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खोखली नींव
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खोखली नींव (पांच)
ISBN: 345

पैसे को जब समाज एकाधिकर दे देता हैं, तब मानव को चरित्र अधंकार को गर्तों में डूबता चला जाता है, वह पैसे के पीछे एययाषों के वाज़ार में अपना धर्म-ईमान बेच डालता है, उसमें एक बात घर कर जाती है ‘पैसा इकटठा करने के लिए अगर बुरे-से-बुरा कर्म भी करना पड़े तो भी हिचकिचाना नहीं चाहिए, क्योंकि पैसा दुनियां में सबसे बड़ी चीज़ है !’’

 

गुरजीत ने जैसे ही सुदर्षन को बताया कि एक व्यक्ति को पचास रूप्ये देने से अगले पेपर का अभी पता लग सकता है, तो वो खुषी से झूम उठा। पैसे का इंतजाम करने के लिए वो अपने कमरे से निकलकर अपनी मां लक्ष्मीदेवी के पास गया।

 

लक्ष्मीदेवी अपने कमरे में, कुर्सी पर बैठी, एक पत्रिका पढ़ रही थी।

 

‘‘मम्मी !’’

 

लक्ष्मीदेवी को उसने धीरे से पुकारा।

 

‘‘क्या है ?’’

 

पत्रिका में खोई-खोई वह बोली।

 

‘‘मुझे पचास रूप्ये चाहिएं !’’

 

‘‘पचास रूप्ये ! क्यों ?’’

 

चौंक कर प्रष्न किया उन्होंने।

 

‘‘जरूरत है !’’

 

‘‘ऐसी भी क्या जरूरत पड़ गई है ? अभी पिछले सप्ताह तो जेब-खर्च दिया था।’’

 

‘‘खर्च ने के लिए नहीं !’’

 

‘‘तो फिर ?’’

 

‘‘आप जानती ही हैं कि मैं गणित में कमजोर हंू।’’

 

भूमिका बाधी।

 

‘‘होषियार किसमें हो !’’

 

व्यंग्य-बाण छोड़ा लक्ष्मीदेवी ने मुस्कुराते हुए।

 

‘‘मेरा मतलब है, मुझे गणित बिल्कुल नहीं आता !’’

 

व्यंग्य समझ कर, बात आगे बढ़ाई।

 

‘‘अच्छा, फिर ?’’

 

‘‘बस, कल उसी का पेपर है !’’

 

भोली-वाणी-युक्त उतर।

 

‘‘समझी नहीं !’’

 

‘‘पेपर पता लग सकता है अभी !’’

 

‘‘कैसे ?’’

 

‘‘पचास रूप्ये रिष्वत देने से !’’

 

‘‘क्या ! किसे ?’’

 

‘‘एक अंजान आदमी को !’’,

 

‘‘धोखा हुआ तो ?’’

 

‘‘ऐसा कभी नहीं हुआ !’’

 

‘‘पर ये काम ठीक नहीं !’’

 

‘‘पर मम्मी मैं इसके बिना फेल हो जाउंगा।’’

 

रूआंसा स्वर निकाला मुख से सुदर्षन ने।

 

लक्ष्मीदेवी सोच में पड़ गई। कुछ क्षण पष्चात बोली ‘‘अच्छा, देती हंू !’’

 

अपना पर्स निकाल कर उन्होंने सुदर्षन को पचास रूप्ये थमा दिये। सुदर्षन पैसे लेकर अपने कमरे में आ गया।

 

‘‘हुआ काम ?’’

 

उसे देख, गुरजीत ने उत्सुकता से पूछा।

 

‘‘कैसे न होता !’’

