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खोखली नींव
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खोखली नींव (चौबीस)
ISBN: 345

 रातभर सुदर्षन घर नही आया। आ भी कैसे सकता था ? जेल की सलाखों के पीछे बंद जो था !

 
षिवचरणबाबू आगरा गए हुए थे। लक्ष्मीदेवी घर पर अकेली थी। इस समय रात के दो बज रहे थे। सुदर्षन के इंतजार में लक्ष्मीदेवी लान में टहल रही थी। मन उनका बेचैन था। सुदर्षन के भविष्य का ध्यान कर वो सिहर उठती थी। वो जीवन में क्या सुख-आननद पायेगा ? भौतिक सुख-साधन वो चाहता है, पर उसे ज्ञात नहीं कि ये साधन किसके बल पर उपलब्ध होते हैं ! द्रव्य बिना कुछ नहीं सम्भव आजकल। पिता के पैसे का सहारा है, ऐष कर रहा है, क्लबों-होटलों में जाता है, बेफिक्री से षराब पीता है, जुआ खेलता है, लड़कियों को गले लगाकर चलता है। मगर पिता के बाद पैसा कहां से लेगा, अपनी विलासिताओं की पूर्ति के लिए ? तब तरसेगा। फल चाहेगा, अपनी विलासिताओं की पूर्ति के लिए ? तब तरसेगा। फल चाहेगा, कर्म मगर नहीं कर पायेगा। भागेगा फिर इस संसार से। मगर भाग कर जाएगा कहां ? ये आदतें, मजबूरी बन कर इसके साथ लगी रहेगी। पलभर चैन से सांस नहीं ले पायेगा। मजबूर हो जाएगा कुछ अनुचित करने को, और, और जहर खा लेगा या गाड़ी के नीचे सिर देकर आत्महत्या कर लेगा, हां !
 
आखिर कब तक लक्ष्मीदेवी खड़ी रह कर, चिन्ता करती हुई, सुदर्षन की इंतजार करती रहती ? खड़े होने की षक्ति समाप्त हो गई, और उकता कर एक कुर्सी पर बैठ गई। उनकी दषा इस समय बहुत खराब थी, आंखों में नींद का खुमार था, सिर दर्द हो रहा था, मगर दुःख के कारण उन्हें नींद न आ रही थी। हरपल, उनके षरीर का प्रत्येक अंग, ईष्वर से यही प्रार्थना कर रहा था कि सुदर्षन सकुषल घर लौट आए। मगर ये कैसे हो सकता था ?
 
अभी तक वो उर्वषी में क्या कर रहा होगा ? कहीं वो हमारे खिलाफ विद्रोह करने पर तो उतारू नहीं हो गया ? कहीं वो क्रोधाग्नि की जलन के कारण इस घर को छोड़ने का निष्चय तो नहीं कर बैठा ? हे भगवान ! ऐसा न करना। ये मैं सहन न कर सकंूगी। भगवान ! उसे सुबुद्धि दे’ उनके मानस-पटल पर तरह-तरह की बाते अंकित होती और अगले ही पल पानी के बुलबुले की भांति विलीन हो जाती, ढाई बजे के करीब रामपाल उठकर आया।
‘‘मालकिन ! क्या सुदर्षन बाबू अभी तक नहीं आए ?’’
‘‘नही।’’
ठंडी आह भरते हुए लक्ष्मीदेवी ने कहा।
‘‘न जाने किसने उन्हें ये बुरी आदतें सिखा दी !’’
 
‘‘इस समाज ने, रामपाल ! इस आधुनिक-समाज का वातावरण ही दूषित है, जो इसमें सांस लेता है वही दूषित बन जाता है। आज एक खराब होता है, तो कल दूसरा, यही कड़ी निरंतर चलती रहती है। बुरों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। इस समाज के कर्णधार स्वयं तो बुरे हैं ही, साथ ही अन्य अवयस्कों को अपने-सम बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं ताकि इस जग में से मानव जैसे समझदार प्राणी का नामों-निषान ही मिट जाए और उसकी जगह मानव की दानवता नंगा नाच करे ! यही उनकी हार्दिक इच्छा है। न जाने क्यों ? न जाने क्या हो गया है आज के मानव को !’’
 
