+91-11-41631787
खोखली नींव
Select any Chapter from
     
खोखली नींव (चौथी कड़ी)
ISBN: 345

र घड़ी में रहता है
किसी का इंतजार।
जग है, जीवन है,
जीवन में किसी का इंतजार !

इंतजार के क्षण कभी समाप्त नहीं होते। मानव-मस्तिश्क हर क्षण कल्पनाएं करता रहता है, अपने काल्पनिक-संसार को इस वास्तविक संसार में निर्मित करने के लिए प्रयत्न करता है, साथ ही क्षण उस घड़ी का इंतजार करता रहता है, जिस घड़ी उसे ‘सत्य’ का साकार-रूप के दर्शन होंगे। येू ही समय का चक्र निरंतर गतिशील रहता है, बचपन आता है, जवानी आती है मानव की काया पर बुढ़ापा भी छाता है, और एक दिन सारे अस्तित्व का भी नाश हो जाता है। इस लंबे काल में हमें सदा रहता है इंतजार, इच्छाओं-आकांक्षाओं की पूर्ति का !
   
    एक वर्ष से उन्हें जिसका इंतजार था जिसके स्वागत के लिए वो वर्ष भर बड़ी लग्न के साथ तैयारी करते रहे, वो घड़ी-परीक्षा का दिन आज आन पहूँचा। कर्मण्य आज बहुत उत्साहित थे। होते भी क्यों न ? कर्मण्य अपने गुणों की परीक्षा देना अपना प्रथम कर्मव्य समझता है उसके अर्थों में जीवन की प्रमुख घड़ी परीक्षा का दिन है उसी को पाकर उसे सुख मिलता है। एक अकर्मण्य व्यक्ति, एक भाग्यवादी परीक्षा को भूत-स्वरूप समझता है। जिससे दामन छुड़ाने के लिए वो जादू-मंत्र, टोने-टोटके प्रयोग में लाता है। चमत्कार अगर सफल हुआ, तो वे भी सफल हो जाता है।

आज सुबह नौ बजे केंद्रीय-उच्चतर-माध्यमिक-बोर्ड द्वारा आयोजित प्रथम-परीक्षा होनी थी। इस समय आठ बज रहे थे। सिर्फ एक घंटे की देरी थी। माॅडल-टाउन उच्चतर-माध्यमिक विद्यालय के बाहर भीड़ जमा होनी शुरू हो गई थी। बातचीत का बाजार काफी गर्म था। सभी परीक्षा के विषय में अपने विचार प्रकट कर रहे थे। सारा वातावरण एक अजीब किस्म के जोश से भरा हुआ था। कुछ परीक्षार्थी ऐसे भी थे जो दिल-ही-दिल डर महसूस कर रहे थे।

 

अमित वहां पहुंच चुका था और एक तरफ खड़े होकर अपने साथियों के संग वार्तालाप कर रहा था। सवा आठ बज के करीब उसने सुदर्शन को आते देखा। उसके साथ उसके दो साथी भी थे। तीनों सिगरेट पी रहे थे। सुदर्शन ने अमित को देखा। सिगरेट का कश् लेता हुआ उसकी और बढ़ आया। अमित को कुछ बुरा लगा। बोला ‘‘कम से कम आज तो इसे मुंह न लगाते !’’

अमित की बात सुनकर सुदर्शन हंसा और बोला, ‘‘अरे ! तुम्हें शयद मालूम नहीं कि इसका एक ही कश् लगाने से सुस्ती दूर भाग जाती है, चुस्ती बदन में में रहेगी तो पेपर बढ़िया होगा !’’

यह उस दिन वाले सुदर्शन के वाक्य नहीं थे। ‘भूत’ के नही ‘वर्तमान’ के सुदर्शन के वाक्य थे ! उसकी बात पर सभी हंस दिये। उसकी, स्वयं की, हंसी सबसे तेज़ थी।
‘‘तैयारी करके आए हो ?’’
-अमित ने प्रवाह बदला।
‘‘हर प्रकार की तैयारी है।’’
‘‘हर प्रकार की ! क्या मतलब ?
‘‘अरे यार ! ये भी नहीं समझे ? याद करने के साथ ‘‘फर्रे भी लेकर आया हूँ !’’
‘‘ओह् ! क्या फायदा होगा इनसे ?’’

‘‘अरे् ! अगर अपना याद किया कुछ न आया तो इनका सहारा मिलेगा। सभी लेकर आते हैं, तो हम क्यों न लाएं ? आजकल के अध्यापक जब कुछ नहीं करते तो फायदा क्यों न उठायें ?’’

