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खोखली नींव
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खोखली नींव (बीस)
ISBN: 345

 

 
इस संसार की, सांसारिक मनुष्य की प्रकुति कुछ ऐसी है कि वो अधिक अकेलापन नहीं सहन कर पाता। इसकी अधिकता में वो बौखला जाता है। लक्ष्मी देवी को घर का कुछ अधिक काम न करना पड़ता था। जो थोड़ा-बहुत काम होता था, उसे वो सुबह ही समाप्त कर लिया करती थी। षेष दिन उनका अपने षौक पूरे करने में बीतता था। दिन भर पत्रिकाए-पुस्तकें पढ़ना, सिलाई-कढ़ाई का काम करना उन्हें भाता था। कभी जब वो अपने इस दैनिक कार्य-कलापों से उब जाती तो उठकर पड़ौस में चली जाया करती थी।
 
सुदर्षन के प्रति वो फिर से षंकित हो उठी थी। उसे महाविद्यालय में दाखिला लिये एक महीने से कुछ दिन उपर हो गए थे। अब फिर कभी-कभी उन्हें उसके मुख से षराब की गंध सूंघने को मिली थी। अपने पति, षिवचरणबाबू, की आज्ञा के कारण वो उस पा हाथ न उठाती थी, पर उसकी गतिविधियों को जानने के इच्छुक थी। इच्छा-पूर्ति के लिए उन्होंने अमित से मिलना उचित समझा। अमित और सुदर्षन एक ही महाविद्यालय में पढ़ते थे। दोनों के विषय अलग-अलग हैं, मगर फिर भी एक-दूसरे के बारे में जानकारी तो रखते ही होंगे, ऐसा विचार कर लक्ष्मीदवी अमित के घर की ओर चल पड़ी।
 
अमित के घर के मुख्य-द्वार पर पहंुच कर उन्होने घंटी बजाई। कुछ क्षणों के उपरांत द्वार खुला। द्वार अमित ने खोला था। लक्ष्मीदेवी को देखकर अमित के हाथ जुड़ गए।
 
अमित के अभिवादन का उतर देती हुई बोली ‘‘जीते रहो ! पढ़ाई कैसी चल रही हैं ?’’
साथ ही लक्ष्मीदेवी भीतर आ गई।
‘‘जी ठीक चल रही है।’’
बैठक में आकर अमित ने उन्हें आदरपूर्वक बैठने केा कहा। कुर्सी पर बैठ कर वो बोली, ‘‘माताजी कहां हैं तुम्हारी ?’’
‘‘वो वाज़ार गई हुई हैं, आती ही होंगी।’’
लक्ष्मीदेवी ने कुछ नहीं कहा। कुछ पल तक कुछ सोचती रही, फिर बोली, ‘‘मुझे तुमसे एक काम था अमित !’’
‘‘कहिए !’’
‘‘मै। जो कुछ पूछूं सच-सच बताना !’’
‘‘मेरी झूठ बोलने की आदत नहीं हैं, आंटी !’’
अमित का उतर विष्वास भरा था। ऐसे विष्वास को जग ‘अहं’ कहता है। ये वास्तविकता थी। अपने जीवन में उसने षायद ही कभी झूठ बोला था। झूठ तो कुकर्मी बोला करते हैं, वो कुकर्मी थोड़े ही था !
 
‘‘बेटा कुछ दिन पहले हम यह समझने लग थे कि सुदर्षन सुधर गया है और अपनी सही राह पर चलने लगा है। परंतु अब फिर से मुझे उसके आचरण पर षंका होने लगी है। लगता है उसको फिर से बुरी संगत मिल गई है। तुम्हें उसके बारे में काफी कुछ मालूम होगा। कुछ बताओ मुझे !’’
 
अमित हिचकिचा उठा, बोला ‘‘मैं, मैं आंटी ! आप मुझे क्यों पूछ रही हैं ? मैं किसी की अच्छाई-बुराई का वर्णन करनेवाला कौन होता हंू !’’
 