लक्ष्मीदेवी की इस बात का कुछ ही अंष रामपाल की छोटी बुद्धि में बैठा। मगर फिर भी बोला ‘‘आप ठीक ही कहती हैं, मालकिन ! पर अब आप सो जाएं। उन्हें आना होगा, तो आ जाएंगे।’’
‘‘आंखों में नींद कहां ?’’
‘‘पर रातभर जागने से तबीयत खराब हो जाएगी।’’
 
लक्ष्मीदेवी ने रामपाल की इस बात का जवाब नहीं दिया, बस चुपचाप उठकर भीतर चली गई। रामपाल भी अपनी कोठरी की ओर बढ़ गया।
 
सुबह हुई। सुदर्षन को न आया देख लक्ष्मीदेवी बेचैन हो उठी। सिन्हा का ध्यान आया। उसे फोन करने की लगी थी कि काल-बेल बजी। दरवाजा खोला, तो सिन्हा को खड़े पाया।
‘‘मैं तुम्हें ही फोन करने लगी थी।’’
उसके अभिवादन का उतर देकर लक्ष्मीदेवी ने कहा।
‘‘सुदर्षन आया ?’’
सिन्हा ने एकदम प्रष्न किया।
‘‘उसी की तो चिंता है !’’
‘‘ओह, समझा !’’
‘‘क्यों ? क्या हुआ ?’’
लक्ष्मीदेवी का हृदय अज्ञात भय से कांपा।
‘‘आपने अखबार देखी।’’
‘‘नहीं क्यों ?’’
लक्ष्मीदेवी जरा घबराई ।
‘‘कहां है ?’’
‘‘तिपाई पर पड़ी है, मगर क्या हुआ ?’’
बेचैनी के साथ-साथ भय-मिश्रित था उनके स्वर में। सिन्हा ने झट से आगे बढ़कर अखबार उठाई और ‘लेट-न्यूज’ के कालम पर अंगुली टिकाते हुए बोला, ‘‘इसे पढ़िए’’ साथ ही अखबार उसने लक्ष्मीदेवी के कांपते हाथों में दे दी।
 
लक्ष्मीदेवी ने यंू पढ़ा, ‘‘दिल्ली 27 सितम्बर राजधानी में आज रात ग्यारह बजे के करीब क्नाट-प्लेस स्थित उर्वषी रेस्तरां के बाहर करीब एक सौ पचास लड़के-लड़कियां बुरी हरकतें करते हुए गिरफतार किए गए’’ इतनी ही खबर पढ़क्र लक्ष्मीदेवी बोली, ‘‘तुम्हें षक है कि’’
‘‘जी कल वो भी वहीं था। रात घर भी नहीं आया।’’
‘‘हे राम !’’
 
माथा पकड़कर लक्ष्मीदेवी कुर्सी पर बैठ गई। एकाएक रो पड़ी। सिन्हा ने बड़ी कठिनता से उन्हें चुप कराया। धैर्य-धारण किया तो सिन्हा से बोली, ‘‘वो दस बजे तक आ जाएंगे। तभी कुछ होगा !’’
 
सिन्हा ने घड़ी में समय देखा। आठ बज चुके थे। अभी षिवचरणबाबू के आने में करीब दो घण्टे की देर थी। दोनों चुप-चाप बैठ गए।
 
पौने दस बजे के करीब षिवचरणबाबू आगरे से वापिस आ गए। सिन्हा ने उन्हे सारी परिस्थिति से अवगत कराया। सब कुछ सुनकर वो दुःखी हो उठे और सिन्हा को लिए दरियागंज पुलिस-स्टेषन की ओर चल पड़े।
‘‘मेरी तो नाक मे दम कर दिया है इस लड़के ने।’’
 
षिवचरणबाबू का स्वर दुःखी था। सिन्हा को भी सुदर्षन की हरकतों पर क्रोध आ रहा था, उसी स्वर में बोला ‘‘अगर आप मेरा कहा माने तो उसे छुड़वायें नहीं। दस दिन जेल में रहेगा तो उसे अक्ल आ जाएगी।’’
 
‘‘सिन्हा ऐसा करने पर उसे अक्ल आएगी या नहीं, इस छोड़ो, पर इससे मेरी इज्जत मिटटी में जरूर मिल जाएगी। लोग मुझ पर थूकेंगे, मेरी खिल्ली उड़ायेंगे।’’ षिवचरणबाबू के स्वर में विवषता थी।
 
