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नई सुबह
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नई सुबह Voice and Text
     
नई सुबह से पहले (तेरह)
ISBN: 81-901611-13

माँ निर्मला की नींद बाहर रसोईघर में जली बत्ती देखकर खुल गई। उसे एकाएक लगा भोर हो गई है। उठकर कमरे से बाहर आ गई। दीवार पर टंगी घड़ी देखी तो पाया अभी रात के दो बज रहे हैं। रसोईघर में झांका तो देखा वीणा को। परे’शान-सी खड़ी गैस पर पानी गरम कर रही थी। इतनी रात गए वीणा को पानी गरम करने की क्या सूझी ? वह रसोईघर में चली आई। वीणा ने माँ को देखा और चौंकते हुए बोली, ‘‘अरे, माँ आप कैसे उठ गईं?’’

‘‘मेरी तो बर्तन की आवाज़ से नींद खुल गई। लगा सुबह हो गई। तुम इतनी रात को यह पानी गरम क्यों कर रही हो?’’ - पूछा माँ ने। उत्तर के रूप में पाया वीणा की हड़बड़ाहट को। दबे स्वर में वीणा ने कहा, ‘‘देव को गर्म पानी की बोतल दे रही हूँ। उन्हें जरा-सा दर्द हो रहा है।’’

‘‘दर्द! कैसा दर्द? क्या हुआ उन्हें?’’ - माँ थोड़ा घबरा गई। ‘‘कुछ नहीं माँ, कमर में दर्द हो रहा है। बस, आप सो जाओ। चिन्ता न करो। अभी ठीक हो जाएँगे।’’ - वीणा ने बात को इतना कह गैस बन्द कर दी। माँ ने आगे बढ़कर उसकी सहायता की रबड़ की बोतल में पानी डालने की।

वीणा चाह रही थी, माँ उनके कमरे में न जाए। लेकिन रोकती कैसे वह तो उससे पहले ही कमरे में जा पहुँची। देव ने उन्हें नहीं देखा। वह औंधे मुँह पलंग पर लेटा हुआ था। हाथ उसका अपनी कमर से नीचे कुल्हे पर था। दर्द में तड़प रहा था वह। कुछ समझ न आया उन्हें। वहीं खड़ी रही कुछ पल। वीणा भीतर आई तो इशारे से उसने माँ को बाहर जाने को कह दिया। माँ निर्मला को भी उसका इशारा उचित लगा। वह चुपचाप बाहर चली आई। नींद उसकी आँखों से दूर भाग गई थी। कान उसके देव के कमरे की ओर लगे थे। परेशानी बढ़ती जा रही थी। देव के कराहने की आवाज़ आ रही थी। ‘‘ये क्या हो गया है, देव जी को! न जाने क्यों दर्द हो रहा है।’’ - माँ निर्मला ने अपने पति को धीरे से हिलाते हुए कहा। पन्नालाल की आँख खुल गई। उठकर बैठते हुए वह बोले - ‘‘क्या हुआ? क्यों नींद नहीं आ रही?’’

‘‘न जाने क्या हुआ है, देव जी को बहुत दर्द हो रहा है। आवाज़ सुनी तो नींद खुल गई। इतनी रात को उनके कमरे में भी गई लेकिन वीणा ने बाहर जाने को कह दिया।’’ - निर्मला ने मन में आई शंका को बताया।

‘‘तबीयत खराब हो गई होगी। ज्यादा देर बैठने से दर्द हो जाता है। अब सोने की को’शिश करो। सुबह पूछ लेना।’’ – यह कहकर पन्नालाल तो दूसरी ओर मुँह करके फिर सो गए।

लेकिन माँ निर्मला की आँखों से नींद दूर भाग गई थी। साथ के कमरे में उनकी बेटी जाग रही है। परे’शान है। वह कैसे सो सकती है ? इसी उधेड़बुन में सवेरा हो गया। देखा उन्होंने वीणा फिर पानी का पतीला गर्म करके कमरे में ले जो रही है। इस बार बोतल में नहीं पूरा पतीला कमरे में जाता देखकर वह फिर बेचैन हो गई। हो न हो देव की तबीयत बहुत खराब है।

हिम्मत जुटाई और धीमे से उठकर वीणा के कमरे के दरवाजे पर उन्होंने दस्तक दी। क्षणभर पश्चात ही वीणा ने दरवाजा खोला। माँ को देखकर बोली, ‘‘अरे, आपको लगता है नींद नहीं आई ?’’