अमित सुदर्षन के विचारों का घोर विरोधक था। मगर स्वये को एकाएक उस स्थिति में न ला सका, जहां पहंुच कर वो अपने विचार व्यक्त कर सकता।
 
‘‘अपने भाई को ठीक राह पर नहीं लाना चाहते ?’’
लक्ष्मीदेवी की यह बात सुनकर अमित निरूतर हो गया, बोला ‘‘मैं, आंटी क्या कर सकता हंू, आप खुद ही समझदार हैं। आपका षंक, बिल्कुल सत्य है। आंटी ! सुदर्षन काफी आगे बढ़ चुका है अब उसका क्षेत्र काफी विस्तृत हो चुका है। वो षराब, सिगरेट, जुए के साथ-साथ चरस, एल एस डी आदि नषीले पदार्थो का सेवन करने लगा है। आंटी ! संगत केा विचारों को विस्तृत करती है, ये तो हम और हमारा मस्तिष्क है, जो विचारों को जन्म देते हैं, सुदर्षन सोच-विचार नहीं करता, उसके मस्तिष्क की घुड़ी विपरीत दिषा में घूमी हुई हैं आंटी ! जब तक उसे ठोकर नहीं लगेगी, तब तक उसे जीवन के मूल्य का अहसास नहीं होगा, और ‘एहसास’ के बिना अब आत्मज्ञान सम्भव नहीं ।’’
 
लक्ष्मीदेवी ने चुपचाप अमित की सारी बात सुनी। हताष-भावों से बोली ‘‘हां ! मेरे भाग्य-विधाता ! तूने मुझ संग बड़ा अन्याय किया।’’
लक्ष्मीदेवी कुछ मिनट चुपचाप बैठी रही, फिर अपने घर चल आई।
 
रात्रि के आठ बज चुके थे। रामपाल रसोई मे खाना तैयार कर रहा था। लक्ष्मीदेवी अपने कमरे में बैठी थी। गम्भीर विचारों के संग उनका अंतर्मन खिलवाड़ कर रहा थाः ‘गृहस्थ-आश्रम में प्रवेष करने के पष्चात औरत में एक चाह जन्म लेती है, वो अपने प्रभू-प्रेम की निषानी पाने की कल्पना करती है, उसमें संतान प्राप्ति ही चाह उत्पन्न होती है। कल्पना साकार हुई तो ये तात्पर्य नहीं कि उसकी कल्पना का क्षेत्र संकुचित हो जाता है। संतान उत्पन्न होने के पष्चात मां की कल्पना और विकसित होती है। बच्चा आंगन में किलकारियां मारकर सबका जी हर ले, प्रत्येक मां की यही हार्दिक कामना होती है। मां बच्चे की टटी-पेषाब को अपने हाथों से साफ करती है। घृणा भाव उससे कोसों दूर होता है। स्वयं बच्चे के मल मूत्र से भरे बिस्तर पर सोती है और उसे सूखे कोमल बिस्तर पर सुलाती है। ये सब आखिर एक मां क्यों करती है ? अपने मातृ स्नेह के कारण ममता का उबाल द्रुतगति से पुत्र को पालने के लिए उसे विवष कर देता है। बच्चा खेलता है, बड़ा होता है, मां को आनन्द मिलता है। मगर जब वही बच्चा जिसे नौ माह तक कोख में रखकर, जिसकी सारे बचपन टटी-पेषाब साफ करते मां ने जिसे नव-जीवन दिया है, मां ने जिसे विकसित पथ प्रदान किया है, वही अगर बड़ा होकर अपनी मां को तड़पाना षुरू कर दे तो मां की क्या दषा होगी ? जिस सुदर प्रेम रूप की उसने कल्पना की थी, उसकी कल्पना का वह संसार तो टूट जाएगा।
 
‘मैंने सुदर्षन को क्या इसीलिए पाल पोसकर बड़ा किया कि वो मेरी और अपने पिता की रातों की नींद भी हराम कर दें, हमें लोगों के हंसी-मजाक-तानों का कारण बनाए, भरे बाजार में हमारी इज्जत की नीलामी कर दे ? हे भगवान ! ये हमें तू किस जन्म का फल दे रहा है ?’
 
