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खोखली नींव
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खोखली नींव (पच्चीस)
ISBN: 345

 लक्ष्मी देवी घर के मुख्य-द्वार पर खड़ी होकर षिवचरणबाबू के लौटने का इ्रंतजार करने लगी। लगभग डेढ़ घंटे पष्चात वो लौटे। लक्ष्मीदेवी ने राहत की सांस ली, जब उन्होने देखा कि सुदर्षन भी साथ आया है। वो कुछ बोली नहीं, चुपचाप भीतर चली आई। षिवचरणबाबू ने बैठने के लिए कहा। उसके बैठते ही बोले ‘‘तुम्हें अब भी षर्म आई कि नहीं ?’’

 
सुदर्षन ने सुनकर भी काई उतर नहीं दिया। षिवचरणबाबू फिर बोले ‘‘उन्नीस साल के हो चुके हो, मगर अभी तक सोच-विचार करना नहीं सीखा। कुछ तो सोचा करो। हमारी इज्जत की नीलामी करने पर क्यों तुले हुए हो ? कर्म ऐसे करने चाहिए, जिनसे स्वयं तो सुख मिले ही, साथ ही परिवार की मान-मर्यादा को धब्बा न लगे। पर तुम तो अंधे बने पड़े हो। अरे ! अंधा भी अपनी लाठी को हिलाता-हिलाता, उसे अपनी पथ-प्रदर्षक मानकर चलता है, वो ठोकर खाना नहीं चाहता, मगर एक तुम हो कि आंखे होते हुए भी अज्ञानी-अंधे बने हो। सुदर्षन ! हमने तुम्हारा क्या बुरा किया है, जो तुम भरे बाजार में हमारी इज्जत की नीलामी कर रहे हो ?’’
 
‘‘यह आपके विचार हैं, डैडी ! मेरे दिल में इस प्रकार की कोई भावना नहीं। और रही षराब-सिगरेट पीने की, होटलों में जाने की बात, यह तो आधुनिक-युग को सबसे प्रबलतम फैषन है, और मैं फैषन की दौड़ में पीछे रहना महामूर्खता समझता हंू’’
 
सुदर्षन की बात सुनकर षिवचरणबाबू ने कुछ निर्णय लिया और बोले ‘‘तुम फैषन परस्त बनते हो, मगर जानते हो इसकों पूरा करने के लिए धन मेरा लगता है। तुम जिस पैसे से होटलों में जाकर मौजें लूटते हो, वो सब मेरा है। मैं चाहंू तो तुम्हें दाने-दाने से मोहताज कर सकता हंू। अगर तुम ऐसे कार्यों में लगे रहे तो मैं मजबूर हो कर ऐसा कार्य कर बैठूंगा, जो तुम्हारे लिये अहितकर होगा। आज मैं जीवित हंू और देख रहा हंू कि तुमने मेरी इज्जत को धूल में मिलाने की कोई कसर नहीं छोड़ी है। मैं मर जाउंगा, तो मुझे लगता है, तब तुम मुझे श्रद्धांजलि अर्पित करने की बजाए मेरे नाम पर थूकोगे, मेरी खिल्ली उड़ाओगे ! क्या यही तुम्हारे नए जमाने की मूल प्रेरणा है ?’’
 
सुदर्षन कुछ न बोला, षिवचरणबाबू ने फिर कहा, सुदर्षन ! जीवन पर्यन्त अगर सुख चाहते हो तो इन कर्मों को छोड़ दो और अपना अमूल्य-समय षिक्षा में व्यतीत करने लगो। मैं भी पूरे मन से तुम्हारी सहायता करूंगा, और अगर ऐसे ही बने रहना चाहते हो, तो यह समझ लो इस घर के द्वार तुम्हारे लिए बंद हो चुके हैं, बड़ी खुषी के साथ तुम अपना घर बना सकते हो, हमें जरा भी दुःख न होगा। हम यही समझ लेंगे कि भगवान ने हमें संतान दी, मगर वो हमारी आंखों के सामने न रह सकने के लिए बजबूर हैं, अपने आधुनिक-युग की मूल-प्रेरणा को निभाने के लिए !’’
 
‘‘मैं इन्हें नहीं छोड़ सकता !’’
सुदर्षन तीव्रता से बोला।
‘‘तो बड़ी खुषी के साथ यहां से जा सकते हो !’’
यह कहकर षिवचरणबाबू ने अपनी आंखें कमरे की छत पर टिका दी।
‘‘क्यों जाएं ?’’
‘‘हठ करने का कोई अधिकर नहीं अब तुम्हें !’’
‘‘तो क्या अब आप मेरे मां-बाप नहीं ?’’
‘‘थे ! अब तुम्हें अपना बेटा कहते षर्म आती है।’’
 
षिवचरणबाबू की मुख-मुद्रा कठोर थी। लक्ष्मी देवी सब कुछ बुत बने बैठी सुन रही थी। षिवचरणबाबू की कठोरता देखकर सिसक उठी। बोली ‘‘नहीं, ऐसा न करना !’’
 
‘‘लक्ष्मी ! तुम चुप रहो। ममता की कीमत जब पुत्र नहीं समझता, तो मां क्यों राती है ?’’
 
षिवचरणबाबू की बात सुनकर लक्ष्मीदेवी चुप हो गई। निरूतर थी, उनके षब्द ही तो दुहराये थे षिवचरणबाबू ने।
 
‘‘खैर ! कोई बात नहीं, मगर मैं इस घर से तो जाने से रहा !’’
सुदर्षन ने अपना निर्णय दिया।
‘‘जबरदस्ती है !’’
‘‘मुझे कोई नहीं निकाल सकता ! किसी में इतनी हिम्मत नहीं !’’ सुदर्षन क्रोधित-स्वर से बोला।
ओह ! रहलो, कुतों की तरह ! समझ लेंगे, कुता पाल रखा है ! तुम हो भी तो जंगली कुते ! हम तुम्हारा भला चाहते हैं, ओर तुम हो कि हमें काटने दौड़ते हो ! आज के बाद न पैसा मांगना और न ही स्कूटर को हाथ लगाना !’’
ओह ! खैर ! याद रखिए, मेरा भाग्य बहुत तेज है। दो दिनों के भीतर पैसों का ढेर लगा लूंगा अपने पास !’’
‘‘मुझे पैसे की कमी नहीं, जो मेरे लार टपकेगी !’’
और सुदर्षन तेजी से अपने कमरे की ओर चला गया। षिचरणबाबू माथा पकड़े चुपचाप बैठे रहे। लख्मीदेवी की भी यही दषा थी। और सिन्हा, वो कभी षिवचरणबाबू को देखता और कभी लक्ष्मीदेवी को !