‘‘तुम इतनी देर से जाग रही हो। देव जी परे’शान हैं। ऐसे में मुझे नींद कैसे आती?’’ - माँ ने अपनी परेशानी वीणा से कही - ‘‘अब दर्द कैसा है?’’

‘‘आराम है।’’ - कहा वीणा ने - ‘‘अभी बाथरूम गए हैं।’’

‘‘एक बात पूछूँ, वीणा! बाथरूम में पानी का गीज़र लगा है।

फिर भी तुम रसोई से पानी गरम करके देती हो सुबह-सवेरे। ऐसी कैसी आदत है देव जी की?’’ - माँ के चेहरे पर कौतूहल था।

यह जिज्ञासा ’शांत करना चाहती थी वह। पहले ऐसा देहरादून में भी उन्होंने देखा था। वहाँ तो गीज़र नहीं लगा था, लेकिन यहाँ तो लगा है। फिर भी पानी रसोई से क्यों? अभी और भी पूछना चाह रही थी, फिर बोली - ‘‘बाथरूम में भी एक घंटा लग जाता है। बहुत देर तक क्या करते हैं ?’’

अब क्या बताए माँ को। छोटी-सी बात और उस बात का खुलासा करना नहीं चाहती वह। माँ से जीवन में पहली बार उसने कुछ छिपाया था। आज तक ऐसा कुछ घटा भी तो नहीं था उसके जीवन में जो छिपाने की जरूरत पड़ती उसे। माँ का प्रेम, माँ को सामने देखकर चाहती थी वह अपना जी हल्का करना। लेकिन दबा रही थी अपने मन की इच्छा। उसी भाव से बोली, ‘‘अपनी-अपनी आदत होती है, माँ! देव को सफाई की चिन्ता रहती है। गीज़र का पानी टंकी से आता है और रसोई में पानी सीधा नलके से।

शुरू से वहम है उन्हें। उसी पानी से नहाते हैं।’’ उत्तर अटपटा था। माँ सन्तुष्ट नहीं हुई। बोली, ‘‘अजीब बात है बेटा, ऐसा तो नहीं देखा कभी। एक पतीले पानी से वह एक घंटे तक कैसे नहाते है।’’ माँ सन्तुष्ट नहीं थी। वीणा को कुछ उत्तर भी नहीं सूझ रहा था। बात बदलते हुए बोली - ‘‘चलो माँ, छोड़ो यह सब। आओ, छत पर टहलते हैं।’’ वे दोनों छत पर आ गईं। घर के साथ ही पीपल का पेड़ था।

बहुत बड़ा, बहुत पुराना। लगभग तीस फुट ऊँचा। ’शीतल वातावरण में उसकी हवा में और अधिक ’शीतलता थी। वीणा जब भी सुबह-सवेरे थोड़ा बोझिल महसूस करती वहीं आकर बैठ जाती थी। सीढ़ी के किनारे और पीपल के वृक्ष की टहनियों को देखती रहती।

माँ साथ थी, लेकिन वह चुप थी। माँ को लगा आज जैसे वीणा एकाएक बदली सी लग रही है। जो खुशी पहले देखी थी उसके चेहरे पर, वहाँ गम्भीरता विद्यमान थी। वीणा का चेहरा आज उसे बुझा दिखाई दे रहा था। शायद माँ का प्यार था जो उसे सब बदला दिख रहा था।

....