 

मुस्कुराते हुए सुदर्षन ने कहा। हाथ में पकड़ें पचास रूप्ये गुरजीत की और बढ़ा दिये।

 

‘‘मैं आठ बजे तक आउंगा।’’

 

इतना कहकर गुरजीत चला गया। सुदर्षन ने पुस्तक खोली, प्रष्नों को हल करने कीे चेष्टा की, मगर दिल न लगा। कुर्सी से उठकर कमरे का दरवाजा बंद किया, पर्दे ठीक किए और पलंग पर लेट कर सिगरेट पीने लगा।

 

समय अपनी गति से आगे बढ़े जा रहा था।

 

आठ बजे में अधिक देर न लगी। सवा आठ बजे के करीब गुरजीत आ गयां सुदर्षन ने उसे देखते ही, व्यग्रता पे पूछा ‘‘फोन कब आएगा ?’’

 

‘‘दस बजे के बाद।’’

 

‘‘इतना समय कैसे कटेगा ?’’

 

‘‘थोड़ा घूम-फिर आते हैं !’’

 

‘‘छोड़ यार, कुछ पढ़ ही लेते हैं।’’

 

सुदर्षन का सुझाव गुरजीत को मानना पड़ा। दोनों ने गणित के प्रष्न हल करने षुरू कर दिये। अभी पंद्रह मिनट ही बीते थे कि अमित आ गया।

 

‘‘आओ अमित !’’

 

स्वागत-भाव से सुदर्षन बोला। गुरजीत सिर्फ मुस्कुरा दिया।

 

‘‘पेपर कैसा किया ?’’

 

‘‘बढिया !’’

 

अमित मुस्कुराया सुदर्षन का उतर सुनकर।

 

‘‘और तुमने गुरजीत ?’’

 

‘‘अच्छा ही हो गया।’’

 

‘‘अमित ! आज यहीं बैठकर पढ लो।’’

 

सुदर्षन का प्रस्ताव सुनकर अमित चौंका। बोला ‘‘क्यों ?’’

 

‘‘फोन आएगा !’’

 

अमित एकाएक कुछ न समझा। कुछ क्षण सोचने के उपरांत उसे फोन का चक्कर समझ हो आया। गत वर्ष के एक परीक्षार्थी ने उसे एक बार बताया था कि बोर्ड का कोई कर्मचारी कुछ साधनों के जरिए प्रष्न-पत्र गायब करके, कुछ पैसों के बदले, फोन पर सारा पेपर बता देता है। पैसा कमाने का कितना सुलभ और सात्विक धंधा अपनाते हैं आज के लोग ! बस थोड़े जोखिम एवं जान-पहचान की बात है !

 

‘‘ओह ! समझाा !’’

 

‘‘पेपर पता चल जाएगा।’’

 

अमित कुछ पल के लिए चुप हो गया, फिर बोला ‘‘ठीक है, सुदर्षन ! तुम उसी के अनुसार तैयारी कर लेना। और जहां तक मेरी बात है, मुझमें आत्मविष्वास की भावना काफी हट तक विद्यमान है।’’

 

‘‘जैसी तुम्हारी मर्जी ! पड़ौसी होने के नाते, मैंने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया।’’

 

‘‘पड़ौसी’ षब्द सुनकर अमित के ह्रदय में टीस उठी। पर दर्द दबा कर वो बोला ‘‘सुदर्षन ! मैं ऐसा कोई काम करना पसंद नहीं करता, जो मुझे मेरे आदर्षो की राह से हटा दे मेरी एक आदर्षवाद की नींव है। अगर मुझे उस नीेव की एक भी ईंट किसी काम में दिख जाती है, तो मैं उस काम को करना स्वीकार कर लेता हंू। जिस काम में तुम मुझे हिस्सेदार बनाना चाहते हो, वो मेरी राह की धूल भी नहीं है।’’

 

और इतना कहकर अमित चला आया। घर पहंुचा। कमरे में आकर अपनी डायरी निकाली और लिखने लगा ़ ़ ़ ़ ़ ़ ़

 

समझ में नहीं आता कि सुदर्षन कब, कैसे अपनी सही राह पर चलने लगेगा ? मुझे अचम्भा तो इस बात का है कि उसके मां-बाप को इतना भी ज्ञात नहीं कि उनका बेटा कुकर्मों की दुनिया का वासी है। वो तो बस इतना ही जानते हैं कि उसके एक ही पुत्र है। जो पढता है। पढाई में कमजोर है। उसे लायक बनाने के लिए हर माह की पहली तारीख को मुंहमांगी रकम जेब खर्च के रूप में देनी हे। कर्तव्यहीन, दुनियां के लोग बनते जा रहे हैं !