समय निरंतर, अपनी गति से, आगे बढ़ता जा रहा था, लक्ष्मीदेवी के विचारों की नैया भी आगे बढ़ती जा रही थी। इसी तरह रात के ग्यारह बज गये। सुदर्षन अभी तक नहीं आया था। षिवचरणबाबू के आने का समय हो चुका था। सवा ग्यारह बजे के करीब कार के आने की आवाज़ आई। उठकर वो बाहर आ गई।
 
कार से उतरकर षिवचरणबाबू ने मुस्कुराते हुए लक्ष्मीदेवी को अपना ब्रीफकेस पकड़ा दिया। लक्ष्मीदेवी के मुख पर उदासी देखकर बोले ‘‘क्या बात है ? खोेयी-खोयी क्यों हो ?’’
‘‘सुदर्षन अभी तक नहीं आया।’’
‘‘फिर लेट आना षुरू हो गया है।’’
‘‘जी।’’
लक्ष्मीदेवी और कुछ न बोली। षिवचरणबाबू कुछ सोचते हुए अंदर आ गये। लक्ष्मीदेवी भी उनके साथ थी। वो बोले ‘‘कुछ कहकर गया था ?’’
‘‘जी नहीं।’’
वह फिर चुप हो गए। कपड़े बदलने के पष्चात दोनों खाने के कमरे में आ गए। रामपाल खाना लगा चुका था। दोनों चुपचाप खाना खाने लग गए।
‘‘लगता है वो फिर से बुरी संगत में पड़ गया है।’’
खाना समाप्त करने के पष्चात षिवचरणबाबू बोले।
‘‘उसकी संगत छूटी ही कब थी ?;;
‘‘पीछे काफी दिन तो ठीक रहा’’
‘‘वो हमारी गलतफहमी थी।’’
लक्ष्मीदेवी का कथन सुनकर षिवचरणबाबू को अचम्भा हुआ बोले, ‘‘तुम्हें किसने कहा ?’’
‘‘आज अमित से पूछा था उसके बारे में।’’
‘‘ओह ! वो क्या बोला ?’’
 
इसपर लक्ष्मीदेवी ने सविस्तार अमित और अपने बीच हुई वार्ता कह सुनाई। सब कुछ सुनकर षिवचरणबाबू ने अपना माथा पकड़ लिया, केवल इतना ही बोले ‘‘हे भगवान !’’
 
साढ़े बारह बज चुके थे। तभी स्कूटर आने की आवाज़ हुई। षिवचरणबाबू उठने कीे हुए कि लक्ष्मीदेवी ने उनकी बाजू पकड़ ली और बोली, ‘सुबह बात कर लेना।’’
‘‘मैं अभी उससे बात करना चाहता हंू क्योंकि’’
उनकी बात बीच में ही काटकर वह बोली ‘‘उसकी आदत से तो आप वाकिफ हैं ही। रात का समय है। जरा कुछ कहा तो सारे षहर को सिर पर उठा लेगा’’
‘‘पर कल सुबह मुझे आगरा जाना है और हो सकता है रात वहीं बीते’’
‘‘आगरा ! वहां किसलिए ?’’
‘‘रामप्रसाद के केस के सिलसिले में।’’
 
किसी व्यापारिक कार्य के कारण उन्हें आगरा जाना था। सुदर्षन के बारे में बात करते हुए वो पहले बताना भूल गए थे। सुनकर लक्ष्मीदेवी बोली, ‘‘ओह !’’ कुछ क्षण सोचती रही फिर बोली, ‘‘फिर आकर बात कर लेना, अब रहने दीजिए। इज्जत बड़ी चीज हैं’’
‘‘हंू’’
षिवचरणबाबू फिर वे लेट गए। लक्ष्मीदेवी ने उठकर कमरे का दरवाजा खोलकर बाहर झांका। तभी सुदर्षन ने गुनगुनाते हुए भीतर प्रवेष किया।