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खोखली नींव
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खोखली नींव (बाईस)
ISBN: 345

 ‘‘जीवन हमने पाया है

आनंद-क्षीर में डूबेंगे।
कलियां जब तक खिली रहेंगी
हम उनका रस चूसेंगे।
‘‘जीवन क्षणभंगुर है इसलिए जल्द-से-जल्द, अधिक-से-अधिक इसके प्रत्येक रंग-रूप और ढ़ग का स्वाद लेना हमारा कर्तव्य है। ऐसा कहने वालों से अगर ये पूछा जाए कि उनका कर्म-क्षेत्र कौन-सा है ? उनका लक्ष्य क्या है ? तो कोई कहता है, वो बहुत बड़ा व्यापारी बनना चाहता है, वो डाक्टर बनना चाहता है, वो कलाकार बनना चाहता है और एकाध ऐसा भी होता है वैरागी-स्वभाव का जो कहता है कि वो साधू बनना चाहता है !
 
‘‘प्रेत्यक प्राणी का अपना अलग-अलग लक्ष्य है, अपनी-अपनी राहें हैं। कर्म करते हुए वो अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने का भरपूर प्रयत्न करते हैं। मगर फिर भी न जाने क्यों अवास्तविकता की ओर झुक जाते हैं। वास्तविकता के ज्ञाता, कर्मण्य और अवास्तविकता ! है न आष्चर्य की बात! मगर ये सत्य है। षराब-सिगरेट और अन्य नषीली वस्तुओं का सेवन कर, जुआ खेलकर हम अवास्तविकता के नहीं, तो और किसके दर्षन पाते हैं ?’’ हम तब अपने लक्ष्य को भूलकर उंची-उंची उड़ाने भरते हैं। सोचते है, गम गलत हो जायेगा, सोच-विचार अधिक कर सकेंगे, आनंद मिलेगा। मैं कहता हंू, ये सब बकवास है, ये सब हमको बरगलाने के लिए, स्थापित किया गया है, ये हमको कोढ़ी बनाने के लिए, खोखली नींव पर टिके महल बनाये गये है। क्या मैं कुछ नहीं सोचता ? क्या मुझे गम नहीं खाते ? क्या मैं आधुनिक-युग का मानव नहीं? मैं तो इनका सेवन नहीं करता ! पर मैं बड़ी-बड़ी गम्भीर बाते सोचता हंू, मुझे मेरे प्रिय बंधु अविष्वास सौंपते हैं, तो मैं पागल हो उठता हंू, गम करता हंू। मगर ये सब केवल एक क्षण के लिए दूसरे ही क्षण मैं अपनी सामान्य-स्थिति में आकर अपने दैनिक जीवन के कार्य-कलापों में लीन हो जाता हंू, षराब-सिगरेट पीकर नहीं बल्कि आत्मविष्वास एवं संयम के बल पर ! ये सब झूठी धारणाएं हैं कि षराब-सिगरेट का सेवक गम्भीर-स्वभाव वाला होता है, गम उसके निकट नहीं आते, उसे आत्मिक आनंद प्राप्त होता है तथा सही अर्थों में वो सभ्य-समाज का सदस्य होता है। अरे ! जो षरीर का नाष करे वो क्या आत्मिक आनंद-प्रदाता हो सकता है ? अगर मैंने कला की सेवा के लिए जीने की सौगंध खायी है, तो उसी के लिए जीउं !’’ मौत से पहले, इन वस्तुओं का सेवन कर, क्यों अपने जीवन को खत्म करता हंू ? क्या अपने कर्म का भार नहीं सह सकता ?
 
‘‘सुदर्षन ! तुम विद्यार्थी हो। तुम्हारा कर्म विद्या ग्रहण करना है। पर तुम अपने ‘सत्य-पथ’ से कोसों दूर खड़े हो, अपने कर्म-पथ को बंजर बनता देखकर हंस रहे हो। पागल हो ! पछताओंगे ! अरे सुदर्षन ! भूल जाओ कि तुम ये जीवन बार-बार पाओगे !’’
 
