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नई सुबह
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नई सुबह Voice and Text
     
नई सुबह से पहले (सात)
ISBN: 81-901611-13

भाग्य देखो वीणा का!

रिश्ते कितने आए थे। कहीं न कहीं दोष निकाल देती थी। सपनों के जिस राजकुमार की कल्पना करती आई थी वह यौवन की दहलीज पर पहुँच कर भी कहीं दूर भी नहीं दिखाई देता था।

मूल रूप से वे हिमाचल प्रदे’श के थे। वहीं से रि’श्ते आते थे। पन्नालाल-निर्मला ने मिलकर अपनी सबसे बड़ी आकांक्षा को साकार किया था, अपने सब बच्चों को अच्छी ’शिक्षा दिलवाई थी। और इसी के परिणाम स्वरूप उनकी जानकारी में जो भी लड़का अच्छा पढ़-लिख जाता था, उसका रिश्ता एक बार चलकर जरूर आता था। कोई माँग नहीं रखता था, बस सु’शिक्षित-संस्कारी लड़की की कामना करता था। और ऐसे में जो-जो बहन बड़ी

होती जा रही थी, उसका रिश्ता स्वयं चलकर आ रहा था। सुनीता की ’शादी ऐसे ही हुई। रजनी का रिश्ता भी ऐसे ही हुआ था।

वीणा नहीं मानती थी ऐसे में, तो माँ-पिता यही समझते कि अभी उसका लगन ढ़ीला है। जब संयोग होंगे तो चट-पट सब कुछ हो जाएगा।

आज देखो! संयोग जगे तो रि’श्ता भी हो गया, शादी भी हो गई। और शादी के बाद सामने गरजते काले बादलों का अम्बार लग गया है। जोर-जोर से बादल गरज रहे हैं। बिजली कड़क रही है। न जाने कब बारिश हो जाए! बारिश कितनी होगी, तूफान आएगा, कैसी बरबादी लाएगा, अभी कुछ नहीं पता! अभी तो वीणा को याद आ रहे हैं वे चेहरे जो कितनी आस लगाए उससे ’शादी को बेताब थे।

एक था रतनलाल! डॉक्टर रतनलाल। हिमाचल में कुल्लू क्षेत्र का रहने वाला। सु’शिक्षित परिवार का लड़का। डॉक्टरी की पढ़ाई के बाद वहीं सरकारी अस्पताल में नौकरी लग गई थी उसकी। उसके रि’श्ते की बात शुरू हुई तो किसी ने बताया वीणा का। अपनी माँ के साथ वह चलकर देहरादून आया।

वीणा को देख कर वह मोहित हो गया। और उधर पन्नालाल ने निर्मला से विचार-विमर्श किया। सरसरी तौर पर वीणा से पूछा और अभी वह कुछ सोचती या कहती, कह दिया - ‘‘अरे, इससे अच्छा और क्या मिलेगा! मेरी बेटी का भाग्य बहुत अच्छा है!’’ और ठीक है न, बेटी।’ - कहकर बिना उसे टटोले भीतर जाकर हाँ कर दी। रतनलाल की माँ ने निर्मला को मुँह मीठा करवाने को कह दिया। चन्द मिनटों में रतनलाल घर का जमाई घोषित कर दिया गया। ऐसे में चुहलबाजी करते हुए वीणा को रजनी ने मजाक में कह दिया, ‘कैसा बौना लगता है, वीणा, गोल-मटोल! चलता है तो लगता है लुढ़क रहा है।

और वीणा ने तब गौर से देखा रतनलाल को। अरे ये क्या! डॉक्टर के रूप में उसे वह नहीं दिखा उसे। उसके मस्तिष्क ने, अब मन में बसे दर्पण ने उसकी तस्वीर खींची और अपनी काल्पनिक तस्वीर से उसका मेल किया। यह तो मन-दर्पण में रची-बसी छवि से बिल्कुल विपरीत थी!

अब क्या करूँ? कैसे मना करूँ?’ - रजनी से कहा। रजनी ने माँ से बात की और माँ ने पन्नालाल से। अब मना कैसे कर सकते हैं ? जुबान कर दी है। मुँह भी मीठा करवा दिया है। मना करेंगे तो सारी बिरादरी थू-थू करेगी। आगे कौन रि’श्ता देगा! ढ़ेर-सी ’शंकाएँ उमड़ आईं पन्नालाल के मन में। लेकिन बेटी के मन को भी नहीं तोड़ना चाहते थे। जोर-जबरदस्ती कभी नहीं की थी उन्होंने अपने बच्चों पर। ऐसे में बस एकान्त में बैठ कर उन्होंने बहुत सोचा, फिर एक छोटी-सी चिट्ठी रतनलाल की माँ के नाम डाक में डाल आए। अपनी लड़की की इच्छा के विरुद्ध वह नहीं जा सकते, यही भर लिख दिया।

