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खोखली नींव
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खोखली नींव (इकीस)
ISBN: 345

 सुदर्षन पूरी रफतार से स्कूटर चलाता हुआ घर की ओर आ रहा था। उसकी आंखों में षराब के नषे की परछाई थी, वो लाल थी। षुक्र है, वो मदहोष नहीं था। नहीं तो किसी ट्क से टकराकर या फिर नषे के झोंक में किसी पेड़ से टकराकर अपने अस्तित्व को खो बैठता।

 
घर आया। स्कूटर गैराज़ में खड़ा करके, चुपचाप भीतर आ गया। षिवचरणबाबू के कमरे की बती जलती देखकर उसका हृदय धड़कने लगा। बुदबुदाया ‘‘मर गये !’’
 
तभी उनके कमरे का दरवाजा खुला। लक्ष्मीदेवी उसे झांकती दिखाई दी। वो बोली ‘‘आ गए ! खाना तो खा चुके होंगे ?’’
‘‘हां।’’
‘‘ठीक है, सो जाओ।’’
लक्ष्मीदेवी ने फिर से दरवाजा बंद कर लिया। सुदर्षन ने राहत की सांस ली। अपने कमरे में आ गया। कपड़ें बदलकर बती बंद करके बिस्तर पर लेट गया।
सारी दुलियां को भूल कर अब वो गीता को याद कर रहा था।
गीता ?
उसकी नई मित्र !
उसकी प्रथम प्रत्यक्ष-प्रेमिका !
आ-हा ? दोनों परसों पिकनिक पर मिले। युवा-हृदय धड़के। चाहत की उमंग उत्पन्न हो गई। सुदर्षन ने अपने मन-मंदिर में गीता की छवि बैठा दी और गीता सुदर्षन की दीवानी हो उठी ! प्रेम का सागर लहराने लगा। तब किसी ने गीत गायाः
 
‘‘बजाओ खुषी भरी मदृंग
जीवन की संुदर आस पर,
दिलों की व्याकुल प्यास पर
जब छा जाए रंग
मनाओ खुषी से राग-रंग !
मिलन-घड़ी निकट आने पर,
संसर्ग-सुख पाने पर
लबों पर जब आये कम्पन
फैलाओ प्रेम भरी तंरंग !’’
दोनों ने एक-दूसरे को खामोषी से देखा-परखा, और बस ! और कल !
 
कल गीता उसे बस -स्टाप पर खड़ी दिखाई दी। सुदर्षन ने स्कूटर रोक लिया। गीता की ओर देखकर मुस्कुराया और बोला, ‘‘हैलो गीता आ जाओ।’’
 
गीता मुस्कुराती हुई सुदर्षन की ओर बढ़ आई। उससे हाथ मिलाया और बोली ‘‘दरियागंज जाना है।’’
‘‘बैठो।’’
गीता पिछली सीट पर बैठ गई। स्कूटर चल पड़ा।
‘‘कहां जा रहे थे ?’’
गीता ने प्रष्न किया।
‘‘घूमने !’’
‘‘अकेले !’’
बात आगे बढ़ाई गीता ने।
‘‘कोई साथी जो नहीं !
‘‘मै। साथ दूं ?’’
‘‘इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है !’’
आनंद विभोर होकर सुदर्षन ने उतर दिया।
 
स्कुटर आगे बढ़ गया। दोनों बातों-ही-बातों में एक दूसरे के हृदय स्थल में लोट लगा रहे थे। एक रेस्तरां में बैठकर दोनों ने दो-दो पैग लिए अपने नवोदित प्रेम की खुष्ी में। हाथ-में-हाथ डाले रेस्तरां से बाहर निकले, और फिर गीता ने विदा ली, अगले दिन यानि आज मिलने का वायदा करके।
 