सिन्हा चुपचाप कुछ सोचते लगा। ऐसी उलझी हुई समस्या का आखिर क्या हल हो सकता है ? उसी को खोजने की चेष्टा सिन्हा करने लगा। प्रष्न था, प्रष्न का परिणाम था, मगर उसका समाधान नहीं था ! सुदर्षन कुकर्म करता है, वो जानता था। इन कुकमों के फल स्वरूप भविष्य में बार-बार आता था, मगर दुर्भाग्यवष वो उसकी भाषा नहीं समझ पा रहा था। मार-पीट से समाधान नहीं हो सकता, इसका तो केवल एक ही रास्ता है, आत्मज्ञान !
 
आत्मज्ञान ?
आत्मा से ज्ञान प्राप्त करना !
यानि स्वयं समझना ?
मगर सुदर्षन स्वयं कब समझेगा ? उसकी बुद्धि में तो तामसी विचार भरे पड़े हैं ! समय परिवर्तनषील है ?
समय उसके स्वरूप को और बिगाड़ भी तो सकता है?
मगर कब तक समय उसे बिगाड़ेगा ? कंधों पर बोझ आएगा तो उसकी आंखें खुल जाएंगी !
मगर वो बोझ लेना नहीं चाहता ! स्वतंत्रता पसंद मस्तिष्क का साथी है !
तब तो वो भिखारी बनना पसंद करेगा ?
ऐसा ही तो हो रहा है !
मगर सुदर्षन तो ऐसा नहीं चाहता ! वो तो सब सुख-साधन चाहता है, दुखों को झेलने की क्षमता उसमें नहीं। साथ ही, वो जो कुछ करता है समाज के दूषित वातावरण में सांस लेकर करता है ! पारिवारिक-संस्थानों से तो उसे ऐसी षिक्षा नहीं मिली ! उसका अन्य कोई पारिवारिक-सदस्य तो ऐसा नहीं ! उसे आत्मज्ञान जल्दी ही मिल सकता है, उसके भीतर भी सात्विक-भावनाएं निवास करती है, मगर वो सब, उसके सभी सात्विक-विचार सोये पड़े है, समाज के दूषित वातावरण ने पारिवारिक-संस्कारों पर पर्दा डाल रखा हे। ये सुदर्षन की कमजोरी थी कि उसने कीचड़ में पांव रख दिया ! कीचड़ में पांव पड़ते ही फिसलना षुरू हो जाता है, और प्राणी संतुलन खोकर फिसलता ही जाता है !
 
ऐसा सब सोचकर, सिन्हा ने षिवचरणबाबू के मस्तिष्क को षांति-प्रदान की यह सोचकर, ‘‘सर ! अगर यह कहा जाए कि कोरे उपदेषों को सुनकर किसी तामसी-व्यक्तित्व पर असर पड़ सकता है, जहां तक मैं समझता हंू, बिल्कुल फायदा न होगा। अगर ऐसा होता तो षायद ही बुरा कोई इस जग में होता। प्रत्येक व्यक्ति में हर प्रकार के गुण विद्यमान रहते हैं, अच्छे भी, बुरे भी ! उसको अच्छा कहा जाये या बुरा ? कर्म सात्विक अधिक ओर तामसी कम हों, तो वो अच्छा कहलाता है, इसके विपरीत होने पर बुरा। सुदर्षन के भीतर भी अच्छाईयां हैं, अच्छे सात्विक विचार हैं, वो सब उसके कुकर्मो के नीचे दबे पड़े हैं। सुदर्षन में भी दिल है। वो काई चोर-डाकू-खूनी नहीं है। संस्कार युक्त मानव है, जरा-सा झटका लगते ही संभल जाएगा, प्रायष्चित कर लेगा।’’
 
षिवचरणबाबू ने कुछ न कहा, सब सुनकर। उनके मस्तिष्क में बहुत-सी षंकाएं थी, प्रष्न थे, मगर उनको कह न पाए, जानते थे, उनका उतर वही होगा जो सिन्हा ने कहा है, स्वयं कभी-कभी उन्होंने सोचा हे।
 
