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नई सुबह
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नई सुबह Voice and Text
     
नई सुबह से पहले (नौ)
ISBN: 81-901611-13

वीणा के अच्छे स्वभाव से सास-ससुर व देवर भी बहुत प्रभावित थे। देव के पिता श्रीराम का स्वभाव वैसे भी घर में सबसे अच्छा था। सबका भला चाहने वाला श्रीराम सुबह से शाम तक घर में होते हुए भी अनुपस्थित-सा रहता था। न बेटों के काम में दखलअंदाजी करना और न ही घर में किसी काम में। बस, सुबह शाम पूजा के अतिरिक्त दिन भर अपने आस-पड़ोस, पीछे दुकानदारों का हाल-चाल और अपने रि’श्तेदारों के दुःख सुख की नियमित रूप से खबर लेते रहना श्रीराम की दिनचर्या थी।

कृष्णा थोड़ी स्वभाव की चिड़चिड़ी थी। लेकिन वीणा के अच्छे स्वभाव के कारण और घर में देव व अमित के दबदबे के कारण वह वीणा से मधुर सम्बन्ध बनाए हुए थी। लेकिन उसके मने में इस बात की जरा भी कोई शंका नहीं थी कि उसका पुत्र वीणा के मामले में कहीं कम है। वह अपनी बातों से यही महसूस करवाती थी वीणा को कि देव शुरू से शादी की तड़क-भड़क के खिलाफ था और रिश्तों के लिए भी कोई कमी नहीं थी। बस, वह शादी तभी करना चाहता था जब तक कि अपने पैरों पर खड़ा न हो जाए।

रिसर्च के बाद दो साल तक कोई नौकरी नहीं लगी थी उसकी। स्कॉलर’शिप के सहारे वह अपनी शादी का ख्याल नहीं ला सकता था। दूसरे उसके भाग्य में तकलीफ लिखी थी। बीमारी से पीछा छूटा तभी वह शादी के लिए माना।

कृष्णा की जिन्दगी अपने घर की चारदीवारी में ही कटी थी। उसे नहीं मालूम था कि दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई है। उसके बच्चे उसकी आँखों के सामने भले-चंगे खड़े हैं तो वह समझती थी सारी दुनिया भली है। उसके बच्चों को कोई दुःख है तो उसको लगता था सारी दुनिया में दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा है।

वीणा अपनी सास के ज्ञान की सीमा को समझती थी तभी उसे उसकी किसी बात का दुःख नहीं होता था। आखिर वह अपने बेटे की शुभचिन्तक थी और वीणा को देव का हर शुभचिन्तक अपना लगने लगा था। क्योंकि देव उसका सुहाग था। अपने सुहाग की मंगलकामना ही उसका प्रथम कर्तव्य बना हुआ था। ’

शादी से पहले उसने स्कूल से दो महीने की छुट्टी ले ली थी। सारी योजना उसने सोच समझ कर बनाई थी। दो महीने बीतते ही गर्मी की दो महीने की छुट्टियाँ हो जाती थीं। कुल मिलाकर चार महीने उसे देव के साथ मिल रहे थे। एक-दूसरे को समझने के लिए इतना समय काफी होता है। उसे विश्वास भी था कि इस बीच वह केन्द्रिय विद्यालय संगठन से अपनी दिल्ली में बदली करवा लेगी। ऐसा ही किया देव ने। उसकी बदली के लिए भी दौड़-धूप ’शुरू कर दी थी। उधर वीणा की सास को एक ही बात आजकल करने को रहती थी। जब भी वीणा उनके पास बैठती, यही सुनने को मिलता उसे, ‘‘हमारे समय में तो पहला बच्चा ’शादी के एक साल के भीतर हो जाता था। देखो, मेरी मानों तुम भी यही करना। कोई गोली खाने के चक्कर में न पड़ जाना। जल्दी से मुझे दादी बना दो। तुम अपने स्कूल आराम से जाती रहना, बच्चे को मैं संभाल लूँगी।’’

