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खोखली नींव
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खोखली नींव (तेइस)
ISBN: 345

 षाम सात बजे तक सुदर्षन अपने कमरे से बाहर नहीं निकला। दिनभर कमरे में बैठा सिगरेटें फुंकता रहा और षराब पीता रहा। घड़ी में समय देखा तो उसे याद आया कि आठ बजे गीता को उर्वषी में मिलना है।

 
नहाकर सुदर्षन तैयार हुआ, और स्कूटर पर सवार होकर उर्वषी जा पहुंचा। गीता उसे बाहर ही टहलती दिखाई दी। दोनों ने बड़े प्रेम के साथ मिलन किया और हाथ में हाथ लिए रेस्तरां में प्रविष्ट हो गए।
 
सुदर्षन यह न जान सका कि एक व्यक्ति घर से उसका पीछा करते हुए यहां तक आया है और उनके रेस्तरां में प्रवेष करते ही पब्लिक-बूथ की ओर बढ गया है। वो सिन्हा था। चोगा उठाकर षिवचरणबाबू के घर का नम्बर मिलाया। दो क्षण में ही सम्पर्क स्थापित हो गया। लक्ष्मीदेवी फोन पर थी।
‘‘हैलो ! मैं सिन्हा बोल रहा हंू, आंटी।’’
 
‘‘सिन्हा ! वो इस वक्त कहां है ?’’
‘‘उर्वषी रेस्तरां में।’’
‘‘ओह ! क्या अकेला है ?’’
‘‘जी नहीं, उसके साथ एक लड़की भी है।’’
‘‘लड़की ! ओह ! ठीक है। अब तुम घर जाओ।’’
‘‘जी अच्छा, नमस्ते।’’
 
फोन बंद करके सिन्हा अपने घर की ओर चल पड़ा। सुदर्षन घर पर जब तैयार हो रहा था, उस वक्त लक्ष्मीदेवी ने सिन्हा को फोनकर, सुदर्षन का पीछा करने को कह दिया था। सुदर्षन जब घर से निकला तो, बाहर सिन्हा पहले से ही अपने स्कूटर पर तैयार बैठा था।
 
रेस्तरां की षाम बड़ी सुहावनी थी। सम्पूर्ण हाल खचाखच भरा हुआ था। हर वर्ग के लोग दृष्टिगत हो रहे थे, चुवा वर्ग, प्रौढ वर्ग सभी। षाम तो जवान थी ही, सबके दिल भी जवान थे। हेंी-ठहाकों के बीच कहाी षराब को दौर चल रहा था, तो कहीं चरस-गांजे़ का। सिगरेटों और चिल्लमों का धुआ सारे हाल में फेला हुआ था, वातावरण रंगीन था ! नषीले संगीत की धीमी-स्वरलहरी सबको आनन्दित कर रही थी और उसी की ताल पर कुछ जोड़े थिरक रहे थे।
 
हाल में सुदर्षन था, गीता थी, गुरजीत था, ब्रजेष-हर्ष भी थे और भी बहुत जाने-अनजाने चेहरे थे ! नषा मस्तिष्क पर छाता जा रहा था, नग्नता बढ़ती जा रही थी ! सभी को बैबरे-नृत्य का इंतजार था, सभी चक्षु अर्द्धनग्न-सुदरी की छवि अपने क्षेत्र में अंकित करने के लिए बेकरार थे ! पर वो तो दस बजे होना था, अब से पंद्रह मिनट पष्चात ! जहां इतना समय बिताया, वहां पंद्रह मिनट और बिताने में क्या लगेगा ! आंख झपक कर खुलेगी कि पद्रंह मिनट बीत चुके होंगे ! तब तक दम लगाओ, गम भुलाओ ! सारी दुनिया को भूल जाओ ! हां-हां-हां सबको भूल जाओ ! अपने आप को भी, अपने लक्ष्य को भी ! सबको भूलो ! अपने दीन-धर्म-ईमान को ! अपने कर्म-पथ को, अपने भगवान को ! बस याद रखो सिर्फ इस ‘जाम’ को ! ये ‘अतुल्य’ है, तुम्हें ये आनन्दलोक में ले जाएगा। तुमको ये कल्पनालोक में ले जाएगा ! हा-हा-हा-हा-हा-हा ! पागलों ! मूर्खो ! तुमको ये उस लोक में ले जाएगा, जहां से लौट कर तुम्हारा ये अमूल्य जीवन घरती पर नहीं आएगा ! आएगी तो केवल एक लाष,
नीली लाष !
साढ़े दस !
 
मिस ललिता के नृत्य का समय हो गया था। बम्बई की मषहूर कैबरे डांसर ! जिसके प्रेत्यक अंग में बिजली जैसी लचक-चमक थी, सैक्स की भरपूर अपील थी !
 
संगीत के स्वर ही तीव्रता के अनुसार ललिता के नृत्य की गति थी। जोष का बाज़ार जवान दिलों में गरम हो गया। सभी ललिता को घेर कर थिरकने लगे, सुदर्षन भी, गीता भी, गुरजीत-मालती-हर्ष-ब्रजेष थी ! सभी ‘हंू-हां’ करते हुए नाच रहे थे !
 
सभी नाच रहे थे, नषा करते जा रहे थे, मदहोष हो रहे थे और, ओर प्रेमी-प्रेमिकाएं, एक-दूसरे से चिपटे, चुम्बनों की बौछार कर रहे थे। षोर था, षराबा था, बहुत !
 
ग्यारह बजे। सभी होटल से बाहर निकले, मदहोषी की अवस्था में, प्रेमिकाओ को गले लगाए, नंगा-प्रेम करते हुए ! कुल संख्या करीब एक सौ पचास थी। उनका षोर-षराबा सुनकर पुलिस वहां पहुंच गई। जिसने भी वो दृष्य देखा, अपनी आंखों पर विष्वास न कर सका। प्रत्येक दर्षक यही समझ रहा था कि वो स्वप्न लोक में चिचरता हुआ, पष्चिम के किसी देष में पहुंच गया है।
 
पुलिस कुछ देर तक अपना सिर खुजलाती रही, फिर एस0 पी0 साहब के आदेष पर उन्हें धेर लिया गया, पुलिस-वैन में भरकर उन सबकों दरियागंज-पुलिस-स्टेषन ले आया गया।