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खोखली नींव
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खोखली नींव (तेरह)
ISBN: 345

 दिनभर विजय एकांत में बैठे सोचता रहा। कल रात उसने अपने पिता के सम्मुख दुकान जाने के लिए ‘हां’ कर दी थी। आज वो उसी पर विचार करता रहा कि उसका दुकान जाना उचित होगा या नहीं। वो अपने पिता के सख्त व्यवहार से डर गया था। उसके मन में एक विचार बार-बार उठकर उसे भयभीत कर रहा था कि अगर उसने अपने पिता के कहे अनुसार कदम न उठाये, तो वो उसे घर से निकाल देंगे। इन्ही विचारों से विजय दिनभर घिरा रहा। आखिर उसने दुकान जाने का निष्चय किया। सोचा, व्यक्ति को परिस्थितियों के अनूकुल ही स्वयं को ढालना चाहिए। जैसी परिस्थितियां आएं, वैसे ही उसे कार्य करने चाहिएं। अगर उसने विद्रोह किया तो दुःख झेलने पड़ेंगें। और दुःखों को झेलना, वो भी बिना किसी मजबूरी, विजय न सीखा नहीं था।