यह सुनकर वीणा मुस्कुरा भर देती। कैसे बताती अपनी सास को कि अभी तो किसी अप्राकृतिक साधन की उसे जरूरत ही नहीं पड़ी है। अभी तो ’शरीर का सम्पर्क केवल सहलाने भर का है और वह भी उसी में ही अपना मन लगाए है। वक्त आएगा, सब ठीक हो जाएगा। जरूरत है अभी देव को तनाव मुक्त रहने की।

देव तनाव में रहता था अक्सर ’शाम बीत जाने के बाद। एकाएक उसे लगने लगता था कि जैसे रात आते ही उसे वीणा के सामने परीक्षा देनी होगी। और वह उस परीक्षा में स्वयं को समय आने से पहले ही असफल पाता। हाँ, किताबें पढ़नी ’शुरू की थीं उसने। ढ़ेर सी किताबें पढ़कर उन पर अमल करने की को’शिश भी की थी। वीणा ने सदैव उसका साथ भी दिया। लेकिन देव अपना संयम समय से पहले ही खो देता था। इन किताबों के सहारे ही वह जान पाया और सदा को’शिश भी करता था कि वीणा को वह अपने स्पर्श से कुछ राहत दे सके। और वीणा, वह इसी स्पर्श की दिवानी बनी देव के लिए घंटो प्रार्थना करती थी।

उसने अपना ध्यान ’शारीरिक सम्पर्क से हठा रखा था। जो मिल जाता था उसी में ही संतुष्ट रहने वाली थी वह। और ऐसे व्यक्ति को सुख की परिभाषा बहुत सरल लगती है।

यही सुना था उसने अपने घर में पिता के मुख से कि – सुख साधना है, सुख आराधना है, सुख मोल लिया नहीं जाता, सुख वही रूप जो हम पहचानें। जो हो रहा है उस में सुख खोजो। जो दुःख लगता है उसमें सुख खोजो! - यह गीता भाव उसके मन-प्राणों में बसा था और उसी भाव में वह जीना सीख रही थी।

ऐसे ही वक्त बीतता जा रहा था।

.....

अमित के जीवन में बहार आ गई थी। देव की शादी के बाद उसे अपनी जिन्दगी में नई खु’शियाँ दिखने लगी थीं। वीणा भाभी का दिवाना था वह। निम्मी और मालती भाभी का साथ तो उसे बहुत कम मिला था। दोनों ही अपनी-अपनी गृहस्थी में इतनी व्यस्त थीं कि साल में जब-जब भाई छुट्टी पर आते तभी चन्द दिनों का साथ उसे अपनी भाभियों का मिल पाता था। ऐसे में उससे जो बन पड़ता, वह उनकी तीमारदारी में लगा रहता। घर का छोटा सबसे इसी में खु’श रहता था कि वे स, जब भी आतीं, ‘अमित ये लाओ, अमित वो लाओ।’ ‘अमित मेरे साथ बाज़ार चलो’, कहकर उसे इतना महत्व देती हैं। जैसे उसके बिना हर किसी की दिनचर्या अधूरी रहती है!

ऐसे में वीणा को भाभी के रूप में अपने आसपास देखकर वह बहुत प्रसन्न था। वैसे भी वीणा उसे अपनी दूसरी भाभियों से बिल्कुल अलग लगी। एक तो वह देव की पत्नी थी। देव जो उसके मन के बहुत निकट था। देव जो आज उसे खुश दिखता था।

देव को उसने कष्ट सहते देखा था। बहुत करीब रहा वह उसके उन क्षणों में। देव की एक-एक कराहट उसे याद है। ऐसे में अपने भाई देव के चेहरे पर वीणा के आ जाने से, जो खु’शी उसे देखने को मिली, उसी ने उसे वीणा का दिवाना बना दिया। वीणा अच्छी है। बहुत अच्छी है। इससे अधिक वह भी वीणा के दिल को नहीं जान पाया। नहीं जान पाया कि उसका दिल तो देव की मंगलकामना में लगा रहता है। उसके मन की थाह लेना कठिन था। हमें जिस बात की खबर होती है, उसी की सोचते हैं। अपने मन की गहराईयों में सदैव वही बात घर करती है जो स्वयं से सम्बन्धित हो। अपना मन ठीक है तो लगता है दूसरे का मन भी ठीक होगा। अमित को वीणा के चेहरे पर सुख भाव ही दिखते थे और ऐसे में वह उसके भावों में अपने प्रति स्नेह भाव ही पाता था। वीणा को उससे बात करना अच्छा लगता है। वह वीणा से हरदम बात करने को तत्पर रहता था।