गीता में श्री कृष्ण ने कहा है - ‘‘जन्म से कुछ नहीं होता। गुण से गुणों का जन्म होता है। जन्म से कर्म का रूप बनता है, परिस्थितियाँ नए-नए कर्म रचती हैं और स्वभाव के मिश्रण से, ज्ञान के भाव से मानव कर्म अपनाता है।

ऐसे में जन्म से नहीं निर्धारित होता वर्ण। वर्ण स्वभाव के अनुरूप होता है, वर्ण परिस्थिति के अनुरूप होता है। वर्ण हर प्राणी में, हर भाव में, हर दम, बदल सकता है। ज्ञान से, संस्कार से, परिस्थिति से, नित नए नवीन कर्म से, प्राणी का नियत कर्म निर्धारित होता है। समाज की संरचना में भी सभी वर्ण प्रधान, ज्ञानी जन का ज्ञान, क्षत्रिय का बल, वै’श्य का व्यापार कर्म और शूद्र का सेवा-धर्म महान है।’’

इन चार भावों की संरचना से बनता है समाज। यही चारों भाव हर परिवार में भी विद्यमान होते हैं। घर का हर सदस्य किसी न किसी भाव, किसी न किसी कर्म का प्रतीक होता है। सभी अपना-अपना योगदान देते हैं हर घर में। लेकिन एक प्राणी ऐसा भी होता है, जो इन चारों भावों को अपने में समेटे होता है। वह रूप है माँ का। हर माँ का रूप चतुर्भुजी होता है। माँ के रूप में हर नारी अपने बच्चे के लिए ब्राह्मण बन ज्ञान संचारित करती है। माँ के रूप में हर नारी क्षत्रिय बन अपने बच्चे की रक्षा करती है। माँ के रूप में हर नारी वै’श्य बन परिवार का सुचारू रूप से संचालन करती है। माँ ही के रूप में नारी ’शूद्र भाव से अपने बच्चों की सेवा करती है। परिवार तभी पूर्णता पाता है जब माँ अपने परिवार के उत्थान के लिए चारों भावों से युक्त हो उसकी मंगलकामना करती है। ऐसी माँ हर किसी को अपने घर में मिल जाएगी। यह माँ ज्ञान का पुंज है और वही ज्ञान का पुंज विद्यमान था माँ निर्मला में।

एकान्त में वीणा को निहारती हुई माँ पढ़ रही थी वीणा के हृदय में बसी तरंगों को। उसे उसके भीतर एक गहरी चुप्पी छाई दिख रही थी। उन्हीं भावों में विचरती बोली - ‘‘बेटी, न जाने क्यों मुझे लग रहा है कि तुम जो बाहर से बहुत खु’श दिखती हो मुझे, भीतर-ही-भीतर कहीं कुछ सोचती हो हर दम! भीतर-ही-भीतर कई सारे भाव विचरते हैं तुम्हारे मन में। ऐसा लगता है तुम मुझसे कुछ छिपाना चाह रही हो।’’

माँ की उसके हृदय में बसे भावों को पढ़ पाने की क्षमता को देखकर वीणा ने अपनी दृष्टि उठा कर माँ को देखा। पलभर में ही उसने अपनी दृष्टि हटा ली उसके चेहरे से। माँ से कुछ भी छिपा पाना मुश्किल लगा उसे। उसे लगा यह वही माँ है जिससे वह बचपन से लेकर शादी तक अपने मन की हर बात कह देती थी। यह वही माँ है, जिससे उसे मन में बसी किसी भी ’शंका का समाधान मिल जाता था। यह वही माँ है जो उसकी हर चाह को बड़े प्रेम से थाह देती रही है। वीणा उससे कुछ छिपा न पाई।

एकाएक आँसुओं की अविरल धारा बह निकली। वह गोदी में सिर रखकर फफकने लगी।

......

माँ निर्मला के कानों को वि’श्वास नहीं हो रहा था। ये क्या कहे जा रही है वीणा! देव जो कितना सुन्दर, कितना सौम्य - यह कैसा भाव है उसका! कैसा जीवन जी रहा है! अधूरापन देव का जो कितना भयग्रस्त किए है उसकी बेटी को! मन हल्का हुआ तो सोचने लगी, अपनी बेटी के बारे में। कितना विशाल है वीणा का हृदय! सब जानकर भी कैसे अपना लिया है उसने देव को ?

