की आवाजों में ---?

मेरा ‘मैं’

निशब्द

देखता है अपने आसपास

कुछ मानता है इतिहास

कि --

 

लंका थी या नहीं,

विभीषण था या नहीं

लेकिन एक बात सिद्ध है कि

विभीषण नें लंका को गिरवाया था

पाप की गर्त को भरवाया था !

 

अब ये पाप की गर्त

फिर खुद रही है

इस गर्त  को पाटने

मेरे मंदिर का राम,

मेरी मस्जिद का मुहम्मद,

मेरे गुरुद्वारे का नानक,

मेरे गिरजे का ईसा

फिर से आएगा

उसे नहीं चाहिए

उपासना के लिये

मंदिर,

मस्जिद,

गुरुद्वारा

या गिरजा,

उसे चाहिए

एक घर,

एक परिवार

हँसता हुआ भारत

और

भाईचारा !