छोटा-सा प्रदे’श है हिमाचल! पलभर में खबर सारी रि’श्तेदारी में फैल गई। सभी नाराज़ हो गए। वीणा की नानी रूठ गई अपनी बेटी से, मामा भी उसके रूठ गए। लेकिन पन्नालाल ने जो निर्णय सुना दिया था, वह उससे नहीं बदले।

वीणा को कभी लगता कि उसने करके ’शायद गलती की है। रिश्तेदारों की बातें सुनी। लेकिन मन में बनी छवि की ही जीत हुई, उसी ने दिलासा दिया, ‘अगर वीणा तुम्हारी बात अनुचित होती तो वे तुमको जरूर कहते। प्यार से भी, गुस्से से भी। रि’श्तेदारों की नहीं मान रहे हैं। - यदि मैं वास्तव में कोई भूल कर रही होती तो क्या ये मेरा साथ देते ?’

वक्त निकलता गया। हिमाचल से अब उसके लिए रिश्ता आना मुमकिन न था। ऐसे में अखबार में से विज्ञापन छंटने शुरू हुए और वीणा स्वयं ही तला’शने लगी अपना वर।

.............

देव का मिलना उसके भाग्य में था।

यह मिलन सात जन्मों के रि’श्ते से जुड़ा है या फिर यह सात जन्मों के बाद की नई दास्तान है। मन-दर्पण में बसी छवि तो मिल गई, लेकिन उस छवि के पीछे परदे में कितनी कहानियाँ हैं ? कितनी सच्चाईयाँ हैं? कितने गहरे राज़ छिपे हैं ? – एकाएक मन जब डर जाता है तो अनगिनत अज्ञात आ’शंकाएँ उसे घेर लेती हैं। ढ़ेर-सी कल्पनाएँ उसने कर डालीं पल भर की मुलाकात के बाद - वीणा की दशा तो उससे भी खराब थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे?

देव ने उसे धोखा दिया है।

उसके घर वालों ने इतनी बड़ी बात छिपाकर शादी की है उसकी।

- कौन दोषी है? कौन?’

- घर वाले दोषी हैं - रमेश दोषी है तो देव भी तो दोषी है।

- मुझे घर वालों से क्या लेना - देव से शादी की है। दोष तो उसका ही है मेरे प्रति।

- ऐसे धोखेबाज के साथ जिन्दगी कैसे बीतेगी?’

- जीवन भर......!

- कैंसर के मरीज से ब्याही दुल्हन का सुहाग कब तक बना रहेगा? कब तक? वह तो कह रहा है उसकी बीमारी जड़ से चली गई क्योंकि उसके शरीर का वह भाग ही काट कर फेंक दिया गया है जो खराब हो गया था।

- ऐसे व्यक्ति के साथ फिर भी कैसे गुजारा होगा?’

- उसे छोड़ दूँ, दो टूक कह दूँ तुमने मुझे धोखा दिया है।

- धोखे से की गई शादी, शादी नहीं कहला सकती।

- छोड़कर सब कुछ सुबह ही देहरादून चली जाऊँ और इसे एक भूली कहानी समझ लूँ?’

- लेकिन......?’

- लेकिन मम्मी-डैडी, छोटी बहनें-भाई, नाते-रि’श्तेदारों को क्या बताऊँगी?’

- मम्मी-डैडी की क्या दशा होगी?’

ढ़ेर-से प्रश्न उठ रहे थे उसके मन में। स्वयं को दुविधा में पा रही थी। कुछ और नहीं सोच सकी वह। सामने बूढे माँ-बाप खड़े दिखाई दिए। कितनी खुशी से उन्होंने विदा किया था उसे! उनके सब सपने एकाएक तोड़ कर क्या वह खु’श रह पाएगी? और तभी बिजली की तरह मन में एक निर्णय कौंध गया वीणा के.......

- घर जाकर भी रहूँगी जैसे, यहीं इसी के साथ रह लूँ। जैसा भी है, पसन्द से वरण किया है उसका। जो होना है उसे ही होने दूँ। भाग्य की बात थी तभी इससे विवाह हुआ है। अब अपनी जिन्दगी भाग्य के सहारे ही छोड़ दूँ। जो बनाएगा-बिगाड़ेगा वह भाग्य ही करेगा। बस.. और कुछ नहीं!सुबह वीणा की आँख जल्दी खुल गईं। देव तब सो रहा था। वह चुपचाप उठकर खिड़की के पास बैठ गई। सामने की सड़क पर इक्का-दुक्का लोग आ जा रहे थे। - सुबह की सैर को निकले हुए लोग। उसका भी मन हुआ कि वह उठे और तैयार होकर घर से बाहर निकल जाए।

सुबह की हवा से उसका मन भी ताजा हो जाएगा। लेकिन संकोच उसके आड़े आ गया। वह वहीं बैठी रह गई। खुली खिड़की से हल्की हवा आ रही थी। उसी का आनन्द लेने लगी। लेकिन वह ठण्डी हवा उसको आत्मविभोर नहीं कर सकी। मन ढ़ेर-सी

’शंकाओं से सहम-सा गया था। कुछ सोचने समझने की शक्ति भी नहीं रही थी उसमें। बस रह-रह कर सो रहे पति को देख लेती थी।

- कितना सुन्दर था वह!