 

कभी वह जमाना भी था, जब मां-बाप अपना कर्तव्य समझ कर अपनी संतान को सुपथ दिखाते थे कुपथ की राह बताते ही न थे। उनकी बुद्धि में वह भर देते थे कि कुकर्म करना महापाप हैं, उन को करने से मनुष्य नरकवासी हो जाता है, उसे घोर कष्टों का सामना करना पड़ता है। मां-बाप के संस्कारों का भी बच्चों पर बड़ा असर पड़ता था। तब प्रत्येक घर में षुद्ध मन से ईष्वर भजन व व्रत-उपवास किये जाते थे। जिनसे पारिवारिक वातवरण स्वच्छ रहता था और बच्चों में खोखलापन नहीं आता था। वो बुरे कर्म करते वक्त डरते थे। सभी किषोर सुपथ पर चलकर अपना जीवन-यापन करते थे। इसी कारण उस काल में सात्विक-विचारों वालों की अधिकता थी। अध्यात्मवाद था। आध्यात्मिक-षिक्षा ‘सत्य’ के दर्षन कराने में सहायक थी।

 

आज जमाना बिल्कुल बदल चुका है। मां-बाप आधुनिक-युग की दूषित-हवा में सांस लेकर अपने कर्तव्य-पथ से बहकने लगे हैं। न वो बच्चों को सुपथ दिखाते हैं, न ही कुपथ। बच्चे का जीवन उसके स्वयं के हाथें में छोड़ दिया जाता है। इससे आधुनिक-वातावरण की छाप उस पर पड़ने लगती है और उसे खोखले संस्कारों को ग्रहण करने की प्रेरणा मिलती है घरों में न ईष्वर का जाप होता है और न ही और कुछ, होता भी है तो मात्र दिखावे के लिए और ऐसे यज्ञों का आजकल के किषोंरो पर कुछ असर नहीं पड़ता, क्योंकि वो दूषित विचारों को ग्रहण कर चुके होते हैं, क्योंकि वो अच्छे-बुरे में भेद नहीं पर पाते। उनके लिए अच्छी वस्तु वह है जिसका इस्तेमाल अधिक जन-समुदाय करता है। और आधुनिक जन-समुदाय किस प्रकार के कार्यों में तल्लीन है, इसका सभी को ज्ञान है। समाज में भ्रष्टाचार, हेराफेरी व कुकर्मों का बोलबाला है। लोग अपने सचे लक्ष्य, अपने परम-कर्तव्य को भूल कर गलत कार्यो में तल्लीन हैं। बच्चे भी तो उन्हीं का अनुकरण करेंगे। और कर भी किसका सकते हैं ? उन्हें अच्छी राह कौन दिखाये ? उन्हें तो बुरे कर्मो को रोकने के लिए प्रोत्साहन मिलता है, आज के समाज से !

 

अमित फिर पढ़ने लग गया। अमित उच्च कुल का था। उसका परिवार अपनी संस्कृति को नहीं भूला था। संस्कार सात्विक थे, इसीलिए अमित सात्विक कर्म करता था।

 

जो प्रष्न फोन पर बताये गए, वही आए। सुदर्षन-गुरजीत की खुषी का कोई ठिकाना न रहा। दोनों का पेपर अच्छा हुआ।

 

सुदर्षन घर लौटा। लक्ष्मी देवी ने पूछा ‘‘पेपर कैसा हुआ ?’’

 

‘‘बहुत बढ़िया !’’

 

फिर सुदर्षन आराम करने लगा। आगे दो छुटिटयां थीं। फोन का सहारा था। मन को षांति थी। सो चलचित्र देखने की सलाह बनाई। तैयार होकर बाहर निकला। लक्ष्मी देवी ने देखा, तो पूछा -----

 

‘‘कहां जा रहे हो ?’’

