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नई सुबह
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नई सुबह Voice and Text
     
नई सुबह से पहले (छह)
ISBN: 81-901611-13

वीणा एक नये परिवेश में पहुँच चुकी थी। सब कुछ उसके लिए बदला-सा लग रहा था। उसे लगा था हर एक चेहरा अजनबी, लेकिन मन में मीठी-सी तरंगे रह-रहकर उठ रही थीं।

- इस नएपन का एहसास उसे भीतर ही भीतर उकसा रहा था खु’श-खु’श रहने को। अजनबी चेहरों की छेड़छाड़ उसे गुदगुदा रही थी। इसीलिए पीछे छोड़ आई माँ-बहनों की याद उसे दुःखी नहीं कर रही थी। मन ही मन उसे देव की माँ अपनी माँ जैसी लग रही थी, उसके भाई-बहन अपनों से अधिक अपने लग रहे थे। आज एक नई पदवी मिली थी उसे - किसी की पत्नी, किसी की बहू, किसी की भाभी, कहलाने का स्वप्न साकार हुआ था उसका।

अपने घर का सपना था उसका। छोटा-सा घर। पढ़ लिख जाने के बाद कुछ आगे की जब वह सोचती थी तो उसे दिखता था - एक दुल्हन का रूप। स्वयं को दुल्हन बने देखने की तमन्ना थी उसकी। कोई सुन्दर-सजीला नौजवान दिख जाता था उसे कभी-कभी सपनों में - बस, इससे आगे कुछ नहीं। बार-बार अपनी कल्पना को साकार रूप में देखने की तमन्ना होती थी उसे।

लेकिन अपने मनोभावों को वह सीधे-साधे शब्दों में व्यक्त न कर पाती थी। बस किसी और तस्वीर, किसी और की बातें होती थीं - बहनों में, सखियों में। लेकिन मनभावन चेहरा उसे दिखा बहुत समय के बाद। देव को देखकर उसे लगा था कि ऐसे ही किसी वर को तलाश रही थी वास्तविक जीवन में उसकी आँखें। पहली बार देव को देखते ही उसने अपने मन की काल्पनिक छवि को रंग-रूप से चित्रित कर देव का रूप दे दिया था। उसकी कल्पना रंग में आ गई थी। देव के आ जाने के बाद। और आज वह देव की होकर उसके घर चली आई थी, अपने सपनों को साकार करने।

रात देर तक घर भर की औरतों ने उसे घेर रखा था। सब अपने-अपने तरीके से उससे बातें कह रही थीं। और वीणा भी जहाँ तक उससे हो पा रहा था, सभी को सुन-समझने की चेष्टा कर रही थी।

उकताहट महसूस करती जब कभी तब अमित दूर कर देता उसकी उकताहट उसे चाय पिलाकर। उसे अमित का स्वभाव बहुत अच्छा लगा था। महसूस किया था उसने कि अमित ही घर में सबसे ज्यादा खु’शदिल है।

इतना तो जानती थी कि घर में सबसे छोटा है और मिलनसार है। अब महसूस कर रही थी कि उसकी खु’शदिली से ऊपर एक बात और है कि घर भर के लोगों की जरूरतों का भी उसे ही ध्यान है। दोपहर बाद देहरादून से दिल्ली पहुँचने के बाद उसे अमित अन्दर-बाहर होता दिखाई दिया। कभी कुछ लाता हुआ और कभी कुछ ले जाता हुआ। माँ, पिता, भाई-भाभीयाँ, सभी उसे ही आवाज़ दे रहे थे। जैसे घर में अमित की ही चलती हो। और इतनी व्यस्तता के बावजूद अमित का वीणा के पास आना और चाय के लिए बार-बार पूछना वीणा को बहुत अच्छा लगा था। अब अमित आया तो रात के साढ़े नौ बज रहे थे। इस समय वीणा के पास केवल कोमल बैठी थी। वीणा भी अमित से अब काफी खुल कर बात कर रही थी। अमित को देखकर कोमल ने मुस्कुराकर कहा - ‘‘लो आ गया फिर तुम्हारा देवर।’’

‘‘क्यों? आपका कुछ नहीं क्या?’’ अमित ने तुनक कर पूछा कोमल से।

‘‘भई, मेरे लिए तुम्हारा नाता नया तो नहीं, वीणा के लिए तो तुम पहली बार बने हो देवर।’’ - कोमल ने चुटकी ली।