सुदर्षन सोया पड़ा था। मगर उसका मस्तिष्क जाग रहा था और एक धुंधली-सी आकृति का भाषण सुन रहा था। अजीब बात थी, इतनी गूढ़ बात उसका मस्तिष्क न जाने कैसे सुन रहा था, समझ रहा था ! कौन था वक्ता ? न जाने कौन ! षायद कोई हमदर्द था ! मगर सपने में ? षायद किसी बात का विस्तृतीकरण हो रहा था, मस्तिष्क में ! हां यही हो सकता है, कभी-कभी ऐसा होता है !
 
सुबह के नौ बज चुके थे। षिवचरणबाबू आगरा के लिए रवाना हो चुके थे। लक्ष्मीदेवी अपने कार्य में लगी हुई थी। सुदर्षन अभी तक नहीं जगा था। रह-रह कर लक्ष्मीदेवी के मस्तिष्क में अमित की बातें गूंज रही थी। एकाएक वो रामपाल से बोली ‘‘रामपाल ! सुदर्षन जागा कि नहीं ? नहीं जागा तो जगा दो।’’
‘‘बीबी जी ! उनके कमरे चार चक्कर लगा चुका हंू, जागे ही नहीं’’ रामपान ने कहा।
‘‘जगा दो अब जाकर।’’
‘‘जी अच्छा।’’
रसोईघर से निकलकर रामपाल सुदर्षन के कमरे में चला आया। सुदर्षन को धीमे से झिझोड़ता हुआ बोला ‘‘उठिए साहब ! नौ बज गए हैं।’’
‘‘उं-हंू, सोने दो बाबा !’’
नींद के खुमार में सुदर्षन ने समय सुना नहीं।
‘‘साहब ! नौ बज चुके हैं। आपने कालेज भी तो जाना है।’’
सुदर्षन ने पूरी बात अब भी नहीं सुनी, आंखें खोलकर बोला ‘‘क्या बजा हैं ?’’
‘‘नौ’’
‘‘नौ ! मर गए ! पहले क्यों नहीं जगाया ? साले, अब होष आई है जगाने की।’’ बेवजह सुदर्षन ने रामपाल पर क्रोध किया।
 
‘‘साहब ! मैं तो पांचवा चक्कर लगा रहा हंू, आप जागते ही न थे। इसमें मेरा क्या दोष हैं ?’’
रामपाल की वाणी में जरा आक्रोष-भाव था।
‘‘ज्यादा बकवास न करो। जानता हंू कैसे चक्कर लगा रहे थे।’’
सुदर्षन का क्रोध-युक्त स्वर सुनकर लक्ष्मीदेची वहां आ गई। आते ही बोली ‘‘उसके उपर क्यों बिगड़ते हो सुदर्षन ? स्वयं क्या जाग भी नहीं सकते ? गलती अपनी और डांट इसे रहे हो।’’
‘‘मैं रात देर से आया था। स्वयं जल्दी कैसे उठ जाता ?’’
सुदर्षन की वाणी में क्रोध-युक्त विवषता था।
‘‘क्यों ? क्या बहुत जरूरी है होटलों के हंगामें ?’’
‘‘क्या मतलब ?’’
‘‘नाचते-पीते नहीं तो क्या करते हो इतनी रात तक ?’’
‘‘कल ही तो लेट आया था। फिल्म देखने गया था’
 
सुदर्षन ने झूठ बोल कर बात बदलने की कोषिष की। तब लक्ष्मीदेवी बोली ‘‘जानती हंू, तुम कैसी फिल्में देखने जाते हो। हम तो समझने लगे थे कि तुम सुधर चुके हो, मगर कल पता लगा कि तुमने हमें गलतफहमी में डाल रखा था। तुम तो पहले से भी कहीं आगे बढ़ चुके हो।’’
 
मां की बात सुदर्षन ने सुनी। समझ गया पोल खुल चुकी है, अब डरने से लाभ नहीं, बोला ‘‘मम्मी ! मैं आप लोगों जैसा मूर्ख नहीं जो घर बैठा राम-राम जपता रहंू। मैं नये-जमाने की निषानी हंू। अपने आधुनिकतम समाज की रीतियों को मैं नहीं तो क्या आप निभाएंगे ? मम्मी ! जीवन को सुंदर-सत्यरूप-आनंद प्रदान करने वाली वस्तुओ का त्याग कर दें, तो मुझसे अधिक मूर्ख कौन होगा ?’’
 