 

‘‘पिक्चर !’’

 

‘‘पागल तो नहीं हुए !’’ पढ़ाई करो।’’

 

‘‘दो छुटिटयां हैं !’’

 

‘‘तो क्या हुआ ? जानते हो, फेल हो गए तो नाक कट जाएगी !’’

 

‘‘फेल कैसे होउंगा ? कल रात फोन आएगा।’’

 

और सुदर्षन फिर तेजी से घर से निकल आया। उसके घर से छविग्रह लगभग डेढ़ किलामीटर दूर था। घर से चलकर सुदर्षन बस-स्टाप पर आन पहुंचा और खड़े होकर बस की इंतजार करने लगा। अभी ढ़ाई बजे थे। षो साढ़े तीन बजे षुरू होना था, मगर उसका दिल अभी से बेचैन था। समय अपनी रफतार से आगे बढ़ रहा था सुदर्षन को बस-स्टाप पर खड़े-खड़े पंद्रह मिनट बीत गए, मगर कोई भी बस न आई तभी उसकी निगाह एक खाली थ््राी-व्हिलर पर पड़ी। तेजी से बोला ‘‘स्कूटर !’’

 

उसकी आवाज पर स्कुटर के ब्रेक चरमराये और क्षण भर में उसे के घूमते पहिए रूक गए। स्कूटर-ड्ाईवर ने प्रष्नवाचक-मुद्रा में सुदर्षन की ओर देखा

 

‘‘बसंत तक चलोगे ?’’

 

‘‘चलिए।’’

 

उसकी स्वीकृति सुनकर सुदर्षन स्कूटर की पिछली सीट पर बैठ गया। ‘घर्र-घर्र’ की आवाज करते हुए स्कूटर आगे बढ़ले लगा और पांच मिनट में ‘बसंत’ क बाहर आ पहुंचा।

 

स्कूटर से उतर कर सुदर्षन ने जेब मंे से पर्स निकालकर बिल चुकाया और फिर एक गीत की पंक्ति गुनगुनाते हुआ छविगृह के बाड़े में आ गया। टिकटघर से टिकट खरीदकर सुदर्षन जलपान-गृह तक गया और वहां से एक सिगरेट लेकर एक कोने में आकर खड़ा हो गया।

 

समय तीन बजकर पांच मिनट हो गया था। षो षुरू होने में अभी पच्चीस मिनट की देरी थी। सुदर्षन अपनी आंखें सेंकने लगा।

 

‘हाय ! कितनी सुंदर है वो !’’ एक नवयुवती की ओर वासनामय दृष्टि से देखकर उसने, अपने होठों पर जीभ फेरते-हुए, यह बात मन में सोची।

 

आ-हा !’ परी लग रही है परी, इन कपड़ों में !’ एक आधुनिक-लिबास से लैस नवयौवना की ओर देखकर उसने यह सोचा और दांतों से अपने होठों को चबाने लगा।

 

‘काष ! मेरे साथ वाली सीट पर कोई नवयौवना बैठे !’ एक और विचार मन में उसके उपजा। इसे सोचकर उसे यूं लगा कि उसका दिल अपनी गति से तेज धड़कने लगा है।

 

यूं ही सुदर्षन सोचता रहा। षो का समय हुआ तो वो प्रवेष की ओर बढ़ आया।

 

