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खोखली नींव
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खोखली नींव (छब्बीस)
ISBN: 345

 इस समय सुबह के ग्यारह बज रहे थे। कॉलेज-हॉल की सीढ़ियों पर ब्रजेष, हर्ष ओर सुरेन्द्र बैठे थे। तीनों के बीच हो रहे वार्तालाप का विषय सताईस सितम्बर की रात की घटना थी। ब्रजेष, सुरेन्द्र को सुदर्षन के विष्वासघात के विषय में बता रहा था। क्रोध से उसकी मुटिठयां भिंची हुई थी। ऐसी ही दषा हर्ष की थी। सब कुछ सुनकर सुरेन्द्र बोला ‘‘इसका मलतब यह हुआ कि सुदर्षन ने विष्वासघात किया तुम संग ?’’

‘‘बिलकुल !’’
‘‘साले से बदला लूंगा !’’
क्रोधित सर्प की भांति फुंफकारते हुए हर्ष ने कहा।
 
‘‘लेकिन षांति से’’ सुरेन्द्र उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोला, ‘‘मार-काट से कुछ फायदा न होगा। हमें चाहिए कि हम उसे इस ढंग से ठोकर मारे कि उसे इस बात का एहसास हो जाए कि मित्रों के साथ विष्वासघात करने का फल बुरा होता है’’
 
‘‘जब कभी मौका हाथ आया, साले को नंगा करके छोडूंगा।’’ यह ब्रजेष का क्रोधित स्वर था।
 
तभी तीनों को सुदर्षन दिखाई पड़ा। वो उन्हीं की ओर आ रहा था। सुदर्षन समीप आया, तीनों ने फीकी मुस्कुराहट के साथ उसका स्वागत किया। उसके प्रति आक्रोष-भावों को वो बड़ी सफलता के साथ छिपा गए। इधर-उधर की, बेकार की बातें चलने लगी।
‘‘ब्रजेष !’’
चरस-युक्त सिगरेट का एक लम्बा कष खींचते हुए सुदर्षन ने उसे पुकारा।
‘‘क्या ?’’
‘‘यहां बैठे मक्खियां मारने का क्या फायदा ? चलो, पते लगाएं।’’
ब्रजेष को जैसे मन-मांगी मुराद मिल गई। वो खुषी से बोला चलो !’’
 
चारों अपने अडडे की ओर चल पड़े जुआ भाग का खेल है मगर ये एक कला भी है। ब्रजेष इस कला का उस्ताद था। कभी-कभी जब कला न साथ देती, तो वो हेरा-फेरी का साथ अपनाता था। आज तो वो अपनी कला के प्रयोग के साथ-साथ खुलल्लम-खुल्ला हेराफेरी भी कर सकता था। वो तीन थे और सुदर्षन अकेला। प्रतिषोध की भावना पूरा जोर पकड़ चुकी थी आंखों-ही-आंखों में ईषारे हो गए। तीनों मुखों पर कुटिल मुस्कुराहट विराजमान थी।
 
दस मिनट तक चलने के पष्चात वो अपने लक्ष्य-स्थ्ल पर आ पहंुचे। यह एक छोटी-सी पहाड़ी थी। वृक्षों के झुरमुट के बीच में उन्होने अपनी समाधि ली और ‘फलैष’ खेलने लगे। चारों बडें-बड़े दांव लगा रहे थे ।
‘‘ये मेरी दस की चाल !’’
साथ ही सुरेन्द्र ने दस-दस रूप्ये के दो नोट फेंकें।
‘‘चालीस !’’
हर्ष ने चार दस-दस के नाट फेंकते हुए कहा।
‘‘अस्सी !’’
साथ ही ब्रजेष ने नोट फेंके।
अब सुदर्षन की बारी थी। पतों को देखने के लिए वो उन्हें बिल्कुल आंखों के नजदीक ले गया। उसकी इस ध्यानमग्नता का लाभ उठाया ब्रजेष ने !
‘‘सुरेन्द्र ! जरा दस रूप्ये देना।’’
कुछ निर्णय कर सुदर्षन ने सुरेन्द्र से रूप्ये मांगे। सुरेन्द्र ने कुछ सोच कर उसे दस रूप्ये थमा दिये।
‘‘एक सौ साठ !’’
 
