+91-11-41631787
नई सुबह
Select any Chapter from
SELECT ANY CHAPTER
नई सुबह Voice and Text
     
नई सुबह से पहले (ग्यारह)
ISBN: 81-901611-13

मय हँसी-खु’शी बीत रहा था। वीणा के मन से डर बाहर निकल चुका था। आशावादी वह थी और अब इसी आशा के साथ वह, हर सुबह नए-नए सपने संजोती थी। कभी-कभी माँ कृष्णा के स्वभाव से उसका दिल दुःखता था, जो अपनी ही दुनिया में खोई एक ही आशा को अपनी उजागर करती थी कि कब उसके घर पोते की किलकारियाँ गूँजेंगी! कब वीणा उसे देव का दूसरा रूप देगी! एक ही बात की रट देखकर वीणा कभी-कभी उकता जाती थी। कहने को जी होता उसका कि कह दे उनसे स्पष्ट ’शब्दों में कि ऐसा करना उसके बस में नहीं। वे अपने बेटे से बात करें। लेकिन संस्कार उसके आड़े आ जाते थे। अपने से बड़ों के आगे जवाब न देना, यही उसने सीखा था। अपने दिल में छिपी आस को मुस्कुराकर प्रकट करना, न कि उसके प्रति आक्रो’श जाहिर करना। दूसरे के दोष को प्रकट करना उसे नहीं आता था।

दूसरे के गुणों को देखने की उसकी आदत थी। और ’शादी हुए नौ महीने बीत गए थे। देव से सहवास के वक्त तनाव भरे क्षणों से अब वह दूर रहना चाहती थी। अपनी ’शारीरिक जरूरत से उसने अपना ध्यान हटा रखा था। देव था कि नित्य को’शिश करता था और ऐसे में वह उसके अंगो को सहला कर उसे ’शांत करने की चेष्टा करता और स्वयं भी उन्हीं भावों में ’शांत हो जाता था। उन दोनों की इन आन्तरिक परिस्थितियों की किसी को भी खबर नहीं थी। क्योंकि सभी उन्हें सदैव खु’श देखते थे। और वीणा केवल अपनी खु’शियों को देखकर ही सन्तुष्ट थी। इससे अलग उसने कभी कुछ न सोचा था।

रात को देर तक देव पढ़ने में व्यस्त रहता था और ऐसे में वीणा ने भी अपनी आदत बना ली थी कुछ न कुछ पढ़ने की। देर रात जब नींद से स्वयं पलकें बोझिल हो जातीं, तभी वह सो जाती थी। देव कब उसके पहलू में आकर उसे छेड़ने लगता, उसे इसका भी आभास कुछ देर बाद ही होता था। ऐसी ही दिनचर्या में सुबह-सवेरे उठकर वह अपने घर के कार्यों में व्यस्त हो जाती।

देव नींद से तभी जागता था जब वह चाय लेकर कमरे में लौटती। लेकिन आज ऐसा नहीं हुआ। एकाएक उसे लगा उसे स्वप्न में देव कराहता दिख रहा है। देव तड़प रहा है दर्द के कारण। लेकिन वह जिसे सपना मान रही थी, वह तो वास्तविकता थी।

जरा-सी आँख खुली उसकी तो देखा कमरे की बत्ती जली हुई है और देव बेचैनी से कमरे में टहल रहा है। ये क्या, देव तो सच में दर्द से बेचैन था! वह रह-रहकर अपने हाथ से अपनी कमर के निचले हिस्से को मसल रहा था। और अपने दर्द को दबाने की चेष्टा में उसने अपने निचले होंठ को अपने दांतों के नीचे दबा रखा था। लेकिन दर्द ’शायद बहुत था उसे कि रह-रहकर उसके मुख से कराह निकल जाती थी। उसी कराह ने वीणा की नींद में विघ्न डाला था।

‘‘क्या हुआ?’’ - वह घबराई-सी उठी और देव के पास चली आई।

‘‘मुझे दर्द हो रहा है पीछे।’’ - वीणा के हाथों का स्पर्श पाकर वह एकाएक बच्चे की भाँति फफकने लगा। वीणा घबरा गई।

