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खोखली नींव
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खोखली नींव (तीस)
ISBN: 345

 राह चलते वक्त सुदर्षन यह सोच रहा था कि अब वो अपने किसी भी पुराने मित्र से बात नहीं करेगा। हमेषा अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर कार्य करेगा और किसी कार्य को आरम्भ करने के पूर्व भलि-भांति विचार किया करेगा, स्वयं से उसके स्वरूप-परिणाम के विषय में तर्क-वितर्क किया करेगा। ध्यानमग्न होकर प्राध्यापक का भाषण सुनेगा और फिर पुस्तकालय में बैठ कर अघ्ययन किया करेगा। सदा समय का सदुपयोग करने के लिए उसने अपनी समय-सारिणी का निर्माण कर लिया। उसका मन कह रहा था ‘सुदर्षन ! अमित को मित्र? बनाओ।’’

‘मगर किस मुंह से ?’
‘मैने उससे मित्रता खत्म ही कब की थी ? मित्रता तो मेरे कुकमों ने तोड़ी थी ! अब उन कुकमों से मेरा सम्बध टूट चुका है अब सुदर्षन वैसा ही बन गया है, जैसा बचपन में था , अमित जैसा !’
 
प्राध्यापक का भाषण सुनने के पष्चात वो पुस्तकालय में आकर, बड़ी तन्मयता के साथ अघ्ययन करने में जुट गया। अभी आधा-घंटा ही बीता, कि उसका मन उचटने लगा। उसकी दृष्टि पुस्तक से हटकर, पुस्तकालय के प्रवेष-द्वार पर जा लगी। वह आने-जाने वाले विद्यार्थियों केा देखने लगा। तभी एक अपंग विद्याार्थी पर उसकी दृष्टि पड़ी। वह चौंका। उसकी प्राकृतिक-टांगों के स्थान पर एक-एक फुट लम्बी दो लकड़ी की टांगें लगी हुई थ्ी।
 
उसका व्यक्तिव बहुत आकर्षक था ! उसका चेहरा भरा हुआ था और उस पर सदा विराजमान रहने वाली मुस्कुराहट थी। उसकी छाती चौड़ी-चकली थी। ओह ! यदि उसकी टांगे होती, तो वह कितना सुदर लगता। उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर दृष्टि डालकर सुदर्षन का मन खिन्न हो उठा।
 
उसके पास एक छड़ी थी। जिसका सहारा लेता हुआ वो पुस्तक-कक्ष में चला गया। सुदर्षन की दृष्टि पुस्तक-कक्ष के दावाजे पर टिकी रही। पांच मिनट पष्चात वह उसे वापिस आता नजर आया। उसके हाथ में एक मुस्तक थी। जिसे ‘इषू’ करवाकर वह अध्ययन-कक्ष में आ गया। सुदर्षन के साथ वाली कुर्सी खाली थी। वह उसी की ओर बढ़ आया। सुदर्षन की दृष्टि अब भी उस पर टिकी हुई थी। अपनी पुस्तक को मेज पर रखकर, उसने एक हाथ से मेज को पकड़ा और दूसरे हाथ से कुर्सी को पीछे धकेला। फिर वह उचक कर कुर्सी पर बैठ गया। अब उसके सम्मुख कुर्सी को आगे, मेज से सटाने की समस्या थी। अपने षरीर का एक भाग उसने उपर किया और हाथों के जोर से कुर्सी का वही भाग आगे सरकाया। सुदर्षन सब देख रहा था। झट से उठकर उसने उसकी कुर्सी को मेज के साथ सटा दिया। उस अपंग विद्यार्थी ने मुस्कुरा कर सुदर्षन की ओर देखा और कहा ‘‘धन्यवाद !’’
 