- हाँ, देव बहुत सुन्दर था।

लेकिन उसके भीतर की कहानी ने वीणा को कंपा दिया था।

रोम-रोम सिहर उठा उसका। उसकी सुन्दरता पर मोहित हो गई थी वह। वह ज्ञानी भी था, उसके मन पर भी वह मोहित हो गई थी। लेकिन इस व्यक्ति के लिए संजोए सपने वह टूटते नहीं देख पाने की क्षमता रखती थी, इसका भी एहसास उसे था। जो कुछ भी बताया देव ने अपने विषय में वह उसके विपरीत कुछ नहीं सोच पा रही थी। उसे देव का सब बताया सहज वि’श्वास करने योग्य नहीं लग रहा था, क्योंकि देव भला-चंगा तन्दुरुस्त उसके

सामने सोया पड़ा था।

देव को देखकर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि वह कभी अपने जीवन में एक महायुद्ध लड़ चुका है। और फिर सबसे बड़ा ढाढ़स तो उसे उसका मन बंधा रहा था कि देव आज तन्दुरुस्त है। उसे भविष्य में कोई तकलीफ होगी तो वह उसके भाग्य में लिखी होगी। भाग्य को भला कौन बदल सकता है ? - यह धारणा उसके भीतर बैठे हुए संस्कारों के कारण भी जन्म ले रही थी। जो कुछ उसके साथ पहले से हो चुका है, वह शादी के बाद भी तो हो सकता था। तब वह क्या उसका साथ छोड़ सकती? वर्तमान में जल्दबाजी करना उचित नहीं। जल्दी में उठाया गया कदम गलत भी हो सकता है। देव के साथ परिणय-सूत्र में बंधना उसकी नियति में लिखा था, उसी भाव में अब वह जीना सीखेगी।

देव के चेहरे को देखकर वह एकाएक संयमित हो गई। तभी वीणा के विचारों की श्रृंखला टूट गई। देव उठ चुका था। देव की ओर देखकर वीणा ने मुस्कुराने की चेष्टा की।

‘‘कब उठीं.....?’’ - देव ने धीमे से पूछा। ’शब्द सभी बिखरे हुए देख रहा था देव अपने। चाह कर भी वह उसकी ओर अपनी बाँहें नहीं बढ़ा पाया।

‘‘ अभी, बस थोड़ी देर पहले।’’ - नहीं बता सकी वह उसे कि नींद तो उसके पास नहीं फटकी। ’शरीर जो सौंपा था उसने रात देव को और जो कुछ भी महसूस किया, सुना, समझा और देखा वह सब उसके सभी सपनों को झकझोर गया। वह अपने संजोए सभी स्वप्नों के साथ जिस आका’श में उड़ रही थी, वे सभी उसे बिखरते दिखे थे, उस पल-दो-पल की मदहोशी के बाद। वह जो देव को पाने को बेताब थी, वह वीणा अब नहीं रही थी। अब चाहकर भी देव की ओर नहीं बढ़ पा रही थी।

‘‘क्या सोच रही हो....?’’ - देव ने दबे स्वर में पूछा। वह भी स्वयं को बेबस-पा रहा था, इससे अधिक कुछ नहीं कह पाया।

‘‘कुछ नहीं.... बस.... यूँ ही बिखरे-शब्द चुन रही हूँ। न कोई वाक्य बन रहा है, न कुछ....।’’ - बात अधूरी ही रह गई। आँसू न रोक पाई वह। सिसकने लगी देव को इस बात का एहसास तो था कि वह अभी ऐसा कुछ करने योग्य नहीं है कि जिससे वीणा रात के पहले चन्द क्षणों में उसे जैसी लग रही थी, सरलता से वैसी दिखने लगेगी। समझदार तो था, लेकिल उसके मन की थाह नहीं ले पा रहा था। फिर बोला, ‘‘मैं अभी नहाकर सबसे पहले रमे’श भाई से बात करूँगा.... उन्होंने ऐसा कैसे कर दिया?’’