‘‘स्वभाव की भिन्नता मानव-मन की विशेशता है। हर व्यक्ति का स्वभाव एक-जैसा नहीं होता। जिन्होंने तुम्हें इन वस्तुओं को प्रयोग में लाने के लिए प्रोत्साहन दिया है, मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि उनका अपना कोई लक्ष्य नहीं। वो स्वयं पथभ्रष्ट हैं, साथ ही तुमको भी अनुचित-पथ की ओर बढ़ा रहे हैं ! सुदर्शन। अभी भी कई सच्चे अध्यापक हैं जो तुम जैसे परीक्षार्थियों की एक नहीं चलने देते। अगर कोई कट्टरवादी आ गया तो पेपर कैसिंल कर देगा।’’

‘‘अरे्, भूल जाओ ! हम जैसों का, पेपर अगर किसी ने कैसिंल करने की चेष्टा की तो उस साले की मार-मार कर घर का रास्ता भूला देंगे।

अमित उसकी बात सुनकर चुप हो गया। उसने आगे कुछ कहना उचित न समझा। वह जानता था कि अब वो कुछ भी कहे उसका असर सुदर्शन पर रती भर नहीं पड़ेगा। साथ ही वो अपना मस्तिस्क अधिक बोझिल नहीं करना चाहता था।
समय का चक्र आगे बढ़े जा रहा था। साढ़े आठ बज चुके थे। परीक्षा-भवन का मुख्य-द्वार अभी तक बंद था। केन्द्रीय-बोर्ड के नियमानुसार परीक्षार्थियों को परीक्षा-भवन में परीक्षा शुरू होने से पंद्रह मिनिट पूर्व ही प्रवेश दिया जाना था।

मुख्य-द्वार पर स्कूल का चैकीदार खड़ा था। नजरें इधर-उधर घुमाते-घुमाते एकाएक वह चैंक गया। उसकी नजरें अपनी तरफ आने वाले एक व्यक्ति पर स्थिर होकर रह गई। आने वाला शहर का माना हुआ बदमाश गंगू था। वह अपने शिष्या सुरेंद्र को लिए रोबदार चाल चलता हुआ, सीधा उसके पास आया। चैकीदार इस समय काफी डर महसूस कर रहा था। कुछ क्षण तक गंगू चैकीदार की मुख-मुद्रा का अध्ययन करता रहा, फिर मुख पर कुटिल मुस्कराहट लिए, सुरेंद्र के कंधे पर हाथ रखकर बोला ‘‘ये मेरा छोटा भाई है। आज से इसके पर्चे शुरू हैं। सेंटर इसी जगह पड़ा है। इसका ख्याल रखना, वैसे मैं भी यहीं रहूँगा !’’और फिर गंगू चैकीदार के मन की प्रतिक्रिया को जाने बिना द्वार की बाईं ओर बढ़ गया। सुरेंद्र उसके साथ-साथ था।

पंद्रह मिनट पश्चात प्रवेश-द्वार खोल दिया गया। सभी परीक्षार्थी धड़ाधड़ भीतर जाने लगे। सुरेन्द्र जब जाने को उद्यत हुआ तो गंगू उससे बोला ‘‘सुन ! अगर मास्टर ज्यादा तिड़बिड़ करे तो बेझिझक चाकू खोल दियो। समय समाप्त होने पर मैं उन्हें दर्शन दे दूंगा !’’

    साथ ही गंगू बड़ी कुटिलता-पूर्ण हंसी हंसा। उससे कितनी अच्छी शिक्षा लेकर सुरेन्द्र ने विदा ली ! गंगू के वचन कितने दुर्लभ थे ! सभी परीक्षार्थियों पर अगर ऐसे महानुभव दया कर दें तो सबका बेड़ा पार लग जाए ! बिगड़ी बनाने वाला गंगू !

सुदर्शन, सुरेन्द्र और अमित का रोल नम्बर एक ही कमरे में आया था। सुदर्शन व सुरेन्द्र नज़दीक-नज़दीक थे और अमित उसने दूर बैठा था। नौ बजे में जब पांच मिनट की देरी रह गई तो कमरे में दो परीक्षकों ने प्रवेश किया। उन्होंने सबसे चुपचाप बैठ जाने की प्रार्थना की और आवश्यक-निर्देश देने के पश्चात उतर-पुस्तिकायें बांट दी। तभी प्रमुख-परीक्षक प्रश्न पत्रों का लिफाफा दे गया। प्रश्न-पत्रों को परीक्षक के हाथों में देखकर प्रत्येक परीक्षार्थी मन-ही-मन प्रार्थना करने लगा ‘‘प्रश्न कैसे आए होंगे ? हे भगवान ! आशानुकूल आएं !’’

    ‘‘कैसा है ? मिस्टर पाॅल !’’