सुदर्षन बस मुस्कुरा दिया।
वह विद्यार्थी अपने अध्ययन में जुट गया। षिक्षा के प्रति उसकी इतनी गहरी रूचि देखकर, सुदर्षन अपने मनो-मस्तिष्क के संग विचारलोक की गहराई में उतर गया। वो सोच रहा था ‘‘कुदरत के खेल भी कितने निराले हैं। सृष्टि का निर्माण हुए हजारों-लाखों वर्ष हो गए हैं मानव ने अदभुत तरक्की कर ली है। हर क्षेत्र में सुविधाएं जुटाने के लिए उसने आष्चर्यजनक आविष्कार किए हैं। मगर अभी तक वेा कुदरत के हाथों कठपुतला बना हुआ है। वो उसका दास हैं ये कुदरत ही तो है, जो उसके आविष्कारों को कभी-कभी बहका देती है और वो आविष्कार विध्वंस कर देते हैं इस युवक को ही लो। जग में जब इसने पग रखा था, तो हमारी तरह इसके भी दो टांगे थी, ईष्वर ने इसे आकर्षक-रूप प्रदान किया है। मगर इसी की माया के फलस्वरूप बेचारा अब दया का पात्र बनकर रह गया है। हर क्षण इसे किसी की दयादृष्टि की आवष्चकता रहती है। बेचारा ! कुदरत का मारा ! जीवन-पर्यंत लागों की दयादृष्टि पर निर्भर रहेगा !’’
 
उस उपंग के प्रति दया भरे दा-चार षब्द और फेंकता, उसका मन, मगर एकतीव्र हंसी सुनकर उसकी वाणी रूक गई। वो चौंक उठा। इधर-एधर देखने लगा। उसे अपने सम्मुख एक मानवाकृति के खड़े होने का आभास हुआ। आकृति स्पष्ट दृष्टिगोचर न हो रही थी। उसके चारों ओर धुंध छायी हुई थी। पर उसे ये गुमान जरूर हो गया था कि हंसने वाली यही आकृति हैं तभी वो बोली ‘‘हां-हां-हां-हा-हा !’’
 
‘‘मैं समझा नहीं !’’
मन ने अचम्भे से पूछा।
‘‘अरे अज्ञानी ! तू उसे बेबस कहता है, निरीह समझता है ! सुदर्षन ! बेषक वो कुदरत का मारा है, मगर किसी की दया का पात्र बनकर वो नहीं रहना चाहता। वह आत्मविष्वासी है वह कर्मण्य है। कर्म कर रहा है। देख नहीं रहे, कितनी तल्लीनता के साथ वह अध्ययन कर रहा है ! आखिर क्यों ? वह अपनी ष्क्षिा के प्रति इतना सजग, इतना उत्साहित क्यों है ? जानते हो ? नहीं न ! अरे ! उसके भीतर आषा की अमर ज्योति जल रही है आषा का दीपक उसे जाग्रत रहने को उत्साहित कर रहा है ! और सुदर्षन, उसे विष्वास है कि वह एक दिन उस किरण के सहारे, प्रयत्नों के सहारे अपने ‘लक्ष्य’ को पा लेगा। सुदर्षन ! एक दिन उसे सफलता जरूर मिलेगी।
 