अपनी सारी जेब खाली कर दी सुदर्षन ने। षायद उसे अपने ‘पतों’ पर बड़ी आषा थी। वो तब सोच रहा था कि इन तीनों की जेबें खाली करने के पष्चात किसी क्लब में जाकर वे बड़े-बड़े दांव लगाकर खेलेगा। भाग्य तो उसका तेज है ही, उसके सिवाए कोई और नहीं जीत सकेगा। वहां से जब वो लौटेगा, तो उसकी जेब में लाखों रूप्ये होंगे। आ-हा !
 
आ-हा !
‘‘पैक !’’
सुरेन्द्र ने अपने तीन पते षेष ताष की गडडी में मिला दिये। हर्ष भी बिना कुछ बोले पैक हो गया। अब ब्रजेष की बारी थी।
‘‘षो !’’
साथ ही ब्रजेष ने नोट फेंके।
बादषाह का जोड़ा !’’
सुदर्षन आत्मविष्वास से बोला।
‘‘बस !’’
और मुस्कुराते हुए ब्रजेष ने उसके सम्मुख अपने पते रख दिये। उसके पास तीन गुलाम थे ‘तरेल’ थी ! वो बाज़ी जीत चुका था। सुदर्ष्रन को अपना सिर घूमता महसूस हुआ। वो बुत बन कर बैठ गया।
‘‘और खेलागे ?’’
ब्रजेष ने पूछा।
‘‘पैसे नहीं हैं !’’
गुम-सुम स्वर में सुदर्षन बोला।
‘‘मुझसे ले लो ! बोला, कितने दूं ? सौ, दो सौ, पांच सौ ?’’ सुदर्षन को अभी भी कुछ आषा थी। कुछ सोचकर हर्ष से बोला ‘‘दो सौ दे दो।’’
हर्ष ने उसे दो सौ रूप्ये दे दिये। पर सुदर्षन निरंतर हारता जा रहा था, उधार भी बढ़ता जा रहा था।
 
दूर-दूर तक वृक्ष उगे हुए थे। जहां ये लोग बैठे थे, उससे कुछ ही दूर एक वृक्षों का झुरमुट था। वहीं एक व्यक्ति बैठा उनका खेल देख रहा था। वो सिन्हा था। वो इस भांति बैठा हुआ था कि उनमें से कोई उसे आसानी से न देख सकता था। उनकी आवाज तो सिन्हा तक पहुंच नहीं पा रही थी, मगर उसके मुख पर छाये निराष भावों को देखकर वेा समझ चुका था कि वो निरंतर हारता जा रहा है। सिन्हा ने यह भी देख-समझ लिया था कि सुदर्ष्रन के हारने का एकमात्र कारण उसके मित्रों का विष्वासघात है, वो तीनों हेरा-फेरी कर रहे थे।
खेल चल रहा था। षाम हो गई। ब्रजेष उठ खड़ा हुआ। खेल समाप्त हो गया। सुदर्षन पर पांच सौ रूप्ये का उधार चढ़ चुका था।
‘‘पैसे कब मिलेंगे’’
हर्ष के मुख पर अब मित्रता के भाव न थे, उनके मुख पर कुटिलता थी, कठोरता थी। ब्रजेष और सुरेन्द्र, हर्ष के साथ खड़े थे।
‘‘जब होगें दे दूंगा !’’
सुदर्षन का स्वर तीखा था। आखिर वो एक हारा हुआ जुआरी था।
‘‘कब ? कल या परसों ?’’
षायद हर्ष ने उसी क्षण प्रतिषोध लेने का निर्णय कर लिया था।
 
