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खोखली नींव
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खोखली नींव (पंद्रह)
ISBN: 345

 आधी रात का समय था। घर मं सभी प्राणी सेा चुके थे, सुदर्षन भी। नीरवता का साम्राज्य छाया हुआ था। सुदर्षन के कमरे में जीरो वाट का बल्व जल रहा था। कूलर की ठंडी हवा में सुदर्षन गदेदार पलंग पर सुख की नींद सो रहा था।

 
वह एक ऐसा प्राणी था, जिसे उसके मां-बाप ने किसी भी वस्तु की कमी नहीं दे रखी थी। सुख-चैन से जीवन बिताने के लिए हर प्रकार की आवष्यक, विलासिता के वस्तुऐ उसके लिए जुटाई गयी थी। हर प्राकर की स्वतंत्रता मिली हुई थी, जो कहता था, पूरा होता था। मनचाहे पैसे मनचाही वस्तुों पर खर्च करने के लिए मिल जाते थे। पर इसका तात्पर्य ये तो नहीं कि वो उनकों ऐसी वस्तुओं पर खर्च करे, जिनका प्रयोग उसे षोभा नहीं देता ! स्वतंत्रता का ये अर्थ तो नहीं ! विचारों की स्वतंत्रता का तात्पर्य स्वतंत्र विचार धारण करने से है, न कि उन विचारों की स्वतंत्रता का मनचाहा प्रयोग करने से ! अपनी विचारधारा का प्रयोग करने से पहले हमें उसके पूरे स्वरूप का अघ्ययन करना चाहिए। चिंतन कर उसके परिणाम के बारे में विचार करना चाहिए। अगर आषा मिले कि फल षुद्ध होगा तो उसे प्रयोग-क्षेत्र में लागू करने का प्रयत्न करना चाहिए, अन्यथा अपने उन विचारों को ताक में रख देना चाहिए ! ऐसा करने के लिए केवल दो क्षण का समय चाहिए बषर्ते कि हमारे संस्कार-विचार षुद्ध-सात्विक हों, हमें सत्य की राह मालूम हो और हम प्रयत्नषील मानव हों ! सुदर्षन में इसी तत्व की कमी है ! अपनी आत्मा के अज्ञान-क्षेत्र में घूम रहा है; बड़ा हो चुका है, समझदार है, मगर फिर भी समझता नहीं ! हीरों को अंधकार की गर्त में फेंक कर उपर उसने बरबूदार कीचड़ फेंक रखा है। सुंदर षरीर के भीतर गंदी बदबूदार नालियों से उठने वाली दुर्गंध समाई हुई है ! जानबूझ कर घृणित बना हुआ है।
 
एकाएक उसे प्यास लगी। उसकी आंख खुल गई उठकर उसने पानी पिया और फिर दुबारा पलंग पर लेट गया। इतने ही क्षणों मे उसकी आंखों की नींद न जाने कहां उड़ गई। सिरहाने को वक्ष से लगाकर उसने जोर से भींच लिया और अपने बदन को चादर से ढक कर औंधे मुंह लेट गया।
‘जाने कहां उड़ गई आखों से नींद मेरी !’
 
स्वयं से उसने कहा फिर स्वयं ही बोला ‘भूल जाओ नींद को यार ! चलो एक सुंदर सपना लेते हैं ! प्यार का, रोमांस का, आनन्दलोक का ! हां, सपना लेते हैं प्यार का ! प्यार का! रोमांस का ! आनंदलोक का ! मगर किससे ? रीटा से ! हां, रीटा से !
 
और अपनी आखें सिरहाने में छुपा वो सपना लेने लगा।
‘‘और, मेरे सपनों की षहजादी, आओ ! मैं तुम्हारी राह देखते-देखते थक गया हूं। जाने कब तक मुझे तड़पाओगी, आओ ना, आओ न !’’
 
सुदर्षन षालीमार पार्क के एक कोने में बैठा अपनी प्रेमिका रीटा का इंतजार कर रहा है। रीटा उसकी प्रेमिका है। प्रेम मिलन का समय आने वाला है। सुदर्षन का दिल बड़ा बेचैन हो उठा है। बार-बार वो अपनी दृष्टि मुख्यद्वार की ओर फेंकता है। मगर द्वार सुनसान है। रात का अंधेरा बढ़ने लगा है। पार्क सुनसान पड़ चुका हैं। सुदर्षन रीटा को न आते देख खिन्न हो उठा, तभी उसे रीटा आती दिखाई दी।
 
प्रेमाभिनय को व्याकुल-हृदय आनंद-मग्न हो उठा। दो प्रेमियों का मिलन हुआ और उपवन में बहारे छा गई।
 
सुदर्षन स्वपनलपेक से निकलकर अपनी जवानी की कैद की अंधेरी वादियों में उतरने लगा ! उतरता ही गया, थोड़ी देर बाद ही उसकी सांस फूल चुकी थी !
 
