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खोखली नींव
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खोखली नींव (चौदह)
ISBN: 345

 इस जग की एक गति है। उसी गति के अनुसार इसमें परिवर्तन आते रहते हैं। प्रकृति, समय, विज्ञान सभी इस जग के सदस्य हें। एक समय था जब प्रकृति प्रर्ण रूप से स्वतंत्र थी। परंतु जब से विज्ञान ने जन्म लिया, प्रकृति की स्वतंत्रता उतरोतर कम होती जा रही है, वो विज्ञान के आधीन होती जा रही है। मगर एक सदस्य इस जग का समय भी है ! जो न किसी का गुलाम था, न है और षायद न होगा।

 
समय का अपना एक संविधान है निरंतन आगे बढ़ते रहना, राह में आने वाली रूकावटों को अपनी असीम-अज्ञात षाक्ति से रौंदते जाना ! पल, मिनट, घंटे, दिन, माह, वर्ष ये सभी समय के संविधान के प्रमुख अंग है। साठ पल बीतते हैं तो एक मिनट बन जाता है। साठ मिनट बीतने पर एक घंटा बीत जाता है। चौबीस घंटे बीतते है तो नये दिन का सूरज खिल उठता हे, तारीख बदल जाती है। आज नौ मई है, कल, चौबीस घंटों पष्चात, दस मई होगी।
 
मानव सदा अपने कर्मो में लगा रहता है, कुकमों में व्यस्तता, सतकर्मों में लवलीनता ! यही उसकी सबसे प्रिय वस्तु है, और इसे भला कैसे त्याग सकता है ?
 
बालक है, किषोर है या युवा, गलत काम करता हे तो परेषान होते है उसके माता-पिता। उनके प्रेम की निषानी, उनके कुल का दीपक कुकर्म करे ओर वो षांत-मन-वास करें, ये भला कैसे हो सकता है ?
 
सुर्दषन गलत राह का राही है। अपने मां-बाप की इकलौती संतान, कुल का एकमात्र दीपक है। अगर वही आंगन में उजियाला फैलाने के बाजाए, तम फैलाए, तम में उधम मचाये तो उसके मां-बाप परेषान तो होंगे ही ! वो कुल पर कलंक का टीका जो लगा सकता है उनकी प्रतिष्ठा को गिरा सकता है।
 
टेलीफोन की घंटी बजते ही ष्विचरणबाबू ने चोगा उठाया और बोले, ‘‘हैलो ! भाटिया !’’
‘‘हैला ! नमस्ते सर ! मैं सिन्हा बोल रहा हूं !’’
‘‘कहो ?’’
‘‘सर ! आज सुदर्षन को मैंने ‘षालीमार-पार्क’ में जुआ खेलते देखा।’’
‘‘ओह ! और कुछ ?’’
‘‘बाकी वही पुराना सर !’’
‘‘ठीक है!’’
चोगा बखकर षिवचरणबाबू चुपचाप बैठ गये। तब लक्ष्मी देवी ने पूछा, ‘‘क्या बताया उसने ?’’
 
‘‘रोज उसके कुकर्मो की संख्या बढ़ती जा रही है। आज पता लगा कि वो जुआ भी खेलता है।’’
‘‘जुआ ! हे भगवान, ये कैसी औलाद दे दी तूने ! इससे अच्छा तो देता ही न !’’
 
षिवचरणबाबू चुप रहे। वो गहरी सोच में डूबे हुए थे। परेषानी की दषा में इंसान कुछ चौकन्ना हो जाता है। छोटी-छोटी बात की वो पूरी खोज-जीन करने की चेष्टा करता है। और ये कोई छोटी बात नहीं थी। भटिया-परिवार की इज्जत का सवाल था, अत्यंत-विकसित ख्याति के गिरने का डर था! इसलिए षिवचरणबाबू ने अपनी फर्म के एक समझदारी कर्मचारी को, जो उनका हमदर्द था, सुदर्षन के पीछे लगा दिया था, चार दिनों से निरंतर वो सुदर्षन के बारे में षिवचरणबाबू को खबर दे रहा था। जिन नयी कुकर्मो की खबरें सुनकर षिवचरणबाबू की परेषानी बढ़ती जा रही थी।
 
‘‘इसकी हरकतें देखकर दिल करता है कि इसे ऐसी मार लगाउं जो जन्मभर इसके मस्तिष्क पर छायी रहे। परंतु उस पर हाथ उठाना नहीं चाहता, कोई अदृष्य-षक्ति उसकी पिटाई करने से मुझे रोकती है। वो बड़ा हो चुका है, अब युवा है, उस पर हाथ उठाना अब उचित नहीं लगता।’’
 
षिवचरणबाबू की यह बात सुनकर लक्ष्मीदेवी बोली, ‘‘कैसे उचित नहीं ? जब उसे अपने कुल की लाज की परवाह नहीं रही, तो उस नीच पर हाथ उठाने में हिचकिचाहट क्यों ? क्या वेा इतना भी नहीं सोच सकता कि वो जो कर्म कर रहा है, उनसे कुल की मान-मर्यादा पर धब्बा लग सकता है ? उस निर्लज्ज को कमरे में बेद करके ऐसी मार लगाओ कि वो इन कुकर्मो को ही नहीं, अपने आपको भी भूल जाए।’’
 
‘‘मैं इसे ठीक नहीं समझता। जवान बच्चा मार खाने के पष्चात संवरता नहीं बल्कि बिगड़ता है।’’
‘‘आप गलत सोचते हैं !’’
 