सब जान कर भी वह उसके परिवार से गिला नहीं रखती। कितनी खुश रहती है वह! ‘‘माँ, एक ही बात मन में आई। ’शायद यह मेरे भाग्य में लिखा था। मैंने देव के गुणों को अपना लिया। मैंने उसके गुणों में जीना सीख लिया। मैं उसके दोष को देख नहीं पाई। यह संस्कार मुझे डैडी से मिले। बचपन से ही सुनती थी, श्री कृष्ण की वाणी को।

बचपन से सुनती थी गीता भाव को कि गुणवानों के गुणों को देखो। गुण में दोष कभी न ढूँढ़ो। मेरे भाग्य में देव का आना लिखा था। मैंने अपना सब कुछ उसे समर्पित कर दिया है। अब मेरे जीवन का ध्येय है देव की मंगलकामना। सब ठीक चल रहा है, माँ।’’

- कुछ पल चुप रही वीणा, फिर बोली, ‘‘मैंने सोचा था और स्वयं से वायदा किया था कि किसी को यह बात न कहूँगी। लेकिन मैं रह नहीं पायी। आपसे कुछ छिपा नहीं पाई। पिछले हफ्ते अमित से भी कह बैठी अपने दिल का हाल। मम्मी, बस आपसे मेरी विनती है कि इस विषय में आप कभी भी देव या उसके परिवार वालों से कोई जिक्र न करना। मैं खु’श हूँ और यही सोचती हूँ कि ऐसे ही मेरी खुशी बनी रहेगी। अभी तक सब ठीक चल रहा है और आगे भी ठीक रहेगा।’’ - वीणा के भाव विनती भरे थे।

‘‘मन तो बुझ गया है मेरा, बेटी! कैसे अपने मन में यह बोझा छिपाए रह सकती हूँ?’’ - तब माँ ने कहा।

‘‘लेकिन यह बोझ मेरे विवाहित जीवन की मंगलकामना से बड़ा तो नहीं। जो हो चुका उसका अब क्या रोना, माँ! जो हो रहा है, मैं उसी से खुश हूँ। यही सोचकर मेरा मन शांत हो गया है कि ये सब यदि शादी के बाद होता तब हम क्या करते ?’’

- वीणा ने माँ को तसल्ली देनी चाही।

‘‘तब यही सोचते कि भाग्य में लिखा था।’’ - माँ वीणा के भावों को ही व्यक्त कर बैठी।

‘‘तो यही बात है, यह मेरे भाग्य में ही लिखा था। मुझे तो जो कुछ भी पता चला है, शादी के बाद ही पता चला है। और मैं इसमें किसी पर दोष मढ़ कर भी शांति नहीं पाऊँगी। हाँ, कुछ करती तो ’शादी की पहली रात को ही करती। तब भी बहुत सोचा था, लेकिन फिर यही अपने भाग्य की देन मान कर सहर्ष अपना लिया। अब मैं देव को अपना दूसरा रूप मानने लगी हूँ। वह बहुत कष्ट पा चुका है। मैं अब उसके कष्टों को कम करना चाहती हूँ। उसकी भावनाओं की थाह लिए रहना चाहती हूँ। अब उसके कष्ट बढ़ाना मेरे बस की बात नहीं।’’

- वीणा के मन से बहुत बड़ा बोझ हट गया था। एकाएक उसे अपने मन से डर भाग गया लगता था। माँ से कहकर वह बहुत हल्का महसूस कर रही थी स्वयं को और देव जैसे अपने और करीब आया लग रहा था। जैसे आज उसे लगा था कि देव के हर भाव को वह ही नहीं सब जानते हैं।

माँ निर्मला चुप रही वीणा की बात सुनकर। गुमसुम-सी बैठी रही। वीणा कुछ देर माँ को देखती रही फिर बोली, ‘‘माँ अब तुम कुछ मत सोचो। चिन्ता मत करो। तुम्हारी बेटी खुश है और इसी में तुम्हारी खुशी है। देव को अपना समझती रही हो अब तक, उसे अपना ही बेटा मान लो। अपना मान लोगी तो तुम्हें स्वयं लगेगा कि जो कुछ भी हुआ है, किसी अच्छे के लिए हुआ है। ऐसे में किसी के साथ तुम्हें गिला नहीं रहेगा।’’