‘‘ठीक है, ठीक है, अब आप पिंड छुड़ाना चाहती हैं न मुझसे। भई, मैं सबका देवर हूँ। सबसे छोटा, सभी का सेवक।’’

तब कोमल ने बात का रुख बदला - ‘‘चलो भाई मान लिया मेरे प्यारे देवर जी, अब आप कहिए कैसे आना हुआ? क्या सेवा करेंगे अब आप हमारी।’’

‘‘हाँ यह हुई न बात।’’ - खु’श हुआ अमित और बोला - ‘‘चलिए अब खाना लग चुका है।’’

‘‘वाह! देखो वीणा। कितना ध्यान रखता है सबका अमित।’’

और वीणा ने प्र’शंसा-भरी नजरों से देखा अमित को। उसे लगा सामने अमित नहीं प्रेम खड़ा है। प्रेम भी तो ऐसा ही है। वीणा के मन में अमित प्रेम के साथ जुड़ गया - एक छोटे भाई की तरह।

रिश्तों की शुरूआत ऐसे ही होती है, मीठी-मीठी बातों के साथ।..........

दो आत्माओं का मिलन एकाएक ठहर गया। वीणा की दृष्टि देव के पेट के बाएँ भाग की ओर पड़ी। वहाँ दो इंच चौडा एक टेप लगा हुआ था। अपनी बिखरी साँसों को काबू करने की को’शिश करते हुए उसने पूछा - ‘‘यह क्या है?

कोई चोट लगी है क्या?’’

यह सुनकर देव चौंका।

‘‘नहीं। यही तो है Sigmoid Clostomy

Sigmoid Clostomy....? यह क्या....? ‘‘मैं समझी नहीं...।’’

- वीणा को देव के शब्द पहेली से कम नहीं लगे। यह सुनकर देव कुछ संभल गया। प्रेम का नशा जैसे एकाएक उतर गया उसका। वह वीणा के पहलू से हट कर उठ गया। कुछ परेशान हो उठा।

‘‘तुम जानती तो हो मेरे ऑपरे’शन के विषय में!’’ - देव ने स्पष्ट करने की चेष्टा की।

‘‘ऑपरे’शन! कौन-सा... ऑपरे’शन?’’ - वीणा हतप्रभ थी।

‘‘कैसी बात कर रही हो वीणा? - शादी के विज्ञापन में दिया था - फिर रमे भाई ने सब बताया था डैडी को...।’’ - देव की परेशानी बढ़ गई एकाएक। ‘‘मुझे नहीं मालूम देव। तुम कैसी बात कर रहे हो। ऑपरेशन कौन-सा?’’ - वीणा सच में भूल-सी गई थी, ऑपरेशन शब्द को जो उसने अखबार में ही पढ़ा था। हाँ उसे ऐसा कुछ याद नहीं आया कि कभी रमेश भाई ने कुछ ऐसा कहा था उससे या डैडी से। या कुछ ऐसा लिखा था।

‘‘ऐसी बात तुम कैसे भूल रही हो? विज्ञापन में साफ लिखा था - Operated for Sigmoid Clostomy’’ देव ने फिर स्पष्ट किया था। कुछ नर्वस हो चला था वह।

तब जैसे याद आया वीणा को। उसे विज्ञापन में लिखे शब्द याद हो आए थे। बोली, ‘‘हाँ ऐसा कुछ लिखा तो था। लेकिन वह क्या होता है ? उस पर मैंने अधिक ध्यान नहीं दिया।’’

‘‘वह यही क्षेत्र है जो तुम देख रही हो। इसी को Sigmoid Clostomy कहते हैं। मेरा इसी का ऑपरेशन हुआ था।’’ – देव हैरान था वीणा की अनभिज्ञता देखकर।

‘‘यानि...?’’ वीणा ने खुलासा चाहा। वह वास्तव में कुछ नहीं समझ पा रही थी।

तब देव ने कहा - ‘‘वह तो तुम्हें मैं समझा देता हूँ, लेकिन क्या रमेश भाई ने यह सब नहीं समझाया तुम्हें या डैडी को?’’