‘‘आप बैठिए, मैं अमित को जगाती हूँ। वह डॉक्टर को बुला लाएगा।’’

- वीणा उसे अपने हाथों का सहारा देकर बिस्तर की तरफ लाने को हुई।

‘‘नहीं, बैठना नहीं है मुझे। ऐसे ही आराम मिल रहा है।’’ –

तब वीणा का सहारा छोड़ कर उसने हाथ को पीछे कमर के नीचे टिका लिया और बोला, ‘‘किसी को जगाने की जरूरत नहीं है।

बस मुझे दर्द की कोई गोली दे दो और थोड़ी तेल मालि’श कर दो। आराम आ जाएगा।’’

देव की स्टडी टेबल की दराज में से वीणा ने उसे एक दर्द की गोली निकाल कर दी और बाथरूम से जाकर तेल की ’शीशी निकाल लाई। तब तक देव उल्टा होकर पलंग पर लेट चुका था। वीणा ने अपने कोमल हाथों से उसकी मालि’श शुरू कर दी।

मालि’स से देव को आराम आ रहा था। उसका कराहना धीरे-धीरे रुक गया, लेकिन वीणा ने अपने हाथों से उसकी कमर के निचले भाग को मलना जारी रखा। ऐसा करते-करते कब उसकी पलकें झपकीं उसे नहीं पता। उसी मुद्रा में देव की कमर को सिराहना बनाकर वह भी सो गई।

सुबह उसकी आँख देव के हिलने से ही खुलीं।

‘‘अब दर्द कैसा है?’’ - उठते ही वीणा ने देव से पूछा।

‘‘अब तो आराम है।’’ - देव ने भी बिस्तर से उठते हुए कहा,

‘‘लेकिन ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था।’’

‘‘आज चलिए अपने डॉक्टर के पास। उसकी राय लेना ठीक रहेगा।’’ - वीणा का सुझाव देव को पसन्द आ गया।

बोला, ‘‘हाँ, मैं भी यही सोच रहा हूँ। अभी तैयार होकर चलते हैं। वह अपने क्लिनिक में नौ बजे आ जाता है। पहले पहुँच गए तो प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी।’’

‘‘ठीक है। क्या अमित को भी साथ ले जाना है?’’ – वीणा ने पूछा।

‘‘हाँ, उसे ले जाना ही ठीक रहेगा।’’ - देव ने कहा।

‘‘लेकिन उससे पूछ लूँ उसके काम को नुकसान न हो।’’

- वीणा जानती थी अमित को कितना भी काम क्यों न हो, वह देव के साथ कहीं जाने को इन्कार नहीं करता। देव के साथ उसका भावनात्मक लगाव इतना अधिक था कि कभी-कभी वीणा को लगता था, देव भी यदि किसी पर विश्वास कर सकता है तो वह अमित ही है। वीणा से भी अधिक!

‘‘चाहो तो पूछ लो। लेकिन यही कहना कि रुटीन चैक-अप के लिए जाना है। नहीं तो वह व्यर्थ में चिन्ता करेगा।’’ देव यह कहकर नहाने के लिए चला गया। वीणा तब अमित को मिलने कमरे से बाहर निकल गई।

डॉक्टर गुप्ता के क्लिनिक में वह दस बजे ही पहुँच गए। उस समय अभी कोई रोगी नहीं पहुँचा था। बाहर उनकी सेक्रेटरी ही बैठी थी। देव को वह एकदम से पहचान गई। मुस्कुरा कर उसने अभिवादन किया और बोली, ‘‘बहुत दिनों बाद आना हुआ आपका कैसे हैं आप?’’

- ‘‘मैं ठीक हूँ।’’ - देव ने मुस्कुराने की चेष्टा की। दर्द अब नहीं था। बोला, ‘‘डॉक्टर साहब से मिलना जरूरी था, इसलिए पहले से समय नहीं ले सका!’’

