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खोखली नींव
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खोखली नींव (उन्नीस)
ISBN: 345

 गुलाब के पौधे की कलम जब बगिया में लगाई जाती हैं, तब वो माली के सिवाय किसी को भी प्रिय नहीं लगती ! सादगी और संयम उसके साथी जो होते है तब ! पर माली को मालूम हे कि इन्हीं तत्वों के बल पर एक दिन उपवन में बहार आएगी। कलम का ज्यों-ज्यों विकास होता जाता हें, त्यों-त्यों उसमें सुंदरता के लक्षण आते दिखाई पड़ते हैं।

 
उसकी टहनियां निकल आती हैं पौधा हरी-हरी, सुनहरी-सुनहरी पतियों से भर उठता है। ये सौवन की बहारों के लक्षण हैं !
 
कुछ समय और बीतता है, पौधा कलियों से भर उठता हे। दो दिन ओर बीतने पर प्रत्येंक कली गुलाब का एक सुदर फूल बन जाती है। फूल की सुगंध चारों और फेलने लगती है, उसकी महक पा भौंरे उस पर मंडराने लगते हैं, ये उस पौधे की जवानी का मौसम होता है।
 
नए फल पौधे पर उगे। बगिया में फिर से बहारें आ गई। पुराने चेहरे नए चेहरों को परखने की तैयारी में जुट गए। विष्व-विद्यालय खुला। मिलन-घड़ी आ गई, ‘रैंगिग’ का मौसम अपने यौवन पर आ गया।
 
विष्वविद्यालय-परिसर में आज काफी रौनक थी। कारों की पौं-पौं, स्कूटर की पीं-पीं, युवा-वर्ग के हंसी-ठहाकों से पेरे ष्विविद्यालय का वातावरण रंगीन था। पहाविद्यालयों के प्रागणों में छात्रों की ीाीड़ नजर आ रही थी।
 
नए सत्र का पहला दिन था।
सुदर्षन, गुरजीत के साथ अपने सकूटर पर पहाविद्यालय आया। दोनों का हृदय घड़क रहा ािा। स्कूटर खड़ करके अभी वों दोनों दा कदम ही अके बढे ोि कि एक आवाज ने उसकने कदम थाम लिये ‘‘हान्ट फ्रेषरस।’’
 
आवाज काफी रोबीली थी। दोनों ने अपनी बांई ओर देखा। लान की हरी घस पर पांच अग्रज खड़े थे। एक न उन्हें अपनी ओर अपने का ईषारा किया। दोनों डरते हुए उनकी ओर बढै़। कुछ देर तक पांचों अंग्रज़ उनहें घूरते रहे। वो दोनों आंखें नीची किए उनके सामने खडे़ रहे। उनकी ऐसी दषा देखकर एक अंग्रज़ ने कहा, ‘‘अरे ! तुम दोनों को अपने से बड़ों के साथ बात करने की जरा भी तमीज़ नहीं हैं। कुतों की तरह क्या खड़े हो ! मां-बाप ने चरण-बंदना करनी नहीं दिखाई क्या ?’’
 
विष्वविद्यालय-परिसर में आज काफी रौनक थी। कारों की पौ-पौं, स्कूटरों की पीं-पीं, युवा-वर्ग के हंसी-ठहाकों से पूरे विष्वविद्यालय का वातावरण रगीन था। महाविद्यालयों के प्रागणों में छात्रों की भीड़ नहर आ रही थी।
 
नए सत्र का पहला दिन था।
सुदर्षन, गुरजीत के साथ अपने सकूटर पर महाविद्यालय आया। दोनों का हृदय घड़क रहा था। स्कूटर खड़ा करके अभी वो दोनों दो कदम ही आगे बढें थे कि एक आवाज ने उनके कदम थाम लिये ‘‘हाल्ट फ्रेषरस।’’
 