कार दरियागंज पुलिस-स्टेषन आ पहंुची। दोनों कार से उतरकर भीतर आ गए। यहां षिवचरणबाबू की काफी जान-पहचान थी। सबसे पहले उनका सामना एस0 पी0 महेष से हुआ। उन्हें देखते ही वो बोला ‘‘षिवचरण, तुम ! आज क्या हो गया है, जो घर बैठे षहर की बड़ी-बड़ी हस्तियों के दर्षन करने को मिल रहे हैं’’ महेष के स्वर में भरपूर व्यंग्य को सुनकर तिलमिला उठे। सिन्हा को भी क्रोध आया। मगर दोनों ने मुख के भावों से कुछ न प्रकट होने दिया, षिवचरणबाबू के मुख पर लज्जा थी, धीमे से बोले ‘‘क्या कहंू, भाई ! मेरा बेटा !’’
उनकी बात बीच में ही काटते हुए महेष ने कहा ‘‘ओह समझा ! षायद कल वो भी पकड़ा गया है !’’ दो क्षण रूककर फिर बोले, ‘‘क्या नाम है उसका’’
 
‘‘सुदर्षन !’’
‘‘सुदर्षन’’ नाम दुहराते हुए महेष ने गिरफतार युवक-युवतियों की सुची मंगवाई। उसे देखा। सुदर्षन का नाम भी पाया, बोले ‘‘नाम तो है, आओं देखे।
 
एक बड़ी-सी कोठरी में सबको बंद किया गया था। महेष कोठरी के समीप जाकर पूछा ‘‘सुदर्षन कौन है तुममें से ?’’
अगले ही क्षण भीड़ को पीछे ढकेलते, गीता का हाथ थामें, सुदर्षन आगे आ गया। महेष ने षिवचरणबाबू की ओर देखा।
‘‘यही है।’’
सुदर्षन की ओर देखते हुए वो बोले।
‘‘इसे बाहर निकालो।’’
 
एस0 पी0 साहब ने हवलदार को आदेष दिया। हवलदार ने ताला खोला और सुदर्षन को बाहर आने का रास्ता दिया। सुदर्षन ने गीता को भी निकालना चाहा। हवलदार ने रोका, मगर सुदर्षन अड़ गया।
‘‘आने दो इसे भी।’’
एस0 पी0 साहब ने कहा। तभी कठोरी से दो-तीन आवाजों ने सुदर्षन को पुकारा। मगर सुदर्षन ने उन्हें अनसुना करके, गीता के साथ, बाहर निकल आया। अंदर बंद सभी जोर से चिल्लाए। एस0 पी0 साहब उन सबको लिए अपने कमरे में आ गए।
‘‘षिवचरणबाबू ! आज मैं अपनी दोस्ती के कारण उन्हें बख्ष रहा हंू। मगर आज के बाद अगर फिर कभी उन्हें रात की दषा में देखा गया, तो मैं अपना फर्ज निभाने पर मजबूर हो जाउंगा !’’
 
‘‘मैं तुम्हारा एहसानमंद हंू, महेष ! मैं पूरी चेष्टा करूंगा कि दुबारा ऐसी स्थिति न आए।’’ षर्म के कारण षिवचरणबाबू और कुछ न कह सके। तब एस0 पी0 साहब गीता और सुदर्षन को सम्बोधित करते हुए बोले ‘‘तुम दोनों कान खोलकर सुन लो कि मैंने अगर आज के बाद दोनों में से किसी को भी आवारागर्दी करते देख लिया तो बिना वारंट निकाले अंदर बंद कर दूंगा।’’
 