‘‘कह तो दिया, जब होंगे दे दूंगा। इतनी जल्दी नहीं दे सकता।’’ तीखे-स्वर में यह कहकर सुदर्षन वहां से जाने को उद्यत हुुआ कि हर्ष उसका रास्ता रोककर बोला ‘‘क्यों ? क्या तुम नवाब हो यहां के कि अपनी मर्जी करना चाहते हो ? सुदर्षन मियां ! मुझे कल सुबह दस बजे तक पैसे मिल जाने चाहिएं !’’
‘‘और अगर न दिये तो ?’’
‘‘तो उतारों ये घड़ी और अंगूठी !
यह कहते ही हर्ष ने सख्ती से सुदर्षन की कलाई पकड़ ली। सुदर्ष्रन भी उससे कम न था। झटका देकर उसने कलाई छुडा ली और बोला, ‘‘नहीं उतारता !’’
‘‘नहीं ?’’
‘‘नहीं !’’
‘‘इसकी हरकतें देख रहे हो तुम ?’’
हर्ष ने ब्रजेष और सुरेन्द्र को सम्बोधित करते हुए कहा। तब सुरेन्द्र, सुदर्षन से बोला ‘‘क्यों झगड़ने पर तुले हो ? सुदर्षन ! हार-जीत तो बनी हुई है ! तुम्हें किस चीज़ की कमी है, जो इंकार करते हो ? कह दो, कल दे दूंगा !’’
‘‘तुम चुप रहो, ज्यादा उपदेष झाड़ने की कोषिष न करो !’’
‘‘ओह !’’ इतना कह, हर्ष की ओर देखते हुए सुरेन्द्र बोला ‘‘भाई ! अब तुम जानो और ये । मैंने जो कुछ कहना था, कह दिया। निपट लो अब, वैसे मैं तुम्हारे साथ हंू !’’
‘‘और ब्रजेष, तुम ?
‘‘मै। तो सच्चे व्यक्ति का साथ दूंगा !’’
ब्रजेष ने कुटिल-मुस्कुराहट के साथ कहा। तब हर्ष बोला ‘‘बोलो ! अब क्या सलाह है तुम्हारी !’’
सुदर्षन ने देखा वह तीन हैं और वह अकेला ! कुछ कर न सकता था। मजबूरन उसे क्रोध दबाना पड़ा। निःष्वास छोड़ते हुए अपनी कलाई में बंधी कीमती घड़ी हर्ष की ओर बढ़ाते हुए कहा ‘‘ठीक है, ये लो !’’
‘‘अगूठी भी !’’
हर्ष के मुख पर कुटिल मुस्कुराहट थी।
‘‘घड़ी कीमती है। चार सौ में खरीदी थी।’’
‘‘तभी तो अंगूठी भी मांग रहा हंू ! उधर पांच सौ का है, न कि चार सौ का !’’
‘‘क्या तुम्हें मुझ पर रती-भर भी विष्वास नहीं ?’’
सुदर्षन के स्वर में याचना थी।
उसकी बात सुनकर हर्ष और ब्रजेष, दोनों जोर से हंसंे हर्ष बोला ‘‘था ! परंतु उस दिन तुम्हारी स्वार्थ की भावना देखकर मेरे दिल से तुम्हारे प्रति विष्वास की भावना उठ गई। पहले तुमने विष्वासघात किया, तुमने ! लाओ अब !’’
‘‘काष ! मुझे पहले ही पता लग गया होता कि तुम लोग इतने स्वार्थी हो ।’’ सुदर्षन की आंखों में आसूंओं का तूफान समाया हुआ था, बड़ी कठिनता से काबू पाकर वह बोला।
 
वातावरण धंुधला पड़ चुका था। सिन्हा झुरमुट से निकलकर सड़क पर आ गया, और वहीं खड़ा होकर सुदर्षन की राह देखने लगा। उधर हर्ष, सुदर्षन से कह रहा था ‘‘मैंने पहले ही कहा कि हमसे अधिक तुम स्वार्थी निकले। उस दिन तुम्हीं पुलिस-स्टेषन में हमारी आवाज अनसुनी करके, अपनी लैला गीता को लेकर चल गये थे। बोलो स्वार्थी कौन है ? हम या तुम ? अगर सच्चे मित्र होते तो गीता की भांति हमें भी छुड़वाने की कोषिष करते। अब अधिक देर न करो, लाओ अंगूठी !’’
 
सुदर्षन के आंसू बह निकले। पर वह कुछ बोला नहीं। चुपचाप उसने अपनी दो तोले सोने की अंगूठी हर्ष की ओर बढ़ा दी। और फिर वह वहां रूका नहीं, भागता हुआ सड़क पर आ गया। पीठ पर उसे तीनों की खिलखिलाहट सुनाई दी। उसकी आंखों से निरंतर आंसू बह रहे थे। सिन्हा सड़क के किनारे पर खड़ा था। उसका दिल किया कि वह सुदर्षन को पूकारे। पर कुछ सोचकर वह चुप हो गया। चुपचाप सुदर्षन को पैदल जाते देखता रहा।
 
सुदर्षन जब घर पहुंचा तो रात के आठ बज चुके थे। रामपाल के सिवाए घर पर कोई नहीं था। सीधा वह अपने कमरे में आया और अलमारी में से षराब की बोतल निकालकर, षराब पीने लगा एक ही सांस में उसने आधी बोलत खाली कर दी और धम्म से पलंग पर लेट गया। क्रोध आया तो उठकर दीवार से सिर मारने लगा, फिर बेसुध हो गया।