सुबह काम पर जाने से पहले नित्य वह वीणा से एक ही प्रश्न पूछता था ‘‘भाभी! जा रहा हूँ, किसी चीज़ की जरूरत हो तो बताना। शाम को लेता आऊँगा!’’ या फिर कि ‘‘भाभी! जा रहा हूँ। भाई को पूछ लेना नाईट-’शो पिक्चर जाना हो तो टिकट लेता आऊँगा!’’

ऐसे में वीणा मुस्कुरा कर यही कहती, ‘‘मैं तो पिक्चर जाने को हरदम तैयार रहती हूँ। अपने भाई से स्वयं पूछ लो। जाना चाहेंगे तो मुझे क्या ऐतराज़ होगा।’’

वीणा को देहरादून से माँ का पत्र आता। ’शाम को लौट कर उसे यह खबर भी अपनी माँ से मिल जाती थी। यही पूछने की चाह होती उसकी कि माँ ने प्रिया के बारे में कुछ लिखा है या नहीं! और प्रिया का पत्र जब आता तो उसकी को’शिश रहती कि वह उसके लिखे ’शब्दों को पढ़ ले। कहीं ’शब्द अपना रूप बदल कर उसका नाम भी लिखा दिखा दें!

प्रिया के लिखे एक-दो पत्र उसने बहाने से पढ़े़ भी थे। यही कह कर कि ‘‘भाभी मुझे दिखाईए प्रिया का पत्र। देखूँ, उसकी लिखाई को मैं। उसके भविष्य के बारे में बता दूँगा!’’

और वीणा हँसते हुए उसे पत्र दिखा देती थी। मन ही मन समझने लगी थी कि अमित कहीं न कहीं किसी रूप में प्रिया को पसन्द करता है। वह उसके लिखे ’शब्दों में अपना रूप खोजता है। लेकिन प्रिया के पत्रों की इबारत में उसे ऐसा कुछ न दिखाई देता। कहीं भी अपना नाम न लिखा मिलता। कुछ अक्षरों को मिटाकर, कुछ अक्षर जोड़ कर भी अपना नाम नहीं बना दिखता था!

वीणा को भी अमित के मनोभावों की खबर लगनी ’शुरू हो गई थी। प्रिया के प्रति उसकी उत्सुकता देखकर वह समझ रही थी अमित के मन में बस रही प्रिया की भावनाओं को। अमित सर्वगुण सम्पन्न लगा उसे। प्रिया के प्रति उचित वर। लेकिन ऐसा सोचकर वह परे’शान भी हो जाती थी। देव से उसके विवाह से अब तक तो सब ठीक चल रहा था। लेकिन कहीं कुछ हो गया तब! लेकिन क्षणभर में उसके संस्कार उसे इससे अधिक सोचने को रोक देते थे। देव को अब कुछ नहीं हो सकता। देव अब बिल्कुल ठीक है। उसे अब कुछ नहीं होगा। और ऐसे में अमित का इस सबसे क्या लेना। वह तो बिल्कुल ठीक है। उसकी अपनी भी तो जिन्दगी है! सबकी थाह लेने वाला अपनी पत्नी को कितना खु’श रखेगा, इसकी कल्पना करते ही प्रिया का खिला चेहरा उसकी आँखों से उतर कर उसके दिल में समा जाता। प्रिया अमित को पाकर जीवन में बहुत खु’श रहेगी। उसके लिए अमित ही अच्छा वर है। घर वालों के प्रति वह निश्चित भी थी। उन्हें देव की पिछली जिन्दगी का नहीं पता। देव ठीक रहेगा, तो उन्हें कुछ पता भी नहीं लगेगा। और देव ठीक रहेगा अब, ऐसा उसका मन कहता है। ऐसी ही उसकी कामना है।