- जैसे देव को वीणा की इस अनभिज्ञता पर सं’शय था।

‘‘नहीं देव, तुमसे अब किस बात का परदा! ऐसी कुछ बात नहीं हुई थी।’’

- वीणा को देव के ’शब्द पहेली समान लग रहे थे। यह अंग्रेजी का शब्द - Sigmoid Clostomy - जैसे किसी गम्भीर भाव को छिपाए था। इसका मतलब ही उसे नहीं पता। विज्ञापन के इस शब्द पर उसने ध्यान ही नहीं दिया और न ही उसे किसी ने इसका अर्थ समझाया। यह ’शब्द जैसे उसके जीवन में कोई बहुत बड़ा बदलाव ला सकता है, ऐसा सोचकर उसे इसका अर्थ न समझना जैसे अपनी सबसे बड़ी भूल लगी।

लेकिन इस शब्द के सहारे तो उसने शादी नहीं की थी। आज फिर यह शब्द उसे इतना रहस्यमय क्यों लगने लगा। कुछ तो ऐसा है इस ’शब्द का अर्थ, कुछ गम्भीर ही है, तभी देव परेशान हो उठा है उसे इतना अन्जान जानकर। भारतीय संस्कृति – किस मोड़ पर है?

अंग्रेजी का दबदबा - एक शब्द - Sigmoid Clostomy ने जीवन की धारा को ही बदल दिया। न मतलब पता था, न जानने की को’शिश की। सूरत देखी और उसी पर मर मिटे।

‘‘मुझे विश्वास नहीं हो रहा। उन्होंने तो कहा था दूसरे पत्र में भी लिखा है और हमारी मंगनी के दिन वह डैडी को बाहर लेकर भी गए थे। यही कारण था कि मैंने चाहते हुए भी तुमसे बात नहीं की।’’ - देव भी दुविधा में फंस गया था।

‘‘मेरे डैडी ने कुछ ऐसा नहीं बताया घर में। लेकिन क्या यह सीरीयस बात है। मैं तो इस विषय में कुछ नहीं जानती। मुझे विस्तार से बताओ।’’ - वीणा सब कुछ जैसे अभी जानने को उत्सुक हो उठी थी।

‘‘वीणा! मुझे समझ नहीं आ रहा कि बात कहाँ से शुरू करूँ। लेकिन तुम मेरी पत्नी बन चुकी हो और अब तो तुमसे मेरा कोई परदा नहीं है। फिर भी बात किस तरह करूँ कि तुम्हें यह सब बातें अनुचित न लगें।’’ - देव ने अपनी भावनाओं को संभालने की चेष्टा करते हुए कहा। उसे लगा कि यदि वह अभी सारी बातें खुल कर नहीं बताएगा तो न जाने वीणा पर क्या प्रभाव पड़ेगा। वह मानसिक रूप से अ’शांत हो जाएगी। न जाने क्या कर बैठे ? हो सकता है वह उसे छोड़कर चली जाए। उसने स्वयं को ऐसी परिस्थिति सह सकने में असमर्थ पाया। बड़ी मु’श्किल से तो वह ’शादी को माना था। अब ’शादी के बाद ऐसी परिस्थिति सामने पाकर वह स्वयं को ही दोषी समझ रहा था। भावनाओं को संभाला उसने और बोला, - ‘‘वीणा जैसा कि हमने विज्ञापन में लिखा था कि मेरा ऑपरेशन हुआ था - बड़ा ऑपरेशन हुआ था और शादी के लिए उसका खुलासा करना जरूरी था इसीलिए मेरी जिद्द थी कि पूरी बात बताई जाए। लेकिन सच बात यह है कि मुझसे यही कहा गया कि तुम लोगों को सब बता दिया गया है। तुम इतना तो जानती हो कि मेरी शादी की सारी तैयारी रमेश भाई ने ही की थी। माँ-बाबूजी का इन बातों से कोई मतलब नहीं। वे तो इन बातों में दखल नहीं देते। सच कहूँ तो उन्हें कोई दखल देने भी नहीं देता। यहाँ जो कुछ भी होता है हम भाईयों की आपसी राय से होता है।’’ - देव धीरे-धीरे सब गाँठे खोल रहा था।