आवाज काफी रोबीली थी। दोनों ने अपनी बाई ओर देखा। लॉन की हरी घास पर पांच अंग्रज़ खड़े थे। एक ने उन्हें अपनी ओर आने का ईषारा किया। दोनों डरते हुए उनकी ओर बढे। कुछ देर तक पांचों अंग्रज़ उन्हें घूरते रहे। वो दोनों आंखें नीची किए उनके सामने खड़े रहे। उनकी ऐसी दषा देखकर एक अंग्रज़ ने कहा ‘‘अरे ! तुम दोनों को अपनों से बड़ों के साथ बात करने की जरा भी तमीज नहीं है। कुतों की तरह क्या खड़े हो ! मां-बाप ने चरण-बंदना करनी नहीं सिखाई क्या ?’’
‘‘जी !’’
घबराहट में गुरजीत के मुख से निकला।
‘‘जी !’’ उसकी नकल उतारते हुए एक अग्रज़ बोला, ‘‘चलो हम पाचों के चरण कमलों को छुओ।’’
दोनों झिझके।
‘‘ऐं ! ये झिझक कैसी ? चलो !’’
दोनों को मजबूरन झुकना पड़ा।
‘‘हां षाबास ! भ्गवान तुम्हें और तुम्हारे सुहाग को बनाए रखे।’’ एक अंग्रज़ ने दोनों के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।
फिर पांचों खिलखिला कर हस पड़े।
‘‘व्हॉट इज़ योर नेम ?’’ - तुम्हारा नाम क्या है ?
एक अग्रज़ ने गुरजीत से पूछा।
‘‘गुरजीत चावला।
‘‘एंड योर ?’’ और तुम्हारा ?
उसने सुदर्षन की ओर अंगुली उठाई।
‘‘सुदर्षन भाटिया।’’
‘‘हां तो सुदर्षन चक्रधारी जी ! जरा ये बातने का कष्ट करें कि कितनी गोपियां उपके विचोग में प्रतिदिन आत्महत्या करती हैं ? कितनी आपको अपने कोमल-आंसूओं से भीगे पत्र प्रतिदिन प्रेषित करती हैं ? जरा हमे भी बताइये कबूतरियों को फॉसने के तरीके !’’
 
अपने साथी की बात सुनकर षेष सभी आग्रज खिलखिला कर हंस पड़े। वो दोनों भी मुस्कुराये। मगर एक पल के लिए, एक अग्रज बोला, ‘‘सावधान ! मुस्कुराना बंद करो। छाती चौडी, मर्दन उपर हिलो मत। नियमोंल्लघन करोगे तो सख्त सजा मिलेगी।’’
 
दोनों को सावधान की हालत में खड़ा होना पड़ा। तभी एक दूसरा अग्रज बोला, ‘‘तुम्हारे पास किमने-कितने पैसे हैं ?’’
‘‘एक रूप्या और बीस पैसे !’’
सफेद झूठ बोला गुरजीत ने।
‘‘मेरे पास तीन रूप्ये हैं !’’
सुदर्षन ने भी झुठ बोला।
 
‘‘साले झूठ ! हमारे भारतवर्ष के राष्ट्पिता श्री मोहनदास कर्मचंद गांधी, जिन्हें प्यार से लागे ‘बापू कहते थे, न कहा था कि मनुष्य को झूठ नहीं बोलाना चाहिए। झूठ बोलना महापाप हे। इससे वाणी की षुद्धता समाप्त हो जाती है। जल्दी से सच बको अन्यथा अभी नंगा रकवा के तलाषी लेता हं।’’
‘‘मेरे पास बीस के करीब हैं’’
आखिर गुरजीत ने सच बोला।
‘‘और तुम्हारे पास ?’’
सुदर्षन से पूछा गया।
‘‘आपकों चाहिएं कितने ?’’
सुदर्षन जरा टेढे स्वर में बोला।
‘‘वाह ! लखपति के बैटे हो क्या ?’’
 
सुदर्षन को अपनी भूल महसूस हुर्ह। तुरंत संभला ओर बोला ‘मेरा मलतब ऐसा नहीं था ! हम पास हुए हैं न, आपको पार्टी देना हमारा फर्ज’’
 
बेजेष नामक अग्रज उसकी बात काटकर झट से बोला ‘‘बनता है ! वाह ! वाह ! जरूर दो पार्टी ! आज ही । मिलाओ हाथ, हम सब तुम्हारे दोस्त हैं।’’
 
सभी ने उन दोनों को अपना-अपना परिचय दिया।
‘‘पार्टी कहां दोगे ?’’
हर्ष ने पूछा।
‘‘आप जहां कहेंगे !’’
‘‘काकटेल ?’’
मदन ने पूछा।
‘‘आपकी जैसी इच्छा !’’
सुदर्षन ने मुस्कुराकर उतर दिया।
 
उस रात पार्टी मनाई गई, काकटेल पार्टी ! षराब के साथ-साथ सुदर्षन एव गुरजीत ने एक नई वस्तु का स्वाद लिया, वो नई वस्तु थी चरस ! जिनका सेवन कर उन्हें लगा वो आनन्दलोंक में पहंुच गए हैं।