दोनों की गर्दनें षर्म के कारण झुकी हुई थी। गीता चाहे कितनी भी बुरी क्यों न थी, मगर फिर भी वह एक भारतीय नारी थी। यह तो हमारा दुर्भाग्य है कि संस्कारों से प्रधान समाज का दूषित वातावरण हो गया है। इस समाज का दायरा असीमित है, मगर विचार सीमित, जिस कारण हम गलत धारणाओं-मान्यताओं पर विष्वास करने लगते हैं। जब जरा ठोकर लगती है, तो पारिवारिक-संस्कार उजागर होकर हमें नया पथ प्रदान करते हैं। हम अगर कुछ बनना चाहते हैं। तो हमें नया पथ प्रदान करते हैं। हम अगर कुछ बनना चाहते हैं, तो हमें प्राचीन-भारतीय-संस्कृति एवं आध्यात्मिक-विचारधारा के मूल अंगों को अपनाना चाहिए, अमित जैसे किषोर इसके उदाहरण हैं ! उनको चुप देखकर एस0 पी0 साहब फिर बोले ‘‘न जाने क्या मिलता है तुम लोगों को आवारागर्दी करने में। कभी वो समय भी था जब इस दुनिया में ‘षर्म’ का अस्तित्व था। पर अब तो उसका नाम-ही-नाम रह गया है। वो स्वचं अस्तित्वहीन हो चुकी हैं। दुनिया के जो गंदे काम हैं, वो तुम लोग करने लगे हो। अरे ! अपनी नहीं, अपने मां-बाप की तो परवाह किया करो। इनकी इज्जत को तो तुम लागों ने मिटटी में मिला रखा है। मूर्खों ! अपना जीवन तो बर्बाद कर ही रहे हो, साथ ही पूरे देष की नींव को भी खोखला करते जा रहे हो। षर्म करो, षर्म !’’
 
एस0 पी0 साहब चुप हो गए। षिवचरणबाबू स्वयं को काफी षर्मिंदा महसूस कर रहे थे, उठते हुए धीमे से बोले ‘‘अच्छा, अब चलता हंूं !’’
‘‘अच्छा, फिर मुलाकात होगी।’’
 
महेष ने उनसे हाथ मिलाया और विदा दी। षिवचरणबाबू, सिन्हा, सुदर्षन और गीता पुलिस-स्टेषन से बाहर निकल आये। गीता को सम्बोधित करते हुए षिवचरणबाबू ने पूछा ‘‘तुमको कहां जाना है ?’’
 
‘‘जी, मैं यहीं रहती हंू।’’
धीमे से, गर्दन नीची किए, गीता ने उतर दिया।
‘‘तुम्हारे पिता क्या करते है ?’’
‘‘इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट !’’
‘‘क्या नाम है उनका ?’’
उत्सुकता से पूछा षिवचरणबाबू ने।
‘‘महेन्द्रनाथ मल्होत्रा !’’
 
नाम सुनकर षिवचरणबाबू और सिन्हा, दोनो चौकें। महेन्द्रनाथ मल्होत्रा के नाम से वो अच्छी तरह वाकिफ थे। तब षिवचरणबाबू बोले ‘‘ओह ! मैं उन्हेे जानता हंू।’’ फिर कुछ रूककर वो बोले ‘‘बेटी ! तुम्हारे पिता कितने इज्ज्तदार व्यक्ति है। क्या तुम्हें उनकी इज्जत की जरा भी परवाह नहीं ? तुम लड़की हो। मां-बाप का अमूल्य-धन हो। तुम्हारी इज्जत, तुम्हारे मां-बाप की इज्जत है। अगर तुम्हारे दामन पर दाग लग गया तो उनकी क्या दषा होगी, कभी सोचा है तुमने ? बेटी ! लड़कियों को तो ऐसे कर्मो से दूर रहना चाहिए। हम पुरूष तो जन्म-जन्मान्तर से कुकर्मी हैं। पर हम भी इनसे दूर भागने का प्रयत्न करते है। आदिम-युग से यह नियम चला आ रहा है कि मर्द के कुकर्मी होते हुए भी, समाज में उसे प्रतिष्ठा मान दे दिया जाता है, पर औरत अगर छोटा-सा गलत-काम करदे, तो जन्मभर के लिए उस पर दाग लग जाता है। उनसे बचो, बेटी ! ये तुम्हें कहीं का न छोड़ेंगे !’’ गीता ने षांति से षिवचरणबाबू की बात सुनी, उसी क्षण उसे सुदर्षन द्वारा कही ‘सबीना की दास्तान’ स्मरण हो आई। सिहर उठी और बोली ‘‘अंकल ! मुझे और षर्मिंन्दा न करें। मैं आगे से ऐसे काम नहीं करूंगी, कभी नहीं करूंगी।’’ इतना कहते ही गीता की आंखों से आंसू बह निकले। षिवचरणबाबू ने उन्हें पोंछ डाला और प्रेम से विदा किया। गीता घर की ओर चली गई। षिवचरणबाबू, सुदर्षन व सिन्हा के साथ, अपने घर की ओर चल पड़े।