पुत्र का तर्क सुनकर लक्ष्मीदेवी क्रोधित-वाणी में बोली ‘‘तुम्हारा कोई आधार नहीं सुदर्षन ! तुम खोखले हो, तुम्हारा समाज, उसके रीति-रिवाज-नीतियां सभी कुछ खोखले हैं। तुम्हारा ये खोखला-व्यक्तित्व तुम्हारा नाष कर देगा, सुदर्षन !’’
 
मां की बात पर पुत्र बोला ‘‘मम्मी न मैं खोखला हंू न मेरा समाज। हर समाज की अपनी स्वयं की परम्परायें, धारणाएं होती हैं। मेरे समाज का षास्त्र यही कहता है। उसका कर्णधार होने के नाते उसकी परम्पराओं को निभाना, उसकी धारणाओं को और मजबूत बनाना हमारा परम प्रमूख कर्तव्य है, ओर अपने कर्तव्य को हम पूरा कर रहे हैं, अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए हमें आप लागों से लड़ना पड़ रहा है।’’
 
‘अनुचित अधकारों के लिए लड़ते हुए तुम अपने उचित-वास्तविक अधिकार को भूल चुके हो। तुम्हारी षिक्षा का क्या होगा ?’’
‘‘दुनियादारी को समझना सबसे बड़ी षिक्षा है।’’
लक्ष्मीदेवी झल्लाकर बोली ‘‘तुम मूर्ख हो, तुम कुकर्मी हो।’’ ‘आजकल सतकर्मियों और कुकर्मियों में कोई फर्क नहीं रह गया मम्मी।’’
‘‘क्या मतलब ?’’
‘‘बुरा न मानना। डैडी को ही लेता हंू। रोज भगवान की पूजा करने के साथ हज़ारों रूपये की टैक्स चोरी करते हैं, उन्हें आप सतकर्मी कहेंगी या कुकर्मी ?’’
पुत्र के मुख से पिता के प्रति अपमानजनक षब्द सुनकर मां के तन-बदन मे आग लग गई। क्रोध से चिल्लाकर बोली, ‘‘नीच ?’’ कमीने ! ! दूर हो जा मेरी आंखों से। निकल जा इस घर से।’’
मुस्कुराकर संयत भावों से सुदर्षन ने कहां ‘‘मैने तो हकीकत बयान की है, एक तर्क दिया है।’’
 
पर मां षांत न हुई, चिल्लाती हुई कहले लगी ‘‘कुते ! तेरी इतनी हिम्मत कैसे हुई ? नमकहरामी ! जिसने तुझे पाल-पोसकर बड़ा किया, आज उसी पर थूकते तुझे षर्म नहीं आयी ? तू उसके एहसानों का ये फल दे रहा है। डूब मर नीच !’’
‘‘मेरे साथ ज्यादा बकवास न करो जाओ यहां से। जाओ यहां से।’’
पुत्र को क्रोध आया कि उसने मां को धक्का दे दिया। मां लड़खड़ाकर गिर गई। उसने दरवाजा बंद कर लिया।
‘‘वाह री, कलयुगी औलाद !’’
 
रामपाल ने सुदर्षन का यह कुकृत्य देखते ही कहा और अपनी मालकिन की ओर लपका। लक्ष्मीदेवी को सहारा दिया तो बोला, ‘‘रहने दे रामपाल ! उठ जाउंगी। जब कोई दुष्मन घाव लगाता है, तो मीत उसे सहलाता है। परतु अब जमाना ही बदल गया है, मीत ही दुष्मन बन बैठा है।’’
परतुं रामपाल ने अपनी मालकिन को सहारा देकर खड़ा कर दिया।
‘‘हे भगवान ! ये किस जन्म का तू हमें फल दे रहा है ?’’
लक्ष्मीदेवी स्वयं को कोसती जा रही थी, गम के आंसू बहाये जा रही थी।