    ‘‘बहुत सरल’’ मिस्टर गुप्ता को उत्तर देकर वो परीक्षार्थियों को सम्बोधित करते हुए बोले ‘‘अगर किसी के पास कोई गलत चीज़ हो तो वो अब भी निकाल कर बाहर रख सकता है। अगर कोई बाद में पकड़ा गया तो माफ नहीं किया जाएगा।’’

    सभी ने सुना, मगर चुपचाप बैठे रहे। हां, सुदर्शन-सुरेन्द्र एक-दूसरे को देखकर मुस्कराये जरूर।

    पेपर शुरू हो गया। सुदर्शन को उसका काफी अंश कण्ठस्थ था। वो निरंतर लिखता जा रहा था। उधर सुरेन्द्र की बेचैनी पल-प्रतिपल पश्चात बढ़ती जा रही थी। उसको कुछ भी नहीं आता था। जी कड़ा करके उसने अपना पहला ‘हथियार’ निकाला। किसी को कुछ न पता लगा। इन कायों में वो पूरा माहिर था। तेजी से वो उस फर्रे की नकल उतर-पुस्तिका पर उतारने लगा। बहुत ही जल्द, करीब पंद्रह मिनट में, उसने नकल पूरी कर ली और फिर उस कागज को निगल गया।

वाह रे ! फर्रों के उस्ताद !

    दो घंटे बीत चुके थे। सुदर्शन को जितना कुछ आता था, कर चुका था। उसके दो प्रश्न शेष थे। गर्दन घुमा कर उसने अमित की ओर देखा अमित अपना पेपर पूरा करने में तल्लीन था। दृश्टि सुरेन्द्र पर टिकी, तो मुस्करा उठा उसे बड़ी होशियारी से नकल मारते देखकर।

    सुरेन्द्र !’’
    मौका मिलते ही वो फुसफुसाया।
    सुरेन्द्र ने प्रश्नवाचक-मुद्रा में उसकी ओर देखा।
‘‘कौन सा ?
    सुदर्शन ने इशारे से पूछा।
    प्रत्युतर में सुरेन्द्र ने चार अगुलियां दिखाई।
दो क्षण रूककर सुदर्शन फिर फुसफुसाया
    ‘‘करके मुझे दे देना’’
    सुरेन्द्र ने गर्दन हिलाकर ‘हां’ कर दी।

    उसी क्षण मिस्टर पाॅल को सुरेन्द्र पर संदेह हुआ। समाधान के लिए वो उसके पास आए। सुरेन्द्र की अंगुलियों ने फुर्ती से अपना कमाल दिखाया। कागज खिसक कर उतर-पुस्तिका के पन्नों में छुप गया। मगर मिस्टर पाॅल पूरे घाघ थे। उन्होंने उतर-पुस्तिका उठा ली और फर्रे को बाहर निकाल लिया।

‘‘ये क्या है ?’’

‘‘फर्रा !’’ मुस्कुराते हुए सुरेन्द्र ने उतर दिया और साथ ही अपना दांया हाथ जेब में डाल लिया। सभी परीक्षार्थियों का ध्यान बंट गया। खुसर-फुसर आरम्भ हो गई।

‘‘कृपया सब शांति से अपना कार्य करें !’’

मिस्टर गुप्ता ने शेष परीक्षार्थियों से प्रार्थना की और स्वयं सुरेन्द्र के पास आ खड़े हुए।
‘‘जेब से हाथ बाहर निकालो।’’
उसे जेब में हाथ डाले देखकर मिस्टर पाॅल ने कहा।,
सुरेन्द्र ने ज्योंही जेब से हाथ निकाला, कमरे में ‘टिक’ की आवाज गूंजी। सबने चौंक कर नजरें उठाई।
अरे !
ये क्या ?
सुरेन्द्र के हाथ में लम्बे फल वाला चाकू था। और वो बड़े भयानक अंदाज में उसे दोनों परीक्षकों के सम्मुख लहरा रहा था।
‘‘बोलो अब !’’
गुर्राहट निकली सुरेन्द्र के मुख से। दोनों परीक्षक कांपने लगे। कुछ न बोले।
‘‘नकल मारूं या !’’

जानकर सुरेन्द्र ने अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया।

    ‘‘मार लो भाई ! हम कुछ नहीं कहेंगे !’’ मिस्टर गुप्ता कांपती हुई वाणी से बोले। ‘‘तो दोनों उस कोने में चुपचाप खड़ हो जाओ।’’

    उसकी आज्ञा का उन्होंने पालन किया। सुरेन्द्र फिर बड़ी तेजी के साथ, चैकन्ना होकर, शेष पर्चा पूरा करने लगा। कमरे में बैठे अन्य परीक्षार्थियों ने, जिन्हें अपने पर कम विश्वास था ने भी स्थिति का लाभ उठाया ! अमित खिन्न हो उठा। पर वो क्या कर सकता था ? शांति पूर्वक अपना पेपर पूरा करने लगा।