वीणा कुछ सहम सी चुकी थी लेकिन कुछ बोली नहीं, सुनती रही - देव के शब्दों को - ‘‘मैं अपनी शादी नहीं करवाना चाहता था। एक बार ऑपरेशन हो चुका है फिर कोई परेशानी हो जाए, कल का क्या पता! लेकिन माँ दबी जुबान से कहती थी अमित से बार-बार। रमे’श व मोहन भाई साहब को चिट्ठी लिखवाती थी। प्रमोद के माध्यम से भी मुझ पर जोर डलवाती थी। इस बार जब रमे’श भाई छुट्टी आए तो उन्होंने मेरे डॉक्टर से जाकर बात की। उसने भी अपनी राय उनके पक्ष में दी थी। तभी मैं माना। मैंने अपनी बीती जिन्दगी में इतना एकान्त भोगा है, इतनी परे’शानियाँ सही हैं कि मैं भी अपना घर बसाने को हामी भर बैठा और जिसका परिणाम है मेरी-तुम्हारी शादी।’’

तब देव कुछ रुका उसने वीणा की ओर देखा। वह देव को एकटक देखे जा रही थी। नई शादी, नए परिवेश में वह जितनी खु’श थी, अब उतनी सहम सी गई थी। हर पल उसका दिल अज्ञात आ’शंका से भरता जा रहा था। अगले पल क्या खुलासा होगा, उसे नहीं मालूम था। लेकिन संस्कारों से उसका मन बहुत कोमल था। पति के शब्दों के प्रति उसके मन में श्रद्धा थी। इसी के वशीभूत हुई बोली - ‘‘मैंने यह तो नहीं कहा और न ही मैंने सोचा कि आपने शादी क्यों की? मैं तो इस चोट के नि’शान को देखकर आपसे यही पूछ बैठी कि यह क्या है। आप कह रहें कि आपका मेजर ऑपरेशन हुआ था, लेकिन अभी भी मुझे समझ नहीं आया कि किस बात का ऑपरेशन था। आपको तकलीफ क्या थी ? मैं छोटे से परिवार से आई हूँ। घर में कोई बीमारी नहीं सुनी - छोटी मोटी तकलीफें होती रहती हैं। शेष कुछ भी नहीं। परिवे’श ही ऐसा है, इसीलिए समझ नहीं आया।

देव तब तक विचारमग्न होकर सोच रहा था कि क्या कुछ वीणा को बताए और क्या कुछ नहीं बताए। पलंग के पास पड़ी टेबल पर पड़ी सिगरेट की डिब्बी से एक सिगरेट निकालकर उसने सुलगा ली। फिर धीरे से कहना शुरू किया। ‘‘पूरी कहानी तो अपनी फिर कभी सुनाऊँगा, लेकिन बीमारी के बारे में संक्षेप में इतना ही कह सकता हूँ कि पी.एच.डी. करते समय मुझे सुबह के समय ’शौच के साथ खून आने लगा था। डॉक्टर ने कहा बवासीर है जिसका कि छोटा-सा ऑपरेशन होगा। उसी के लिए मुझे अस्पताल में भर्ती किया गया। वहाँ ऑपरेशन थियेटर में किसी और डॉक्टर ने मेरा निरीक्षण किया। मेरे डॉक्टर से उसने काफी बहस की और मेरा ऑपरेशन कैंसिल कर मेरा दुबारा परीक्षण किया गया। माँस का एक टुकड़ा बॉयोप्सी के लिए भेजा गया। उसकी रिपोर्ट देखकर मेरा डॉक्टर मुझ से मुँह छिपाने लगा। लेकिन प्रमोद और अमित ने जल्दी से दूसरे एक डॉक्टर से सम्पर्क किया और उसने कहा कि यदि देरी की तो कोई इलाज सम्भव नहीं होगा। वास्तव में वह कैंसर की शुरूआत के लक्षण थे। तब उसने कोई रिस्क न लेते हुए मेरा रेक्टम ही निकाल दिया ताकि लक्षण जड़ से ही चले जाएँ और अब उसी कारण मैं स्टूल बजाए प्राकृतिक तरीके के कृत्रिम रास्ते से करता हूँ। पहले तो मुझे आगे बैग लगाना पड़ता था लेकिन अब स्थिति दूसरी है। मेरे पास एक म’शीन है। जिसकी सहायता से मैं सुबह सवेरे पम्प करके सारी सफाई कर लेता हूँ, तत्प’श्चात चैबीस घंटे तक मुझे कोई परे’शानी नहीं होती.... इसे कृत्रिम मल-द्वार या Sigmoid Clostomy कहते हैं।’’

