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खोखली नींव
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खोखली नींव (अठारह)
ISBN: 345

 सृष्टि में नदी का रूप उजागर हुआ ! ईष्वर ने उसकी धारा को चार दिषाओं में प्रवाहित किया !

पूरब, पष्चिम, उतर और दक्षिण !
सृष्टि मे मानव का रूप उजागर हुआ ! ईष्वर ने उसकी दषा प्रदर्षित करने के लिए समय के तीन रूप बनाए !
भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्य काल !
 
ईष्वर ने जब सृष्टि के निर्माण का कार्य आरम्भ किया तो सोचा था कि भविष्य मे पृथ्वी बनेगी, उस पर निवास करने के लिए जड़-चेतन प्राणी बनाए जाएंगें ! प्रयत्न षुरू किया ! भविष्य, वर्तमान बना ! पृथ्वी बनी, मानव बना अन्य जड़-चेतना प्राणी जन्में ! ईष्वर की कल्पना साकार हो चुकी थी ! अतीत का आरम्भ हुआ ! मगर वर्तमान ? उसका अपना क्या अस्तित्व ? समय अगर रूक जाए तो वर्तमान दिखेगा, वैसे वर्तमान का कोई अस्तित्व नहीं ! जीवन का हर अगला क्षण भविष्य है बीता क्षण अतीत, जो जी रहे हैं वो वर्तमान ! मगर वर्तमान बीतता जाता है ! अतीत के क्षण अतीत मे बने रहते हैं, इसीलिए तो कहा गया है, बीते क्षण दुबारा हाथ नहीं आते ! हम अपने कर्मों में लीन रहते है, हमें आभास ही नहीं होता कि कब भविष्य वर्तमान बना, कब वर्तमान अतीत ? गर्दन उठाकर देखते हैं तो पाते हैं, समय गतिषील है, वर्तमान निरंतर चलता रहता है, हम जो कुछ भी करते हैं अपने आने वाले अगले क्षण आर्थत भविष्य के लिए करते हैं !
 
सब कुछ हमारे हाथ में है। अपनी प्रकृतिदत-षक्ति का हम जिस रूप में प्रयोग करेंगे, उस रूप में ही हमें फल मिलेगा ! विजय अपने भीतर छिपी योग्यता का प्रयोग सही राह पर करने लगा था। धीरे-धीरे उसे ‘अतीत के विजय’ से घृणा होती जा रही थी ! आज उसका परीक्षा-परिणाम घोषित हुआ। वो असफल-घोषित हुआ था। चाह कर भी अपने आंसू न रोक पाया। दो पल रोया, पर फिर स्वयं ही उसने अपने आसूंओं को थाम लिया। आंखे पोंछ कर स्वयं से बोला ‘‘असफल तो होना ही था, सफल कैसे हो सकता था ? जब प्रयत्न ही नहीं किया तो फल कैसे पा सकता था ?’’
 
पिता केसरदास ने उसके असफल-घोषित होने का सुना तो नम्र वाणी से बोले ‘‘बेटा ! गम करने का कोई लाभ नहीं, जो होना था सो हो गया। पर आज तक तुमने जो कुछ खोया है, मेहनत करकें उसे फिर से पाने का प्रयत्न करो। जीवन जीना है, तो उसका अर्थ समझो, अथक प्रयत्न करते रहना ही जीवन है ! किसी के उपदेषों का यू ही असर नहीं पड़ता, जब तक हम उनको अपनी दिनचर्या में ढ़ालने का प्रयत्न न करें ! आषा करता हंू तुम अब पूर्णरूप से समझ चुके हो, अब आत्मनिर्देषों का पालन करने का प्रयत्न करो, सफलता मिलेगी।’’
 
विजय ने पिता की बात सुनी। श्रद्धा से नतमस्तक होकर बोला ‘‘आपका आषीर्वांद साथ रहा तो मैं आपके अरमानों को पूरा कर दिखा दूंगा।’’
 
‘‘विजय !’’ आनंद विभोर हो के केसरदास ने विजय को अपने हृदय से लगा लिया। फिर बोले ‘‘विजय ! तुम अब पढ़ना भी षुरू कर दो।’’
 
विवष-भावों से विजय ने उतर दिया ‘‘मगर एक साथ मैं दो काम कैसे कर सकता हंू ?’’
 
तब केसरदास बोले, ‘‘बेटा ! अगर परिश्रम करो तो सब कुछ कर सकते हो। पत्राचार विद्यालय में दाखिला ले लोे। प्रतिदिन रात्रि के समय अध्ययन किया करना।’’
 
विजय दो दिन तक अपने पिता की राय पर विचार करता रहा, फिर उसने पिता के कहे अनुसार पत्राचार विद्यालय में दाखिला ले लिया।