अमित को वह देव से अलग करके देखने लगी। अमित के गुण उसे देव से भी ऊपर लगने लगे। पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने अपने दम पर अपना व्यापार ’शुरू किया था और वह दिन-रात मेहनत करके ऊपर ही उठ रहा था। दिन भर काम में व्यस्त रहता। शाम को अपने परिवार के लिए सुख-साधन जुटाने में व्यस्त रहता। ’शादी से पहले वीणा को व्यापार करने वालों की दिनचर्या का ज्यादा आभास न था। अमित की दिनचर्या देखकर उसे लगा कि नौकरी पेशा से अपना व्यापार करने वाले बीस ही होते हैं। उन्हें सब सुख-साधन जुटाने में कोई परेशानी नहीं होती।

ऐसे में वीणा ने अपने हर पत्र में सबकी कुशलता के विषय में लिखने के साथ-साथ अमित के बारे में, उसकी दिनचर्या के बारे में, उसके व्यक्तित्व की विशेषताओं के बारे में कुछ न कुछ लिखना ’शुरू कर दिया। माँ को तो वह लिखती ही थी प्रिया को भी थोड़ा-बहुत लिखने लगी।

लेकिन प्रिया को अपनी दीदी के मन में अपने प्रति बसती जा रही चाहना की खबर नहीं लग पाई। वीणा के पत्रों की इबारत में अमित का नाम, अमित की प्र’शंसा पढ़-पढ़कर वह अमित के विषय में सोचती जरूर थी, लेकिन ऐसा कभी भी उसके मन में विचार नहीं आया था कि उसकी दीदी अमित व उसका सम्बन्ध बनाने की सोच रही है। हाँ, वीणा दीदी के पत्र पढ़कर छोटी बहन गीता जरूर उससे चुटकी लेते हुए कहती थी - ‘‘वीणा दीदी अपने हर पत्र में अमित के विषय में ढ़ेर सारी बातें लिखती हैं। कहीं उनका मन तुम्हें अपनी देवरानी बनाने का तो नहीं?’’

ऐसे में प्रिया मुस्कुरा भर देती थी। लेकिन यह सिलसिला जब हर पत्र में चलने लगा तो उसके मन ने भी अमित की कल्पना से सुखद अनुभूति का अनुभव करना ’शुरू कर दिया। लेकिन मन की बात उसने अपने मन में ही रखी, किसी को इसकी खबर न हुई।

ऐसे में कुछ दिन और बीते और प्रिया का जन्मदिन आ गया। अपने कॉलेज की सखियों को उसने ’शाम को चाय पर बुला रखा था। दोनों बहनें सुबह से ही सब तैयारी में जुटी थीं। दोपहर की डाक से प्रिया के नाम दो ’शुभकामना सन्दे’श आए। एक कार्ड देव-वीणा का था और दूसरा अमित का। अमित का कार्ड मेरे नाम!’ - सुखद आश्चर्य हुआ उसे, यही सोचा उसने, ‘जरूर वीणा दीदी ने बताया होगा उसे मेरे जन्मदिन का।’ - और मुस्कुरा दी वह ऐसा सोचकर। गीता ने देखा तो माँ से कहने लगी - मम्मी! देखो, अमित ने भेजा है प्रिया को कार्ड!

चलो, अच्छी बात है! वीणा ने बताया होगा उसे!