‘‘उसको देखों ! कितना तल्लीन है अध्ययन में ! इसका परिणाम जानते हो ? इससे उसका भावी जीवन सुखमय बनेगा। सुदर्षन ! वर्तमान में हथौड़ेां की चोट खाए बिना, सुखमय-भविष्य की केवल कल्पना की जा सकती है ! तुम समझते हो, अपंग व्यक्ति कोई कार्य नहीं कर सकता। अरे ! प्रयत्न किया जाए, तो क्या असम्भव है ! प्रयत्न करना वह परम-धर्म मानता हैं वह निराषावादी-प्रकृति का नहीं हैं जीवन में उसे सफलता, आत्मिक-आंनंद के दर्षन अवष्य होंगे, उसे किसी की दया-दृष्टि की आवष्यकता महसूस नहीं होगी। वह अपनी ष्क्षिा के बलपर अच्छी नौकरी पा लेगा। अच्छा वेतन लेगा। पेट भरना उसके लिए कठिन न होगा। अब तुम किस सोच में पड़े हो, सुदर्षन ! क्या अब भी तुम मानव जीवन का अर्थ नहीं समझे ? सुदर्षन ! जीवन कर्म करने का नाम है। हमें ऐसे कर्म करने चाहिए जो हमारे भविष्य को उज्जवल बनाने में सहायक हो, सफलता प्रदान करने में सहायक हों। अपने कर्तव्य को पहचानो तुम्हारा कर्तव्य एकाग्रचित होकर अध्ययन-मनन-चिंतन करना है मानसिक षारीरिक बौद्धिक उन्नति करना हैं विविध प्रकार का ज्ञानार्जन, सांसारिकता से न्यूनतम सम्बंध रखना और समुचित व्यवहार भी तुम्हारे कर्तव्य-पथ के अंष हैं। सुदर्षन उठो, अपने कर्तव्यों को पहचानों, समुचित अधिकारों की सहायता से उनका पालन करना षुरू कर दो। इसी से तुम्हें आत्मिक आनंद मिलेगा।
 
‘‘सुदर्षन ! आत्मज्ञान सबसे बड़ा ज्ञान है। उसकी प्राप्ति के पष्चात मनुष्य सदैव सत्य एवं सात्विक कार्य करता है, समाज का दूषित वातावरण उस पर प्रभाव नहीं डाल पाता।’’
 
वह आकृति मन के सम्मुख अब स्पष्ट हो चली थी। वह आत्मा थी, आत्मज्ञान का रूप थी। सब कुछ सुनकर सुदर्षन के चेहरे पर आलोक छा गया। स्वयं से, मन में बोला ‘‘मैं जग को जल्द ही अपनी खोखली-नींव का खोखलापन दूर करके दिखाउंगा। हे ईष्वर ! मुझे भरपूर सहयोंग देना, मेरे आत्मज्ञान में वृद्धि करना !’’
 
और फिर वह पढ़ने में लग गया। कुछ देर पष्चात घंटी बजी। अब फिर उसकी लेक्चर-क्लास थी। वह उठ खड़ा हुआ। उसने ‘उस’ कर्मण्य की ओर देखा, जो अपने अध्ययन में मग्न था। सुदर्षन मुस्कुरा कर, उसके कंधे पर हाथ रखकर बोला ‘‘धन्यवाद, मेरे अंजान मित्र !’’
 
उस अपंग ने चौक कर गर्दन उठाई। सुदर्षन को मुस्कुराता देखकर बोला ‘‘आपसे मुझसे कुछ कहा ?’’
‘‘जी हां ! आपका बहुत-बहुत धन्यवाद !’’
मुख पर छायी मुस्कुराहट और गहरी हो गई।
‘‘मैं समझा नहीं ! किसलिए ?’’
 
उसे सुदर्षन के व्यवहार पर अचम्भा हो रहा था। सुदर्षन फिर बोला ‘‘बस यही समझ लीजिए कि आपने मुझमें उत्साह जाग्रत किया और इसी उत्साह के बल पर, इसी आत्मज्ञान के बल पर मैंने अपनी सच्ची राह पर चलने का प्रण किया है !’’ और फिर सुदर्षन वहा रूका नहीं, प्रेम से उसका कंधा थपथपा कर बोला ‘‘फिर मिलंूगा !’’
 
अघ्ययन-कक्ष से निकल कर सुदर्षन अपनी कक्षा की ओर कदम बढ़ाने लगा। उसके हर कदम से एक उत्साह भरी आवाज़ निकल रही थी:
 
बायंे कदम से ‘लक्ष्य’ तो दांये से ‘कर्तव्य’ ! उसके मन में भी यही षब्द गूंज रहे थे
लक्ष्य !
कर्तव्य !
मुख पर छाये आलोक की आभा तीव्र होती जा रही थी।