षाम का समय था। मौसम सुहावना था। दोनों जवान-दिलों में नवोदित-प्रेम का नषा छाया हुआ था
‘‘सुदर्षन ! एक बढ़िया जगह चलोगे आज ?’’
सुदर्षन के कंधे पर सिर टिकाते हुए गीता ने कहा।
‘‘तुम कहो और मैं इंकार करूं ! बोला कहां ?’’
‘‘उर्वषी !’’
‘‘ ‘क्नाट-सरकस’ में है न ?’
‘‘हां’’
स्कूटर का मुख बदला। प्रेम भरी बातों के साथ-साथ वो सिगरेटें भी जल उठीं, स्पेषल सिगरटें ! चरसयुक्त !
‘‘सुदर्षन ! भूल तो न जाओगे ?’’
‘‘कैसी बात करती हो, गीता ! तुम जैसी मित्र पाकर मैं स्वयं को भाग्यषाली समझने लगा हंू !’’ सुदर्षन ने अपने मन की बात कही।
‘‘सच सुदर्षन ! तुम बहुत अचछे हो !’’
गीता ने पीछे बैठे हुए अपने वक्ष को सुदर्षन की कमर से लगा कर जोर से दबाव डाला। फिर स्वयं ही सिसकरी भर उठी।
ऐसी बाते दोनों के मध्य चलती रही। थोेड़ी ही देर पष्चात वो उर्वषी के बाहर थे। एक-दूसरे की कमर में हाथ डाले दोनों रेस्तरां में प्रवेष कर गए।
‘‘यहां कोई्र खास वस्तु है ?’’
आराम से कुर्सी पर बैठकर सुदर्षन ने गीता से पूछा।
‘‘हां, कैबरे !’’
बिल्कुल सुदर्षन के मुख के समीप अपना मुख लाकर गीता बोली। सुदर्षन जरा-सा गड़बड़ा गया। गीता खिलखिलाकर हंस पड़ी। सुदर्षन भी हंसा।
‘‘अभी एक घंटा।’’
गीता फिर बोली।
‘‘कुछ मंगवा लेते है’’
तभी वहां वेटर आर्डर लेने आया। सुदर्षन ने गीता से पूछा ‘‘क्या लोगी !’’
‘‘जो मंगवाओगे !’’
सुदर्षन ने वेटर को ‘रम’ के पैग ओर ‘चिप्स’ लाने को कहा। थोड़ी ही देर में बैरा सामान ले आया। भीड़ लगातार बढ़ती जा रही थी।
‘‘आज सबीना कैबरे पेष कर रही है। उसके नृत्य वाने दिन बहुत भीड़ होती है।’’ गीता ने बात आगे बढ़ाई।
‘‘सबीना !’’
नाम सुनते ही सुदर्षन चौंका। उसका मस्तिष्क उसी क्षण बम्बई के वेष्यालय की ओर जा घूमा। उसे ‘वह ’ सबीना याद हो आई।
‘‘क्या हो गया है तुम्हे ?’’
गीता ने उसकी चौंकाहट देखकर पूछा।
‘‘कुछ नहीं ! ये नाम सुनकर किसी की याद आ गई थी !’’
सुदर्षन ने धीमें से कहा।
‘‘किसकी ?’’
‘‘थी एक, बम्बई में मिली थी !’’
सुदर्षन ने जाने क्यों एकाएक गम्भीर हो गया था।
‘‘उसका और इसका कोई मेल ? ये एक नर्तकी है, वो कौन थी ? गीता अपनी उत्सुकता षांत करने का प्रयत्न कर रही थी।
‘‘वेष्या !’’
धीमें से कहकर सुदर्षन ने पूरा गिलास एक घंूट में अपने हलक से नीचे उतार दिया।
‘‘वेष्या ?’’ गीता ने सुना। चौंकी। अगले ही क्षण उसने भी गिलास खाली कर दिया। तब बोली ‘‘ओह ! बड़ी सुदर होगी ?’’
 
सुदर्षन ने एकाएक उसकी बात का उतर न दिया। कुछ क्षणों के पष्चात बोला ‘‘उसकी जीवन गाथा बड़ी ही दर्दनाक थी। कभी-कभी उसकी याद आ जाती है, तो दिल उदास हो जाता है।’’
‘‘मुझे भी सुनाओ उसकी दास्तान !’’
गीता की उत्सुकता बढ़ चुकी थी। सुदर्षन ने उसकी बात सुनकर कुछ न कहा। वेटर को बुलाया और उसे ‘रम’ के दो डबल पैग लाने को कहा। वेटर ‘रम’ लाया तो गीता फिर बोली ‘‘सुनाओगे ?’’
‘‘सुनो !’’
‘रम’ का एक लंबा घंूट भरकर सुदर्षन ने ‘उस’ सबीना की दास्तान कहनी षुरू कर दी, गीता बड़ी तन्मयता के साथ उसकी बात सुनती रही। बात समाप्त हुई तो गीता ने कहा, ‘‘ओह ! कितना जालिम था उसका प्रेमी !’’
 