माँ निर्मला का हृदय वि’शाल था, लेकिन इतना भी वि’शाल नहीं था ’शायद कि वीणा के भावों को झट से अपना लेती। ये क्या हुआ उसके साथ? इतना बड़ा धोखा! धोखे में जल्दी-जल्दी बात को घुमा-फिरा कर अखबार के विज्ञापन में व्यक्त करके स्वयं को सांत्वना दे दी। यही सोचकर अपने कर्तव्य से विमुक्ति पा ली कि जैसे बेटी वाले हैं, बोझ है बेटी उन पर, बस लड़के की उपलब्धियों को देखकर ही सब आँखें मूँद लेंगे! ऐसा क्यों कर सोच लिया देव के परिवार वालों ने? क्या वीणा में कुछ कमी दिखी थी, जिसे वह ढ़क गए? अपनी वीणा तो सर्वगुण सम्पन्न है। सबसे निराली। घर भर की चिन्ता करने वाली। अपनी इस बेटी पर तो माँ को सदा से गर्व रहा है। ऐसे में यह सब कैसे हो गया?

बेटी को देखा माँ ने। वह उसकी गोद में सिर रखे, आँखें मूँदे थी। वह तो सन्तुष्ट है। उसकी सोच सबसे निराली है। उसने देव को अपने जीवन-साथी के रूप में सहर्ष स्वीकार कर लिया है। ये भाव कैसे हैं ? अपनी सभी इच्छाओं, अपनी सभी आकांक्षाओं को समर्पित कर दिया उसने कितनी सहजता से देव की परिस्थितियों पर! उसके मन की माप सम्भव नहीं। यह कैसा बन्धन है? यह बन्धन माँ निर्मला को तो जंज़ीर लग रहा था। जैसे उनकी बेटी इन जंज़ीरों में बंध गई है। चाह कर भी उनसे छूटना नहीं चाहती। यह समर्पण भाव है, या फिर हालात के सहारे स्वयं को छोड़ देने का कायर भाव? स्वयं से प्रश्न करती निर्मला अपनी बेटी से बोली, ‘‘तुम स्वयं को इस भंवर में फंसा तो नहीं पा रही? हम तुम्हारे साथ हैं, बेटी! तुम हमारे साथ देहरादून चलो। बैठ कर कुछ निर्णय करेंगे। ऐसा कैसे हो सकता है ? इतनी बड़ी बात पर पर्दा और उस पर तुम्हारा चुपचाप सब स्वीकार कर लेना! मुझे तो लग रहा है जैसे अभी भी तुम और किसी बात पर पर्दा डाल रही हो।’’

वीणा उठ कर बैठ गई, माँ की बात सुनकर। बोली, ‘‘यह कैसी बात कर रही हो, माँ? मैं न कहती तो कैसे पता लगता आपको ? जो है, वह कह दिया। मेरा मन हल्का हो गया। और माँ, इससे आगे न मैंने कभी सोचा है और न सोच सकती हूँ। आपको ऐसा क्यों लगा कि मैं जैसे यहाँ किसी दबाब में जी रही हूँ ? मुझे तो सब ठीक लग रहा है। मैंने तो आपको एक बीती कहानी सुना दी। वह कहानी मेरी देखी हुई नहीं है, लेकिन वह कहानी मुझे अपनी लगती है। देव कोई अभी आकर मिल गया नहीं लगता। देव का साथ मुझे पिछले जन्मों का सम्बन्ध लगता है। देव का साथ पाकर मैं दुःख नहीं पा रही। कोई कष्ट नहीं भोग रही। वह मुझे अपना जीवन लग रहा है और उसके हर रूप में स्वयं को उपस्थित पाकर लग रहा है यह साथ मेरे जीवन का उद्दे’श्य है।

अपनी इच्छाएँ मुझे देव की साथी बनकर पूरी होती लग रही हैं।’’

- वह भावनाओं में बह कर बोली, ‘‘तुम्हें मेरी कसम माँ, इस बात को बिसरा दो। भूल जाओ कि मैंने आपको कुछ कहा है।’’

और माँ क्या कहती ? देखती रह गई वीणा को। दूसरे के भावों में जी रही वीणा का यह रूप उसे मोहित किए जा रहा था। उन्हें लगा जैसे यह वीणा तो बहुत ऊपर है सबसे। यह विरक्ति भाव, अपनी भावानाओं से ऊपर उठकर जीने की तमन्ना एक साधारण-मानव में नहीं हो सकती। वह जैसे यह जीवन अपने देव के लिए ही जीना चाहती है। अपनी हर इच्छा अपनी हर चाहना जैसे देव की हर भावना के अनुरूप बनाना चाहती है। यह प्रेम भाव जैसे जन्म-जन्मान्तर के रि’श्तों का प्रतीक है। ऐसे में उसे लगा कि वीणा को जिस बात में खु’शी मिल रही है उसी भाव में उसे प्रसन्न रहना चाहिए।