कुछ देर पष्चात सुदर्षन हाल में अपनी सीट पर विराजमान हो चुका था। अभी पूरे हाल में उजाला था और संगीत की एक आधुनिक धुन पूरे वातावरण में गूंज रही थी। सुदर्षन के अगल-बगल की सीटें अभी खाली थी। वो हर पल, मन-ही-मन, भगवान से यही प्रार्थना किए जा रहा था कि कोई सुंदर युवती उसकी बगल वाली सीट पर बैठे ! आधुनिक कृष्ण को अनजान-गोपियांे का इंतजार था ! द्वापर में गोपियां कृष्ण के वियोग में तड़पती थी और आज का कृष्ण अपनी गोपियांे के वियोग में तड़प रहा था। भाग्य की विडंबना। सुदर्षन की दृष्टि हाल में प्रवेष करती लड़कियों पर टिकी थी। तभी उसने देखा कि दो अधड़े उम्र के व्यक्ति आकर उसके बाएं-बगल की सीटों पर बैठ गए। सुदर्षन को तनिक खेद हुआ। मगर अभ्ी भी आषा थी, क्योंकि अभी उसके दायें-बगल की सीटें खाली थी।

 

एकाएक वह मुस्कुरा उठा। उसने देखा, दो लड़कियां झुककर उन सीटों का नंबर देख रही हैं। पर अगले ही क्षण वो खीझ उठा। वो दोनों उससे ‘एक्सक्यूज मी’ कहकर आगे बढ़ गई और जा बैठी उन पुरूषों की बगल में।

 

पर ‘आषारानी’ को वो अभी भी न त्याग सका। क्योंकि उसके दायें-बगल की सीट अभी तक खाली थी और हाल में नारियों की संख्या अधिक नजर आ रही थी। आगे के कुछ पलों तक ‘आषारानी’ ने उसका साथ दिया, मगर फिर वो भी विष्वासघात कर गई। आषिक-कृष्ण को तब मन-मसोस कर रह जाना पड़ा, जब उसने देखा कि उसकी उम्र के ही दो लड़के आकर वहां बैठ गए।

 

एकाएक संगीत को स्वर षांत को गया। सम्पूर्ण-हाल में अंधेरा छा गया और अगले ही क्षण पर्दे पर ‘भारतीय-समाचार-चित्र’ दिखाया जाने लगा। तत्पष्चात मुख्य-फिलम षुरू हो गई।

 

फिल्म उददेष्यहीन थी। आधारहीन कहानी को संतुलित प्रगट करने के लिए नग्नता, मारधाड़ और कैबरे भरे हुए थे। घिसा-पिटा हास्य देखकर सुदर्षन अपनी दृष्टि पर्दे से हटा कर इधर-उधर धुमाने लगता। नग्नता देखकर उसे अपना बदन कसता हुआ महसूस होता, दांत स्चयं ही भिंच जाते और सिसकी निकल पड़ती !

 

मध्यांतर हुआ। सुदर्षन उठकर हाल से बाहर आ गया। पेषाव आदि से निवृत होने के पष्चात, जलपान-गृह में आ गया। उसने काफी का एक कप लिया और वही खड़ी लड़कियों के एक झुंड के करीब खड़ा हो पीने लगा। लड़कियों का आषिक काफी पीते हुए, आंखों से उन लड़कियों को निहार रहा था। कानों मे उनकी मधुर बातें सुनकर आनंिन्दत हो रहा था। वो हंसती, तो ये मुस्कुरा उठता ! अचानक एक लड़की से सुदर्षन की नजरें मिली। एकदम सकपका उठा और जल्दी से काफी खत्म कर हांल में आकर अपनी सीट पर बैठ गया। तभी फिल्म का षेष-भाग षुरू हो गया। वो उसे ही देखने लगा।

 

फिल्म समाप्त हुई। सभी अपनी सीटों से खड़े हो गये। सुदर्षन भी निकास-द्वार की ओर बढ़ आया। भीड़ के कारण सबके बदन एक दूसरे से लग रहे थे। सुदर्षन अपने बदन को अनजान-नारियों के बदन के साथ सटा रहा था। ऐसा करने से उसके मन को षांति मिल रही थी ! साथ ही उसे ‘भूख’ लग रही थी ! मगर वो किसी ‘रेस्तरां’ को न पा सकता था !