‘‘जरूर! अभी तो फ्री हैं। मैं अभी पूछ कर बताती हूँ। आप बैठिये!’’ - उन्हें बैठने को कह उसने अपने साथ रखी अलमारी से देव की फाईल निकाली और भीतर चली गई।

दो मिनट बाद ही वह आकर बोली, ‘‘आप भीतर जा सकते हैं। देव ने तब अमित को बाहर ही बैठने का संकेत किया और वीणा के साथ भीतर चला गया।

डॉक्टर गुप्ता देव की ही प्रतीक्षा कर रहे थे। बड़ी गर्मजोशी से मिले, ‘‘आईए, कपूर साहब! कैसे हैं आप। ’शादी हो गई।

बहुत-बहुत मुबारक हो।’’

‘‘शुक्रिया सर! आप को तो न्यौता भी भेजा था। आप आए ही नहीं। हाँ, आपका ’शुभकामना सन्दे’श मुझे मिल गया था’’ तब वीणा का परिचय करवाते हुए देव ने कहा, ‘‘ये है वीणा, मेरी पत्नी!’’

तब डॉक्टर गुप्ता ने वीणा का अभिवादन किया, ‘‘आप कैसी हैं, वीणा जी, देव के साथ कैसा लग रहा है आपको?’’

‘‘बहुत अच्छा लगता है सब।’’ - वीणा मुस्कुरा कर इतना ही कह पाई।

‘‘तब वह देव को देखते हुए बोले - ‘‘बोलिए, कैसे आना हुआ?’’ ‘‘सब ठीक चल रहा है डॉक्टर साहब, कोई परेशानी नहीं।

हाँ, कल रात मुझे कमर से नीचे बहुत दर्द हुआ। इतना कभी नहीं हुआ। रात भर तड़पता रहा। दर्द की गोली खाई और फिर वीणा ने मालिश की। तब कुछ आराम मिला!’’ - देव ने विस्तार से बताया।

‘‘अब भी है, क्या दर्द!’’ - थोड़ी गम्भीर मुद्रा में डॉक्टर गुप्ता ने पूछा। ‘‘नहीं, अभी तो नहीं है!’’ - देव ने कहा।

‘‘इतनी सी बात से घबरा गए! इतना बड़ा ऑपरेशन हो गया।

वह दर्द सह लिया, तो इस दर्द की इतनी चिन्ता क्यों?’’ – डॉक्टर का पेशा है, अपने मरीज़ को तसल्ली देना। यही प्रयत्न किया उन्होंने।

‘‘डर तो लगता ही है डॉक्टर साहब! और वीणा भी चाहतॉ थी एक बार जरूर दिखाऊँ मैं आपको। एक वर्ष हो चला है जब मैं आपको मिला था।’’

‘‘चलो यह तो अच्छी बात है। इसी बहाने आप आ गए।’’

- फिर डॉक्टर गुप्ता वीणा की ओर देखते हुए बोले -‘‘देखिए! मिसेज़ कपूर, घबराने की बात नहीं है। यह दर्द तो लगा रहता है। कुछ ज्यादा काम कर लिया। कभी कहीं न कहीं कुछ बदपरहेज़ी कर ली। बस सिस्टम में गड़बड़ हो जाता है। और फिर आप को तो घबराना नहीं चाहिए। इतना बोल्ड कदम जो आपने उठाया, देव से ’शादी करने का, उसके बाद तो यह छोटा-मोटा दर्द तो लगा ही रहता है!’’

वीणा क्या, देव भी चुप हो गया। डॉक्टर गुप्ता का आखिरी शब्द सुनकर। वह क्या कहती, इस बोल्ड कदम की खबर तो उसे बाद में लगी। कुछ और न बोल पाई बस मुस्कुरा कर रह गई।

डॉक्टर गुप्ता ने तब देव से कहा, ‘‘चलिए, भीतर आपका मुआयना करते हैं।’’

वीणा वहीं बैठी रह गई और देव डॉक्टर गुप्ता के साथ भीतर चैक-अप के लिए चला गया। लगभग पाँच मिनट लगे उन्हें। लौटकर आए तो डॉक्टर गुप्ता ने कहा, ‘‘दर्द की दवा लिख देता हूँ। जब भी थोड़ी सी भी तकलीफ महसूस हो खा लेना। और तो सब ठीक है।

- यह कहकर उन्होंने देव की फाईल पर अपने नोट्स लिखने शुरू किये। एकाएक वह बोले - ‘‘देव, ऑपरेशन के बाद तुम्हारा रेडिएशन तो हुआ था न? ऐम्स या बाम्बे टाटा तुम गए थे न?’’