- आश्चर्य हुआ दोनों को माँ के मनोभाव जानकर। माँ को अमित अच्छा लगता था। यही बोली, ‘‘अच्छा लड़का है।’’

‘‘अच्छा लड़का है, लेकिन प्रिया को कितना अच्छा लगता है, यह भी तो देखना होगा!’’ - गीता ने यह कहते हुए प्रिया को चुटकी काटी।

‘‘चल, पागल कहीं की! कार्ड को देखकर बात कहाँ की कहाँ ले गई!’’ - प्रिया ने उसे प्यार से झिड़कते हुए कहा। लेकिन मन ही मन वह खुश हो रही थी। उसे समझ आ रहा था कुछ-कुछ पत्रों में अमित के विषय में बातें लिखने का वीणा दीदी का इरादा।

देव-वीणा के कार्ड को उसने ड्राईंग-रूम में सजा दिया और अमित के कार्ड को अपनी एक पुस्तक में रख लिया। लेकिन गीता उसे छेड़ती रही दिनभर। प्रिया थी कि उसकी बातें सुनकर मुस्कुराती रही, बोली कुछ नहीं मुख से। अमित के प्रति कोमल भाव पनपने लगे थे उसके मन में। बार-बार वह अमित के लिखे ’शब्दों को मन में गुनगुना रही थी।

उधर अमित बहुत बेचैन था। आज प्रिया का जन्मदिन है, उसे कार्ड मिल गया होगा।उसी के विषय में ही सोच रहा था। कैसा लगा होगा उसे कार्ड देखकर?’ - वीणा भाभी से छिपा कर भेजा था उसने। जानता था, वीणा भाभी को मालूम पड़ जाएगा। क्या सोचेगी, कुछ सोचेगी, कैसा सोचेगी, इसी की कल्पना किए जा रहा था। शब्द भी ढूँढ़ रहा था मन में वीणा के किसी प्र’श्न के उत्तर में। लेकिन ’शब्द थे कि वीणा के लिए उत्तर खोजने की अपेक्षा प्रिया के नाम की माला जपे जा रहे थे। तब उसने प्रिया के नाम एक कविता लिख डाली। आ’चर्य हुआ उसे! ये कैसे हो गया ?

’शब्द एकाएक कैसे कविता में ढल गए! ये कैसे ’शब्दों का रूप एकाएक निखर आया!

‘‘प्रिया।

किसी के मनोभावों का बिम्ब

किसी की आँखों का उल्लास

किसी के हृदय का कण-कण

अथाह उमंगों का दर्पण।

- मूक मगर

अधरों पर मुस्कान लिए

चेहरे पर उल्लास की आभा

आँखों में एक प्रीति लिए।

किसी से नेह का नाता जोड़े

किसी से चिन्तन का है साथ

किसी की आँखों की है ज्योति

किसी की जीवन की प्रभात।

प्रतिपल नवीनता के दर्शन

नित नई उमंगों से मिलन

प्रिया! तुम मेरा जीवन,

जीवन की उत्कृष्ट उमंग।

बहुत अच्छा लगा उसे कविता लिखकर। बार-बार उसे पढ़ता। पढ़-पढ़ कर मन ही मन खु’श होता। जी चाह रहा था उसका पंख लगाकर उड़ जाए प्रिया के पास और उसे सुना आए अपनी कविता। ऐसा नहीं कर सकता था वह, यह समझ कर उदास हो गया। बस अपनी डायरी में कविता लिखकर उसे ही पढ़ता रहा।

अब रोज डायरी में अमित प्रिया के नाम कुछ न कुछ शब्द जोड़ने लगा। उसे सुखद आश्चर्य हुआ कि ये ’शब्द स्वयं एक कविता में ढल कर सामने आ जाते थे। जैसी उसके मन की स्थिति होती थी वही अपनी लेखनी से प्रिया के नाम लिख डालता था।

ऐसा करके उसे लगता जैसे प्रिया से वह बातें कर रहा है। जैसे प्रिया उसके सामने बैठी है। चाह होती कभी इतनी कि वीणा भाभी से कह डाले अपने दिल का हाल। ऐसे में एक दो बार उसने को’शिश भी की। लेकिन कह न पाया। फिर उसने अन्जान बनते हुए अपनी डायरी को ऐसी जगह रखना ’शुरू कर दिया, जहाँ वीणा की नज़र उस पर आसानी से जा सकती थी। लेकिन फिर भी वीणा को नहीं पता लगा। वीणा ने डायरी देखी जरूर, पर उठाकर देखने की कोशिश नहीं की। आदत नहीं थी उसकी किसी की निजी डायरी को देखने की।

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