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खोखली नींव
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खोखली नींव (सताइस)
ISBN: 345

 गीता !

 
मां-बाप के आधुनिक विचारों की छाप उस पर भी लगी हुई थी। संस्कारों के रूप में उसे नास्तिकवाद के दर्षन करने को मिले थे। क्लबों और होटलों मे उसके चरण बचपन से ही पड़ गये थे। जब वह उन्नीस वर्ष की थी। षराब, सिगरेट का सेवन तो उसने अपने बचपन से ही षुरू कर दिया था।
 
जब वह सिर्फ छः वर्ष की थी, उसने पिता को षराब पीते देखा। उनसे उसके बारे में पूछा। आग्रह किया, तो एक घंूट पीने को मिल गया। पिता की जूठी सिगरेट को उठाकर कष कई बार लगाये। बचपन था। बचपना समझकर हंसी में टाल दिया गया। परंतु जब वह बड़ी हुई, षराब को उसने अपना साथी बन लिया। चार वर्ष होस्टल रही। खूब मस्ती उड़ाई वहां उसने, सिगरेट पीती थी, षराब पीती थी, आवारागर्दी करती थी। एक भारतीय नारी होकर भी वह भारतीयता को नहीं पहचानती थी। भारत की संस्कृति क्या कहती है ? इन सबसे वह अनभिज्ञ थी।
 
उच्चतर माध्यमिक के बाद वह होस्टल से घर लौट आई। कॉलेज में दाखिला लिया। कदम और आगे बड़ गए। सुदर्षन मिला। उसकी साथी बन गई। तभी उसे एक सीख मिली। एस0 पी0 साहब की फटकार ने, षिवचरण बाबू के वचनों ने उसे स्त्री की वास्तविक स्थिति से परिचित करवा दिया। उसे तब मालूम पड़ गया कि वह अब तक जो कर्म करती रही वह बुरे होते हैं, वह भावी जाीवन को कष्टदायक बनाते हैं। वह जान गई कि एक भारतीय नारी को सुषील और सात्विक विचारों वाली होना चाहिए, उसे आधुनिक समाज के गंदे रास्ते की ओर नहीं जाना चाहिए, बल्कि उसे उस रास्ते का घोर विरोध करना चाहिए और उस पथ के पथिकों को समझा बुझाकर जीवनदायक राह पर चलने को प्रेरित करना चाहिए। एक गलत पुरूष को ज्ञानवान स्त्री बड़ी सरलता से समझा सकती है। इसलिए स्त्री को अपने यौवन में संयम के साथ ज्ञान प्राप्त करना चाहिए और समाज-सुधार के कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना चाहिए। क्लबों और होटलों में वासना का नंगा-नृत्य होता है, वहां का साथी औरत के षरीर का दिवाना होता है और औरत भी उस विषैले वातावरण में पलती हुई अपना सर्वस्व लुटाने में हिचकिचाती नहीं।
 
गीता आजकल एकांतवास कर, अपने भीतर संयत की भावना को जागृत कर रही थी। गहन-चिंतन अब एक सप्ताह से उसका साथी था। इतने ही दिनों से वह महाविद्यालय न गई थी। दिनभर वह ज्ञानषील पुस्तकों का अध्ध्यन करती और सुबह-षाम पढ़े हुए पर चिंतन।
 
आज उसे अपना मन हल्का महसूस हो रहा था। मन पर छायी हुई घुुंध अब छट चुकी थी और वह स्वयं को तंदुरूस्त महसूस कर रही थी। न अब उसे सिगरेट की तलब महसूस होती थी, न षराब की। उसके मनोविचारों में भारी परिवर्तन आ चुका था। वह एकदम इतनी बदल जाएगी, कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। यह सत्य ही कहा गया है कि प्रत्येक मानव के जीवन-काल में एक घड़ी ऐसी आती है कि उस घड़ी किया जानेवाला प्रण उसके जीवन पर पूर्ण रूप से हावी हो जाता है। वह घड़ी गीता के जीवन में आ चुकी थी। उस घड़ी उसने षिवचरणबाबू के सम्मुख अच्डा बनने की सौगंध खाई थी। सब कुछ संयम एकं दृढ़-संकल्प का फल था !
 
स्नान करने के पष्चात गीता फूल चुनने के लिए बाहर लॉन में आ गई। लान में एक कुर्सी पर उसके पिता बैठे थे। गीता को देखकर वह मुस्कुराये। मुस्कुराती हुई गीता फूलों की क्यारी की ओर बढ़ गई और ताजे फूल तोड़ने लगी। यह देखकर महेंन्द्रनाथ बोले ‘‘गीता ! यह फूल किसके लिए तोड़ रही हो ?’’
‘‘पूजा के लिए, डैडी !’’
‘‘पूजा !’’,
‘‘जी ।’’
‘‘कब से षुरू कर दी तुमने पूजा ?’’
‘‘दिल ने जब से सलाह दी।’’
‘‘नास्तिक के घर में आस्तिक का जन्म ! अनोखा चमत्कार है।’’ स्वयं से उन्होंने कहा, फिर हंसते हुए गीता से बोले ‘‘बेटी ! हम ठहरे नास्तिक आदमी, कभी भगवान के दरबार में गये नहीं, तुम हमारे हिस्से की पूजा भी कर दिया करो।’’
गीता उनकी बात सुनकर मुस्कुरा दी। फिर बिना कुछ बोले भीतर आकर पूजा करने लगी। तत्पष्चात तैयार हुई और नाष्ता करके कॉलेज को चल दी।