 

छविग्रह से निकल कर वो अभी थोड़ा दूर ही गया था कि उसे गुरजीत व सुरेंद्र मिल गए। उनके आग्रह करने पर वो उनके साथ रेस्तरां में चला आया। बातों-ही-बातों में साढे़ नौ बज गए। उनसे विदा लेकर सुदर्षन ने घर की राह ली।

 

घर में कदम रखते ही उसका सामना लक्ष्मी देवी से हुआ। उसे देखकर वो बोली ‘‘इतनी देर कहां लगा दी ?’’

 

‘‘पिक्चर देखकर गुरजीत के घर पढ़ने चला गया था !’’

 

मां को पुत्र पर षक न हुआ। सुदर्षन ने भीतर आकर खाना खाया और कमरे में आकर पलंग पर लेट गया। मस्तिष्क में फिल्म के गंदे-दृष्य तैर रहे थे। आंखें बंद कर वो उन्हीं को निहारने लगा। धीर-धीरे वो गहराई मंे उतरने लगा, यौवन की कैद की गहराई में।

 

रात के ठीक साढे़ ग्यारह बजे फोन की घंटी बजी। जो-जो प्रष्न बताये गये, उनको दोनों ने याद करना षरू कर दिया। जिनको याद न कर सके, उनके उन्होंने फर्रें तैयार कर लिये।

 

सुबह हुई। समय हुआ। परीक्षा देने के लिए अपनी सीटों पर बैठ गए। परीक्षक आए। आवष्यक निर्देष दिए गए और सुचक घंटी के बजते ही प्रत्येक परीक्षार्थी को एक-एक प्रष्न-पत्र थमा दिया गया। गुरजीत और सुदर्षन अलग-अलग कमरे में थें। दोनों ने ज्योंही प्रष्नों पर निगाह दौड़ाई कि उनकी सिटटी-पिटटी गुम हो गई। पेपर उनकी आषा के विपरीत आया था। रात फोन पर जो-जो प्रष्न बताये गए थे, उनमें से एक भी प्रष्न नहीं आया था।

 

आखिर सुदर्षन संभला और ‘फर्रे’ की सहायता से पेपर करने लगा। परीक्षक ने उसे ऐसा करते देखा, मगर कुछ नहीं कहा। बस मुस्करा कर रह गया। फिर क्या था ! सभी परीक्षार्थियों का साहस बढ गया और नकल के बाजार में तेजी आ गई। यह देखकर वो परीक्षक मुस्कुराते हुए बोला ‘‘देखो, भाई ! चुपचाप जो कुछ भी करना चाहते हो कर लो। अगर खुसर-पुसर करोगे तो सारा गुड-गोबर हो जाएगा। सुपरवाइज़्ार के आते ही संभल जाना। उन्होंने किसी को पकड़ लिया तो हमारा कोई जिम्मा नहीं !

 

‘‘बेफिक्र रहिए, सर ! हम काफी होषियार हैं !’’

 

सुदर्षन ने तेजी से यह कहा। सभी षंांति पूर्वक अपना पेपर पूरा करने में लग गए। जब करीब आधा समय बीतने को था तो सुपरवाइज़र साहब ने कमरे में प्रवेष किया। दोनों परीक्षक कमरे में चहलकदमी करने लगे। सभी परीक्षाथी। संभल गए। पर तब भी उन्हें परीक्षार्थीयों की स्थिति पर संदेह हुआ। मुस्कुराने लगे और बोले ‘‘बच्चों ! खाना उतना ही खाना चाहिए, जो पच जाए ! ज्यादा खाओगे तो बिस्तर नसीब होगा !’’

 

वो कमरे से बाहर निकल गए। कमरे में उपस्थित सभी मुस्कुरा पड़े। क्षण पष्चात अपने कार्य में लीन हो गए परीक्षार्थी पेपर पूरा करने में और दोनों परीक्षक बातों में !