‘‘उससे क्या होगा ? इस बात को अभी तूल मत दीजिए। मैं अभी अनि’श्चितता के दौर से गुज़र रही हूँ। जल्दबाजी में मैं कुछ ऐसा नहीं करना चाहती कि जिससे मेरे परिवार वालों को दुःख पहुँचे। मुझे अपनी भावनाओं के प्रवाह को रोकना है। जो हो चुका है, उसे एकाएक मैं बदलना नहीं चाह रही।’’ - वीणा का निश्चय अभी स्वयं उसे ही समझ नहीं आ रहा था, तब वह देव को क्या बताती।

लेकिन उसके ’शब्दों ने जैसे देव को ताकत दी। उसे लगा, उसे वीणा के मनोभावों को जीतना होगा। उसे भावनाओं के प्रवाह में उल्टी ओर जाने से रोकना होगा। एक ही शब्द सुनकर वह समझ गया कि वीणा भावुक लड़की है। नर्म दिल की है। उसे भावनाओं में बाँध कर रखा जा सकता है। वह उसके साथ बनी रहेगी यदि वह उसकी भावनाओं का सम्बल बन कर रह सका तो।

भावुक प्राणी बह जाता है, भावनाओं में बहुत जल्दी। देव को लगा अब रास्ता उसे ढूँढ़ना है। ब्याहता है वह उसकी। उसे अपनी प्रेमिल भावनाओं में बाँध कर रखने की वह यथायोग्य चेष्टा करेगा। उसी प्रवाह में वह बोला - ‘‘मैं तुम्हारा गुनाहगार हूँ, वीणा! जो चाहती हो, जैसा चाहती हो, वही होगा आज से। बस एक बार मुझसे कह देना। मैं उफ तक नहीं करूँगा। मैंने जाने-अनजाने तुम्हारा दिल दुःखाया है। जो सज़ा दोगी मैं चुपचाप सह लूँगा।’’

देव की बात वीणा के मन में आ बसी। भावुक लड़की थी वह, बोली - ‘‘जैसा सोचा था मैंने, वैसा तुम्हारा रूप पाया। स्वयं ही मैंने तुम्हारा वरण किया। जो नहीं जानती थी, या मैं जिससे अन्जान थी, वह मेरे साथ धोखे में हुआ या मेरे भाग्य से। अभी कुछ नहीं कह सकती। बस इतनी इच्छा है मेरी कि मैं कुछ ऐसा न कर बैठूँ जिससे मेरे परिवार के किसी भी सदस्य को ठेस पहुँचे। इसलिए अभी मेरी विनती है कि आज जो कुछ मेरे-तुम्हारे बीच हुआ है, उसकी परछाई भी इस कमरे से बाहर न पहुँचे। यही वायदा चाहिए मुझको।’’ - वीणा के ’शब्द आँसुओं की अविरल धारा के साथ निकल रहे थे।

भावुक ही नहीं समझदार भी है!’ - देव ने सोचा मन में। पलभर में मन अपने सामने अनुरूप बनती परिस्थिति के साथ कितनी शीघ्रता से संयमित हो जाता है, यह इस समय देव की मनःस्थिति को देखकर समझा जा सकता था। ‘‘मेरे मन में तुम्हारे प्रति प्रेम नहीं आदर भी आ गया है। जीवन में अभी तक सहे सब कष्ट जैसे मिट गए हैं। मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए। बस मैं तुम्हारे लिए हर दम तैयार हूँ। जो चाहोगी, जैसा चाहोगी, वैसा ही होगा। - मुझे तुम्हारे निर्णय की प्रतीक्षा रहेगी। जो हुआ है वह यदि भाग्य में लिखा था तो जो होगा वह भी भाग्य के अनुरूप ही होगा।‘‘ - देव वीणा को छू न सका। हाँ, घुटने टेक कर उसके सामने बैठ गया। और वीणा भी बस उस के कन्धों को छू कर बोली - ‘‘चलिए, अब तैयार हो जाते हैं। बाहर से कोई आवाज़ लगा देगा।’’

रात लगा था, बहुत बड़ा तूफान आएगा। लेकिन यह तूफान आया भी, जोर-जोर की गर्जना करता रहा और फिर एकाएक थम गया। कुछ तहस-नहस नहीं हुआ। हाँ, वीणा की भावनाओं की खबर जरूर देव ने मन के हर कोने में बिठा ली। वह वीणा के मन को जीतने के लिए बेताब हो उठा था। और वीणा ने स्वयं को हालात के सहारे छोड़ दिया। वह एक नए परिवे’श के लिए स्वयं को तैयार करना चाहती थी। अपने इस विवाहित जीवन का हर निर्णय वह अपनी सोच-समझ के अनुरूप लेना चाहती थी। वह अपनी खु’शियाँ बाँटने वाली वीणा थी, अपने आँसू स्वयं पीना चाहती थी।

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