दोनों फिर चुपचाप अपना-अपना पैग खाली करने में लग गए। गीता अब गम्भीर थी। सुदर्षन ने देखा, तो उसकी गम्भीरता तोड़ने के लिए बोला।
सबीना क्या अच्छा नाचती है ?’’
‘‘हूं, हां और अंग-प्रदर्षन भी काफी करती है।’’
‘‘तभी तो !’’
हॉल का निरीक्षण करते हुए सुदर्षन ने कहा।
‘‘तभी तो क्या ?’’
गीता की गम्भीरता टूटी।
‘‘पूरे हॉल में हम जैसे भरे हैं’’
‘‘हां’’
दोनों हंस पड़े।
नौ बज गए !
 
रोषनी धीमी हो गयी और संगीत का स्वर तीव्र हो उठा। अंधकार-युक्त मंच पर रोषनी का एक दायरा चमाका, उस दायरे के बीच कुमारी सबीना थिरक रही थी।
बिजली की भांति बल खाती हुई, सबकी भूखी नजरें अपने अर्द्धनग्न षरीर पर टिकवाती हुई, कुमारी सबीना अपना उतेजक नृत्य पेष करने लगी। वो जहां भी जाती तीव्र रोषनी का दायरा उसके साथ होता।
लगभग पांच मिनट नृत्य चलता रहा और फिर एक पल के लए रोषनी गुल हो गई। हॉल दुबारा जगमगाया, तो सबीना गायब हो चुकी थी। सुदर्षन उसके नृत्य निहारने में इस क्रद लीन हो चुका था कि उसके जाते ही चौक कर एक दम खड़ा हो गया।
‘‘क्या हुआ ?’’
गीता ने उसकी चौंकाहट देखकर पूछा। सुदर्षन संभला, उसे आभास हुआ कि नृत्य समाप्त हो चुका है। बैठ गया, फिर बोला
‘कमाल का नाचती है !’’
‘‘सभी यही कहते हैं ! मेरा ख्याल है तुमको वो अत्यधिक पसंद आई !’’
‘‘वो नहीं, बल्कि उसकी चंचलता, उसका नषीला नृत्य !’’
‘‘एक ही बात है ! खाना खाएं ?’’
‘‘हां’’
खाना समाप्त करने के पष्चात दोनों ने एक-एक पैग और लिया और सिगरेट के कष खींचते हुए बाहर आ गये। डेढ़ घंटे तक वो क्रीड़ावन में बैठे प्रेमालाप करते रहे और फिर अपने-अपने नीड़ को लौट चले, अगले दिन मिलने का वायदा करके !
 
‘हाय गीता ! कितनी मुष्किल हैं तंहाईयां बिताना !’’ रात काटे नहीं कट रही गीता ! क्यों रोज हंसा-हंसा कर अपने घर चली जाती हो ?’’ सुदर्षन ये सब बिस्तर पर लेटा ऐसे कह रहा था, जैसे कि उसे गीता से मिले बरस बीत गये हों, ‘‘आओ न गीता ? आओ मेरे पास। दोनों एक नये नीड़ का निर्माण करेंगे, उसी में मिलकर रहेंगे, आओ गीता, मेरे सीने से लग जाओ। देखता नहीं, मैं किस भांति तड़प रहा हंू, आओ ! मेरी तडपन दूर करो आओ-आओ-आओ न ! प्रिय-प्राणेष्वरी !’’
सुदर्षन की आंख झपक चुकी थी और वो यौवन की कैद की गहराईयों में उतरता चला जा रहा था।
एक महात्मा ने कहा है।
‘‘अन्न से रस बनता है, रस से रक्त और रक्त से वीर्य, वीर्य से जीवन ?
और वीर्य नाष से
जीवन नाष।