देव को आश्चर्य हुआ सुनकर, ‘‘नहीं डॉक्टर, ऐसा तो नहीं कहा था आपने। आप देखिए, फाईल आपके पास है!’’

‘‘यह फाईल तो ऑपरेशन के बाद की है। पहले की सिर्फ चन्द बातें हैं इसमें। जरूर तुम्हारी डिस्चार्ज़ स्लिप पर लिखा होगा हमने।’’

‘‘नहीं डाक्टर, मेरे पास सारा रिकॉर्ड है। ऐसा तो कभी नहीं कहा था आपने।’’ - ऑपरेशन के बाद तो मैं डेढ़ साल तक हर महीने आपके पास आता रहा था।

- देव कुछ चिन्तित हो रहा था।

डॉक्टर गुप्ता ’शायद इस बहस को नहीं छेड़ना चाहते थे, बोले,

‘‘खैर। कोई घबराने की बात नहीं है। तब नहीं हुआ तो अब करवा लेंगे। लेकिन अभी नहीं। अभी आप दर्द हो तो दवा खाते रहना।

यदि यह दर्द बढ़ता ही रहा तो बेहतर होगा, एक बार ऐम्स में अपना चैकअप जरूर करवा लेना। यदि वे लोग जरूरत समझेंगे तो रेडियोथेरैपी कर देंगे।’’

डॉक्टर गुप्ता जैसे चाह रहे थे एकाएक कि अब देव उनके पास न आए। देव ने तब पूछा, ‘‘कोई चिन्ता की बात है क्या डॉक्टर साहब?’’

- वीणा ने भी इसी आशय से डॉक्टर की ओर देखा।

‘‘नहीं-नहीं! ऐसी कोई बात नहीं हैं। - वह उन दोनों को तसल्ली देने की चेष्टा करते हुए बोले, ‘‘लेकिन फिर भी एक बात तो ध्यान में रखनी ही चाहिए कि देव का यह दूसरा जीवन है। हमें किसी भी तरह का जोखिम नहीं उठाना चाहिए।’’

‘‘फिर रेडिएशन की बात क्यों की आपने?’’ - पूछा वीणा ने!

‘‘वह इसलिए कि अभी कोई परेशानी नहीं हुई तो दुबारा भी न हो।’’

- तब डॉक्टर गुप्ता ने देव से हाथ मिलाने को अपना हाथ आगे बढ़ा दिया, ‘‘ठीक है कपूर साहब, वि’श यू बेस्ट ऑफ लक।’’ और वीणा की ओर अपने दोनों हाथ जोड़ दिए।

वे दोनों बाहर आ गए। अमित उन्हें देखकर उठ खड़ा हुआ। सेक्रेटरी को फीस अदा की। उसने पूछा, ‘‘अगली एप्वाईंटमेंट है क्या?’’

‘‘नहीं, अभी नहीं!’’ - देव ने इतना भर कहा। रास्ते में कोई कुछ नहीं बोला। दोनों के मन बोझिल थे। और अमित उन्हें चुप देखकर परेशान हो रहा था।

घर लौटे तो पाया, डाक से माँ का पत्र आया हुआ था। माँ की जरूरत महसूस कर रही थी, वीणा। माँ नहीं थी, उसके लिखे शब्दों को देखकर ही मन हल्का महसूस करने लगी। माँ ने लिखा था:

‘‘मेरी प्यारी वीणा,

मैं हरदम ई’श्वर से तुम्हारी व देव जी की मंगलकामना करती रहती हूँ। ई’श्वर तुम्हारा सुहाग बनाए रखे। मेरे जीवन में सदा से एक ही आशा रही है कि मेरे बच्चे सदा खु’श रहें। तुम्हारे विवाहित जीवन में तुम्हें खु’श देखकर मुझे सदैव इस बात का सन्तोष रहता है कि मैंने कुछ अच्छे कर्म ही किए थे कि आज मेरे बच्चे अपने-अपने परिवार के साथ खु’श हैं