तब प्रेम से निर्मला ने वीणा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘तुम तो मुझसे अधिक सहनशील हो, मुझसे कई गुना समझदार। मुझे गर्व है तुम पर जो पीछे नहीं देख रही, बस आगे अच्छा देखने की तमन्ना है। तुम चिन्ता न करो, देव के हर भाव में तुम मुझे अपने साथ पाओगी।’’ - फिर कुछ रुक कर बोली, ‘‘मैं अपने तरीके से तुम्हारे डैडी जी से बात कर लूँगी। तुम अब किसी से कुछ न कहना।’’

- वीणा माँ के शब्द सुनकर उसके चेहरे को अपने हाथों में लेकर प्यार करने लगी। उसे अपनी माँ दुनियाँ की सबसे अच्छी माँ लगने लगी थी। जी हल्का हुआ दोनों का तब वे नीचे आ गईं। देव तब तक नहा कर ड्राईंग-रूम में बैठा था। पास में पन्नालाल भी बैठे थे और दोनों के बीच अखबार की किसी खबर को लेकर बात हो रही थी।

....

आँसुओं की अविरल धारा बह निकली पन्नालाल की आँखों से। उन्हें जैसे वि’श्वास ही न हो रहा था निर्मला के ’शब्दों में। यह क्या कह रही है निर्मला! कैसे हुआ ये सब ? स्वयं को दोषी खड़ा पा रहे थे वह। क्यों वह दोषी नहीं ? बेटी की ’शादी हो जाए जल्दी से। हाथ पीले करके विदा कर दें जल्दी से। बोझ थी क्या वह जो बिना जाँच-पड़ताल किए हाँकह दी ? बिन सोचे-समझे कैसे सब जल्दी से हो गया ?

अखबार का विज्ञापन भी नहीं पढ़ा था उन्होंने। पढ़ते तो शायद डिक्शनरी ही खोल लेते। क्यों लिखा था वैसा, यह जिज्ञासा तो शांत कर लेते। बेटी ने जो कहा, उसी को मान गए। और ’शेष सब ई’श्वर पर छोड़ दिया। देव को देखा था, हर रूप उसका उन्हें अपनी बेटी के अनुरूप लगा। ऐसे में जब सब-कुछ हो गया वह अच्छे के लिए ही सोच कर हुआ। ऐसे में अभी तक सब ठीक है, फिर काहे का रोना। जो नहीं हुआ उसकी कल्पना में तस्वीर खींचना और उसके लिए ’शोर मचाना, यह सब उचित नहीं। ऐसे ही भावों को लिए उन्होंने स्वयं को सांत्वना दी और निर्मला से बोले - ‘‘अब जो हो चुका, उस परु नहीं सोचो। अब जो जैसा है, ठीक है। जैसा मेरी बेटी के भाग्य में लिखा था, जैसा उसके भाग्य में लिखा होगा, वही होगा। अभी तक वह खु’श है। अच्छा परिवार है। अच्छे लोग हैं। बेटी जो चाह रही है, वैसा ही हमें करना चाहिए।’’ इतनी बात कहकर उन्होंने निर्मला को ढाढ़स बंधाया।

पन्नालाल के समभाव को देखकर निर्मला को लगा जैसे वीणा अपने पिता की सोच के अनुरूप ही है। पन्नालाल के ज्ञान की बातें, उसके संस्कार जैसे वीणा के रूप में उजागर थे। कितनी सहजता से उन्होंने अपनी पुत्री के भावों को अपना लिया था। कभी-कभी हम अपनी सोच अपने तक ही रखना चाहते हैं, दूसरे की सोच में हमें ’शायद अपने भाव भरने अच्छे नहीं लगते। पन्नालाल की भी यही प्रकृति थी। निर्मला भी अपने मन को तसल्ली दे रही थी। दोनों ने एक-दूसरे को तो समझा दिया, लेकिन दोनों का मन अपने आप में बोझिल हो गया था।

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