सुबह साढ़े सात बजे के करीब उसकी आंख खुली। अपनी आदतानुसार वो बिस्तर पर औधे मुहं लेटा रहा। कुछ देर पष्चात उसे मजबूरन उठना पड़ा। षिवचरणबाबू ने उसे पुकारा था। उठकर वो उनके कमरे में आ गया।
‘‘क्या बात है ?’’
सुस्त भावों से बोला सुदर्षन। षिवचरणबाबू अखबार को एक ओर दखते हुए बोले ‘‘बैठ जाओ।’’
उनके मुख पर आक्रोष भाव थे। सुदर्षन को घूरने लगे। उसी क्षण लक्ष्मी देवी भी वहां आ गई। कुछ क्षण यूं ही बीते। फिर षिवचरणबाबू बोले ‘‘तुम जुआ भी खेलते हो ?’’
‘‘जी नहीं !’’
धीरे से दृढ़ भावों से सुदरर्षन ने कहा।
‘‘झूठ !’’
‘‘आपको गलतफहमी हुई है !’’
 
‘‘बेटा ! गलतफहमियों का संषय करते-करते हम बूढे हो चुके हैं। अब हमें गलतफहमी नहीं हो सकती। मैं जो भी कुछ कहता हंू सोच-समझकर, देख-भालकर, अच्छी तरह जांच कर कहता हंू !’’
 
सुदर्षन का डर पिता की नरमी देखकर उड़ चुका था। झट से बोला ‘‘मैं नहीं जानता कि आपको किसने बहका दिया है !’’
षिवचरणबाबू के मुख पर छाये आक्रोष-भाव फूट पड़े, वो बोले, ‘‘तुम तो बिल्कुल कुकर्मी हो गए हो ! झूठ बोलने भी तुम्हें षर्म नही रही !’’
 
जब भय-भाव समाप्त हो जाता है, तो जुबान का क्षेत्र भी असीमित हो जाता है। पुत्र मां-बाप से अधिक तर्क-विर्तक नहीं करता, उसके भीतर अपने माता-पिता के प्रति आदर भावना होती है तथा भय होता है। पर जब पुत्र को खुली छूट दे दी जाती है तो वो कुछ भी कहने से नहीं हिचकिचाता। मन में उठे प्रत्येक भाव को प्रकट कर देता है, कुछ छिपाने की चेष्टा नहीं करता, कुछ दबाने का प्रयत्न नहीं करता ! सुदर्षन का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया था। जोर से कहने लगा ‘‘हां-हां, मैं कूकर्मी हंू ! मुझमें सब बुरे गुण हो गये हैं। मैं अब नाली का गंदा कीचड़ बन गया हंूं, हां-हां, मैं सिगरेट पीता हंू, मैं षराब पीता हंू, मैं जुआ खेलता हंू, लडकियों को छेड़ता हंू, मैं सब कुछ करता हंू, मुझे कोई नहीं रोक सकता !’’
 
तड़ाक ! तड़ाक !!
एन दोनों गालों पर थप्पड़ पड़ने लगे। लक्ष्मीदेवी का मुख क्रोध से लाल हो रहा था। सुदर्षन के बालों को उन्होंने अपने दोनों हाथों से पकड़कर जोर से एक झटका दिया। लड़खड़ा कर सुदर्षन फर्ष पर गिर पड़ा। उसके मुख से एक चीख निकली। उसकी परवाह न करते हुए वो बोली, ‘‘नीच, कुकर्मी, तुझे अपने पिता के सम्मुख जुबान चलाते षर्म नहीं आती, जा डूब पर चल्लू भर पानी में कुते !’’
 
सुदर्षन ने स्वयं को संभाला। खड़ा हो गया। विद्रोह की ज्वाला में जलते हुए बोला, ‘‘मार लो, जितना मर्जी मार लो। समय आने पर बदला लूंगा।’’
तड़ाक !
एक और थप्पड़ उसके मुख पर पड़ा। गालियों की बौछारी करती हुई जुबान थथलाने लगी। वहीं पर वो जड़ हो गया, एकाएक जोर से रोने लगा।
‘‘निकल जाओं यहां से ?’’
गुस्सेभरी आवाज़ में कमरे के दरवाजे की ओर संकेत करते हुए षिवचरणबाबू बोले। सुदर्षन तेजी से अपने कमरे की ओर चला गया। कमरे में कुछ देर तक निष्तब्धता छायी रही, फिर मौन भंग करते हुए षिवरणबाबू बोले, ‘‘सुनो ! अब इसे पैसे देने बंद कर दो !’’
‘‘ठीक है।’’
और फिर लक्ष्मीदेवी अपने कार्य में लग गई। षिवचरणबाबू नहाने के लिए गुसलखाने में घुस गये।