इधर रजनी की शादी की चिन्ता भी मुझे होने लगी है। पहले तो उसकी ससुराल वाले शादी की जल्दी कर रहे थे, अब हैं कि तुम्हारे डैडी ने पिछले तीन माह में तीन पत्र लिख दिए हैं, कोई जवाब नहीं आया। लड़के के पिता नहीं हैं तो बड़े भाईयों को जैसे उसकी शादी की चिन्ता नहीं है। कल ही लड़के का लिखा पत्र मिला है। उसी के कहने पर मैं और तुम्हारे डैडी नागपुर उसकी माँ से मिलने जाना चाह रहे हैं। अगले हफ्ते जाने का प्रोग्राम बनाया है।

देहरादून से हम दिल्ली पहुँच जाएँगे। यदि हो सके तो हमारे लिए नागपुर तक ही रेलवे की टिकट करवा देना। वापिसी भी दो दिन बाद की ही होगी। टिकट बुक करवा कर हमें सूचित कर देना। पड़ोस की थापा आंटी के घर फोन कर देना। वापिसी में हम एक-दो दिन तुम्हारे पास भी रुक जाएँगे।

घर में हमारी ओर से सभी को यथायोग्य कहना। देव जी को हमारा आशीर्वाद देना।

अपनी ’शुभकामनाओं के साथ,

तुम्हारी मम्मी

निर्मला।’’

माँ का पत्र पढ़कर वीणा का बोझिल-मन थोड़ा संयत हो गया। वह माँ से मिल सकेगी। मन को बड़ी सांत्वना मिली। अमित को बुलाकर उसने अपने माता-पिता के आने-जाने का प्रोग्राम बता दिया। सब सुनकर अमित की आँखें भी चमक उठीं। झट से वह स्टेशन की ओर चला गया। टिकटें बुक करवाने। शाम को घर लौट कर अमित ने वीणा भाभी को नागपुर आने-जाने की टिकटें थमा दीं। वीणा खु’श हो गई। अमित से बोली, ‘‘तुम्हें मेरे कारण कितना कष्ट उठाना पड़ता है।’’

अपनी प्रशंसा सुनकर अमित बोला, ‘‘आप ऐसे क्यों कह रही हैं मुझसे। मैं कोई पराया हूँ आपका ?’’

‘‘अरे नहीं, ऐसी बात नहीं है। तुम तो मेरे अपने हो। मुझे तुममें प्रेम की ही छवि दिखती है। पहले प्रेम मेरे हर काम में सहयोग देता था। अब तुम मुझे मिल गए हो, यही तो समझती हूँ।’’ -

वीणा भावुक हो चली थी। ‘‘मुझे सदा आप प्रेम जैसा ही पाएँगी। देव का छोटा भाई, आपका भाई बन कर रहूँ, मुझे इससे बड़ी खु’शी क्या मिलेगी ?’’

वीणा ने तब स्नेह से अमित के सिर पर हाथ रख दिया और अमित भी भावुक हो उठा। वीणा को लगा, कोई है यहाँ भी जिससे वह अपनी आन्तरिक भावनाएँ बाँट सकती है।

‘‘मम्मी-डैडी आएँगे तुम उन्हें लेकर आ जाना। स्टेशन पर भी तुम्हीं उन्हें छोड़ कर आना। वापसी में वे हमारे पास दो-दिन रहेंगे। तुम्हें ही उनका ध्यान रखना होगा।’’ - तब वीणा ने कहा उससे।

‘‘आपको कुछ कहने की जरूरत नहीं है। यह मेरा कर्तव्य है। मैं सब ध्यान रखूँगा!’’ - अमित ने उसे आ’श्वस्त किया।

वीणा को अब अपने माता-पिता से मिलने की प्रतीक्षा थी।

(इस कहानी को आगे जारी रखने के लिए यहाँ किल्क करें)