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खोखली नींव
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खोखली नींव (सत्रह)
ISBN: 345

 सदा-सदासे इस सृष्टि का यही नियम चलता आ रहा था कि मनुष्य अपने सम दुसरे किसी मनुष्य पर बिना किसी हिचक के विष्वास कर लेता था, षकांओं के तुफान का मानव-मन में अस्तित्व ही न था !

 
मगर आज !
एक यदि दूसरे से कहता है
‘‘आओ साथी ! विष्वास करो
जीवन-भर साथ निभाउंगा।’’
तो दूसरा उतर देता है
‘‘पथ लम्बा, क्षण भंगुर जीवन
दुर्बल-मन साथी मेरा,
आषा, निराषा बन जाए
विष्वास नहीं कर सकता, भैया !’’
समय बहुत परिवर्तनषील हैं। चाहते हैं सब हम पर ष्विास करें, मगर हम, चाहने वाले, न किसी को अपना विष्वास दे सकते हैं, न प्यार ! मानव-मन की ये अदभुत इच्छा कभी पूरी नहीं हो सकती ! त्याग कर नहीं सकते फिर किसी और के त्याग की कामना क्यों करते हैं ?
मगर मां ?
 
मां तो प्रत्येक परिस्थिति में अपने पुत्र पर विष्वास कर लेती है ! जहां ममता-प्रेम का बंधन हो, उस पावन-भूमि में उगा विष्वास का पौधा सदा हरा-भरा रहता है ! अविष्वास की चाह को बरबस ही मां ठोकर लगा देती है !
 
सुदर्षन ने साधूवाद का स्वांग रचा। घर से बाहर निकलना छोड़ दिया। बस फिर क्या था ? मां को विष्वास हो गया कि पुत्र सुधर गया है। पिता को सुचना देकर खुष कर दिया। मां-बाप पूर्ण रूप से आष्वस्थ हो गए। विष्वास के बंधन ने वास्तविकता पर पर्दा डाल दिया, उनकीं आंखों पर विष्वास के पौधे की पतियां छा गई, पुत्र का बुरा-पक्ष दिखना बंद हो गया।
 
आगे बढ़ते हुए क्षण सुदर्षन के मन में भय का भूत विकसित करते जा रहे थे, आखिर प्ररीक्षा-फल निकलने का दिन धीरे-धीरे समीप आता जा रहा था। आखिर प्रतिक्षित-दिवस आन पहंुचा ! आज आधी रात के समय उच्चतर-माध्यमिक का परीक्षा-परिणाम घोषित होना था। सुदर्षन काफी बेचैन था। दिन जैसे-तैसे करके गुजर गया रात आई तो उसे तड़पाने लगी। एक पल उसे एक युग के समान बीतता महसूस हो रहा था। कभी अंदर, कभी बाहर, कभी छत पर कभी नीचे, सुदर्षन बेचैनी से चक्कर काट रहा था। लक्ष्मी देवी उसकी यह दषा देख कर खुब हंसी। पर वो उसके दिल का हाल समझती थी। वो जानती थी कि जो मेहनत कम करते हैं, परिणाम घोषित होने वाले दिन उनकी यही दषा होती है। लक्ष्मी का रोम-रोम आज ईष्वर से प्रार्थना कर रहा था। उनकी यह हार्दिक इच्छा थी कि सुदर्षन ‘सफल’ घोेषित हो। अज्ञात-षंका से उनका दिन भी धड़क रहा था। उन्हें अपने दिल की घड़कन यंू कहती प्रतीत हो रही थी ‘हाय ! अगर सुदर्षन असफल घोषित किया गया तो हमारी इज्जत खाक में मिल जाएगी। लोग हंसेंगे। हे भगवान ! उसे सफल करना।’’
 
रात एक बज के करीब अखबार वाले की चिल्लाहट सुनाई दी ‘‘निकल गया, निकल गया, उच्चतर माध्यमिक का नतीजा निकल गया।’’
 
सुदर्षन भागता हुआ बाहर आया। अमित भी बाहर आ चुका था। अखबार देखी तो ज्ञात हुआ दोनों सफल-घोषित हैं, अमित का नाम ‘योग्य-छात्रों की सूची में आया है।
दोनों परिवारों के मध्य बधाई का आदान-प्रदान हुआ। सब खुष थे।’’
सब खुष थे ! खुषी से झूम रहे थे ! नहीं ! नहीं, षायद मैं गलत कह रहा हंू। मैं भी नाच रहा था, मैंने नहीं देखा कि एक ऐसा भी था, जो दुखी था !
कौन ?
एक ‘अज्ञात-षक्ति’ ! एक महात्मा !
मगर क्यों ?
वो दुःखी था कि उसे सुदर्षन और उस-सम विद्यार्थियों का भविष्य-चित्र दिखाई पड़ रहा था। वो भविष्य ज्ञाता था, इस लिए वर्तमान में ही जान गया था कि इस सफलता ने उनकी नींव के पत्थर को चुर-चुर कर दिया है ये सफलता नींव के पत्थर का अस्तित्व समाप्त कर खोखलेपन का नंगा नाच करवाएगी उनके जीवन-मंच पर ! अवास्तविक-सफलता प्राप्त कर व्यक्ति बड़ा प्रसन्न होता है, वास्तविकता का बाना पहने खोखली-नींव पर टिकी दिवारें उसे महल का रूप लगती हैं, मगर जब उसे वास्तविकता के दर्षन होते हैं, जब आधारहीन दिवारें उस पर निराषावाद की आघातें लगती हैं, तो वो भागता है अनजान राहों की ओर, जीवन से मुख मोड़ कर ! भौतिकता से नाता तोड़कर तब या तो वो जंगल की षरण लेता है या अस्पताल की चारदिवारी के भीतर जाकर काल का ग्रास बन जाता है ! कोढ़ की कोई दवा नहीं !
पर जानकर भी सब अनजान बने हैं।
न जानें क्यों !