‘‘नहीं लक्ष्मी ! मैं ठीक कह रहा हंू। कल्पना करो कि मैं उसे बहुत मार लगाता हंू और वो उस मार के डर से बुरे कर्मो से तोबा कर लेता है। परंतु उसके बाद उसके अंतर्मन में हमारे प्रति विद्रोह की ज्वाला धधक उठेगी। बेषक मैंने उसे ठीक कारण से पीटा होगा, मगर उसका अंतर्मन तब भी चीख-चीख कर कहेगा कि वो, जो कुछ कहते हैं, गलत कहते हैं, अपना जोर दिखाकर उसे अपने जैसा बनाना चाहते हैं। और लक्ष्मी फिर वो मुझे बुरा समझेगा और अपने को अच्छा, अपने को ठीक, मुझे गलत ! ओर इसका परिणाम जानती हो लक्ष्मी ? दुबारा जब कभी मैं उसे टोकूंगा या उस पर हाथ उठाउंगा तो वो मुझे जवाब देगा, और तो और आवेष में आकर वो मुझे पर हाथ उठा देगा।’’
 
‘‘मैं आपके विचारों से सहमत नहीं। अगर मैं आपकी जगह होती तो उसे नंगा करके डंडे से मार लगाती और फिर उसी हालत में घर से निकाल देती ! कौनसा अपनी कमाई करता है !
 
लक्ष्मी देवी की बात सुनकर षिवचरणबाबू बोले, ‘‘तुम उसकी मां हो, लक्ष्मी ! तुम्हें ऐसा नहीं सोचना चाहिए।’’
 
‘‘उसकी मां बनने से पहले में इस कुल की बहू बनी थी। इस कुल की लाज, मेरी लाज है ! वो पुत्र क्या, जो मां की इज्जत लूटने से न हिचकिचाए ! मैं अपनी लाज़ सुरक्षित रखने के लिए, अपनी ममता का बलिदान कर सकती हंू।’’
 
‘‘मैं तुम्हारे विचारों की कद्र करता हंू, लक्ष्मी ! लेकिन कुल की लाज बचाने के लिए तुम जो करना चाहती हो उससे तो हमारा कल समाप्त हो जाएगा। सुदर्षन हमारा इकलौता पुत्र है। उसकों हम अगर घर से निकाल देंगे तो हमारा ये कुल सदा के लिए समाप्त हो जाएगा तब कुल-नयाक हम किसे बनाएंगें ? और तो और लक्ष्मी, दुनिया के लोग क्या कहेंगे ? दुनिया को तुम जानती ही हो ! हम पर, हमारे नाम पर ये थूकेंगे और कहेंगे ‘कैसे जालिम हैं ये मां-बाप, जिन्होंने अपने इकलौते पुत्र को घर से निकाल कर कुकर्मी बना दिया !’ तब काई उसके निकाले जाने के कारण को नहीं देखेगा, लक्ष्मी !’’
 
षिवचरणबाबू की यह बात सुनकर लक्ष्मी देवी चुप हो गई। गम्भीरावस्था में कुछ सोचने लगी। कुछ क्षण उपरांत दुःखीस्वर में बोली, ‘‘आप ठीक कह रहे हैं, पर उसे सही राह पर लाया कैसे जा सकता हैं ?’’
 
लक्ष्मीदेवी के इस प्रष्न पर षिवचरणबाबू को कुछ और सोचने पर मजबूर होना पड़ा। फिर बोले ‘‘अभी वो कुकर्मो की दुनियां का नया-नया निवासी बना है। इंसान को जब तक ठोकर नहीं लगती, उसे तब तक अक्ल नहीं आती। सुदर्षन को जब तक अपने अंतर्मन से इस बात की प्रेरणा नहीं मिलेगी कि ये कर्म, जो वह कर रहा है, बुरे हैं, तब तक वो सही राह पर नहीं आएगा, जीवन की वास्तविकता को नहीं पहचानेगा। अभी उसको मेरी दौलत का सहारा मिला हुआ है इसी कारण वो सोचता-समझता नही, अभी उसे पष्चाताप करने का मौका नहीं मिला। समय की इंतजार करो, वह समझ जाएगा।’’
 
लक्ष्मीदेवी कुछ न बोली, न जाने क्या सेाचती रही। रामपाल की आवाज ने उनकी तद्रा भंग की। वह उन्हें खाना खाने के लिए कह रहा था।
‘‘चलिए, खाना लग गया है।’’
‘‘चलो !’’
दोनों उठकर खाने के कमरे में आ गए।
 
लक्ष्मीदेवी काफी समझदार व पढी-लिखी औरत थी। षिवचरणबाबू प्रतिदिन रात को उनसे व्यापार के विषय में विचार-विमर्ष किया करते थे। खाने की समाप्ति के पष्चात इसी विषय पर दानों में बातचीत होने लगी फिर वो सो गए।