 

अमित अपने कमरे में बैठा आराम कर रहा था। तभी सुदर्षन उसके पास आया। अमित ने उसके आने का प्रयोजन पूछा। सुदर्षन ने बताया कि वो उससे महत्वपूर्ण प्रष्नों की सूची लेने आया है। अमित ने उससे फोन के बारे में पूछा। सुदर्षन ने कहा कि आज का पेपर उसकी आषा के विपरीत आया था। फोन पर जो प्रष्न बताये गए थे, वो नहीं आए। इसलिए अब वो आषा की उस किरण का सहारा लेना मुनासिब न समझता था। अमित ने उसे सभी पहत्वपूर्ण प्रष्न बता दिये।

 

सुदर्षन की अब यही दिनचर्या बन गई थी। रोज अमित से महत्वपूर्ण प्रष्न पूछ लेता उनको याद करता। जो याद न होते उनके फर्रे तैयार कर लेता था। इसी तरह परीक्षाएं देता गया। कुछ बारह परीक्षाए होनी थी। पहली परीक्षा की भांति आज भी सुरेद्र ने चाकू खोला और नकल मार कर पेपर पूरा किया।

 

अमित उनकी यह सब हरकतें देखकर काफी खिन्न हा उठा था। वो सोच रहा था कि जब सभी नकल मार कर पेपर पूरा करते हैं तो फिर इन परीक्षाओं का क्या फायदा ? क्यों नहीं विद्याथर््िायों को यंू ही अगली कक्षा में चढा दिया जाता ? क्यों बेकार में तन-मन-धन का नाष किया जाता है। बड़े-बड़े षिक्षा अधिकारी परीक्षा-प्रणाली के दोषों से वाकिफ होते हुए भी, न जाने क्यों कोई ठोस कदम नहीं उठा रहे हैं ? न जाने उन्हें किस मजबूरी ने अपने पंजे में जकड़ रखा है ?

 

अमित के मस्तिष्क में अनेकों प्रष्न चक्कर काटते रहते, मगर वो उनका समाधान न ढूंढ पाता था। और अगर ढूंढ भी लेता, तो क्या हो जाता ? उसमें अभी इतनी ताकत नहीं थी कि वो षिक्षा-अधिकारियों की, षिक्षकों की तथा षिक्षार्थियों की नीतियों को बदल सकता। उसके सुख-दुःख की उसकी मानसिक-उलझनों की एक ही साथन थी डायरी ! अपने मानोभावों को वो उसके खाली पनों पर अंकित कर देता था और तभी उसको कुछ समाधान कुछ सीखें स्वयं मिल जाया करती थी ़ ़ ़ ़ ़ ़ ़़

 

3 अप्रैल

 

बडे-बजुर्गों को कहते सुनता हंू, पुस्तकों में पढने को मिला है कि कभी वह जमाना भी था, जब गुरू अपने षिष्य को प्रत्येक विषय में पारंगत कर देता था। गुरू-दक्षिणा के रूप में छात्र अपने गुरू से ग्रहण की हुई षिक्षा अन्य लोगों में भरता था। प्रत्येक सामाजिक-प्राणी तब ऐसे कार्य करता था जिससे उसको ही नही अपितु पूरे समाज को लाभ होता था। गुरूओं के प्रति विद्यार्थियों के दिलों में असीम प्रेम व श्रद्धा की भावना विद्यमान होती थी। गुरूओं को भी अपने षिष्यों से निःस्वार्थ मोह होता था। वो अपने षिष्य को प्रत्येक विषय में पारंगत करने के लिए जी-जान से प्रयत्न करते थे। वो अपने षिष्यों को आध्यात्मिक-मनोवैज्ञानिक तथा अन्य सब प्रकार की षिक्षाए देते थे। प्रत्येक विद्यार्थी आत्मज्ञानी होता था। आत्मज्ञान के बल से अपने आप को अपने जीवन के लक्ष्य को अपने जीवन के मूल कर्मों को पहचानता था।

 

पर आज समय बदल चुका है। स्वार्थपन की भावना दिन-प्रतिदिन सबके दिलों में घर करती जा रही हैः

 

स्वार्थपन के पनपने पर

 

मानव पथ अपने को

 

भूल गया।

 

चल दिया अजान पथ पर

 

भूल मानवता !