Sigmoid Clostomy यानि कृत्रिम मल-द्वार। डॉक्टरी ’शब्द जिसका मतलब आम आदमी को समझ नहीं आ सकता, जब तक कि किसी डॉक्टर से न पूछा जाए या फिर ’शब्द कोष में ढूँढ़ा न जाए। इस एक ’शब्द ने देव की सारी पहचान ही बदल दी थी। वीणा को अपना सिर घूमता नज़र आया। वह बोली - ‘‘आपका मतलब है आपको कैंसर है।’’

‘‘है नहीं था - वह भी ’शुरूआत ही थी उसकी। जब मेरा पूरा रेक्टम ही निकाल दिया गया तो अब कैसा डर!.... तुमने औरतों का भी तो सुना होगा अक्सर औरतों की बच्चेदानी पर ट्यूमर हो जाता है और तब डॉक्टर लोग बच्चादानी निकाल देते हैं – बस मेरे साथ ऐसा ही हुआ है, इसीलिए यह बात ऐसी थी कि तुम्हें बताना जरूरी था।’’ - देव ने स्पष्ट किया।

तब तक वीणा को अपना सिर घूमता महसूस हो रहा था। यह कैसे शब्द थे जो देव के मुख से वह सुन रही थी। क्या इसी सुहागरात की कल्पना की थी उसने? क्या शादी के बाद यही सपना पूरा होना था उसका?

उसने अपना सिर थाम लिया। आँसू आँखों से बहने शुरू हो गए। तब देव ने फिर कहा - ‘‘मैंने जो बात तुम्हें बताई है वह बिल्कुल सच है, और यह भी सच है कि अब मुझे कोई खतरा नहीं - ऐसा डॉक्टर ने भी कहा है और मुझे भी यही महसूस होता है। ऑपरेशन हुए दो साल हो गए हैं और इस दौरान मेरा वजन बीस किलो बढ़ चुका है। पहले की मेरी फोटो देखोगी तो स्वयं ही अंदाज लगा लोगी।’’

‘‘मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा... मैंने ऐसी तो कल्पना भी नहीं की थी।’’ - वीणा ने आँसू बहाते हुए कहा।

देव समझ गया कि वीणा के मन को ठेस पहुँची है उसकी सच्चाई जानकर। लेकिन वह भी ठीक थी अभी तो केवल मन्त्रोच्चार द्वारा ही एक रिश्ते की शुरूआत हुई थी। भावनाओं की थाह वह उसकी कितनी लगा पाएगी, ऐसा नहीं जानता था वह। कोई उसकी मित्र तो थी नहीं पुरानी जो उससे कुछ दूसरी तरह से अनुनय-विनय कर सकता। उसे लगा वीणा ज्यादा डरी या उसे किसी ने बहकाया तो वह उसे छोड़कर चली जाएगी। का’श! ऐसा न हो। उसने सोचा यदि ऐसा हो गया तो वह भी नहीं जी पाएगा। अपनी हार तो उसने आज तक नहीं मानी है। हर मु’श्किल का उसने सामना पूरे साहस से किया है। उसकी जिन्दगी में कितने उतार-चढ़ाव आए, सबका मुकाबला किया है। रिसर्च के दौरान उसे एक बार लगा था कि सब तबाह हो गया है - जब उसके प्रोफेसर ने उसके लिखे सब रिसर्च पेपर अपने नाम से अन्तराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित करवा लिए थे। तब उसे लगा था कि सपने बिखर गए हैं उसके। दूसरी बार उसे तब अपने सपने बिखरते लगे जब बार-बार को’शिश करने पर भी उसे नौकरी नहीं मिली थी और अन्तिम बार उसे तब लगा था जब उसने स्वयं का मृत्यु से जूझते पाया था। लेकिन साहस से सब कठिनाईयों का मुकाबला करने के बाद उसने विजय को अपने सामने पाया था।

इन क्षणों से कुछ समय पहले तक वह स्वयं को सबसे भाग्य’शाली पुरुष मान रहा था। लेकिन अब...? अब उसे कोई रास्ता नहीं सुझाई दे रहा था कि जिसकी मदद से वह वीणा का वि’श्वास जीत ले। बात ऐसी थी कि वि’श्वास जीतने के लिए चन्द घंटो का समय था - केवल चन्द घंटो का। क्योंकि सुबह कमरे से निकलते ही यदि वीणा कोई निर्णय ले बैठी तब...? - तब देव का क्या होगा?

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