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नई सुबह
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नई सुबह Voice and Text
     
नई सुबह से पहले (चार)
ISBN: 81-901611-13

न्नालाल के लिए दिल्ली नई जगह नहीं थी। नौकरी के दौरान भी कई बार वह दिल्ली आ चुका था और नौकरी के बाद भी। पिछली बार वह वर्ष भर पहले ही आया था - प्रिया के साथ।

प्रिया को प्री-मैडीकल की परीक्षा देनी थी। और दिल्ली जैसी जगह में वह राजेन्द्र नगर में अपने किसी पुराने मित्र के घर ठहरा था। और वहीं से अगले दिन प्रिया के साथ मौलाना आजाद मेडीकल कॉलेज तक गया था। दिल्ली का वही इलाका देखा हुआ था उसका। माडल-टाउन की ओर जाने का यह पन्नालाल का पहला अवसर था। साथ में निर्मला थी।

रमे’श ने उसे अच्छी तरह समझा दिया था कि बाहर निकलते ही उन्हें सीधी बस मिल जाएगी। व्यर्थ में वह किसी स्कूटर-टैक्सी के चक्कर में न पड़ जाएं। और पन्नालाल ने भी यही किया। बस अड्डे से निकलकर उन्होंने मुद्रिका बस पकड़ ली। बस में अच्छी खासी भीड़ थी और वे दोनों धीरे-धीरे खिसकते हुए आगे ड्राईवर-सीट के पास आकर खड़े हो गए। पीछे की सीटों पर बैठे किसी भी यात्री ने उनकी उम्र का ख्याल करके उन्हें सीट नहीं दी। सबसे आगे की सीट पर एक नवयुवती बैठी थी। वही उन्हें देखकर खड़ी हो गई। तब पन्नालाल ने निर्मला को वहाँ बैठ जाने को कहा। कृतज्ञता से उसे देखती हुई निर्मला सीट पर बैठ गई। वह काफी थकी हुई थी।

उसी लड़की की ओर देखते हुए वह बोली, ”आओ बेटी! तुम भी बैठ जाओ, मेरे साथ।

नहीं-नहीं आप बैठे रहिए। मुझे बस थोड़ी दूर तक जाना है।- उस नवयुवती ने निर्मला से कहा।

कहाँ तक जाना है, बेटी? क्या मॉडल टाउन तुम्हारे रास्ते में आएगा?”

मुझे मॉडल-टाउन ही जाना है।” - उस लड़की ने कहा। तब पन्नालाल और निर्मला दोनों ही खु’ हो गए।

चलो तब तो अच्छा है, बेटी, हमें भी वहीं जाना है। अल्पना सिनेमा के पास।

मैं आपको बता दूँगी।फिर कुछ रुककर बोली – आप कहाँ से आ रहे हैं?”

देहरादून से।

शायद पहली बार आए हैं?”

हाँ, यही समझो।

इसके बाद उन दोनों में और बात नहीं हुई। मॉडल टाउन आया तो उस लड़की ने उन्हें भी उतर जाने को कहा।

सामान के नाम पर पन्नालाल के पास केवल एक बैग था। जिसे हाथ में लिए वह निर्मला व उस लड़की के पीछे-पीछे बस से उतर गया। तब उस लड़की ने उनसे घर का नम्बर पूछा और उन्हें घर तक पहुँचा दिया।

घर पर सभी को उनकी ही प्रतीक्षा थी। पन्नालाल व निर्मला ने जैसे ही घर में प्रवेश किया सामने उन्हें रमे’श कुमार खड़ा दिखा।

उनकी आहट पर ही वह बाहर आ गया था। नमस्कार जी।हाथ जोड़ते हुए वह बोला, “स्वागत है आपका। आईए।और आगे बढ़कर उसने पन्नालाल से हाथ मिलाया।

तब तक भीतर से रमे’ कुमार के वृद्ध पिता व माँ भी आ गए थे। सभी का आपस में अभिवादन हुआ और उन्हीं के साथ ड्राईंग रूम में आ गए। पल भर में घर के सभी लोग वहाँ आ चुके थे। अमित व देव भी। कर्नल मोहन कुमार दिल्ली में नहीं थे। न ही उनकी पत्नी।

मालती ने प्रवे’श किया ट्रे लिए, उसमें ’शरबत के गिलास थे। उन दोनों को नमस्ते के साथ उसने कहा, “घर में सभी ठीक होंगे?

वीणा कैसी है?”

सब कु’ल-मंगल हैं।- पन्नालाल ने कहा।

आप आराम करेंगे थोड़ा?” - देव के पिता श्री राम ने उनसे पूछा।

नहीं-नहीं, आराम की आवश्यकता नहीं महसूस हो रही। इतना सफर करने की तो आदत है हमारी।” - नर्म स्वर में कहा पन्नालाल ने।

पाँच-छः घंटे तो लगे होंगे?”- फिर पूछा श्री राम ने।

पूरे छः घंटे लग गए। सुबह छः बजे की बस पकड़ी थी हम लोगों ने।

हमें तो उस तरफ जाने का अवसर ही नहीं मिला कभी।

- तब माँ कृष्णा ने कहा।

‘‘- अब तो सम्बन्ध बन गए हैं। आना-जाना लगा ही रहेगा।’’

- कहा निर्मला ने।

भगवान सुख करें।“ - यह अक्सर कहती थी कृष्णा। शायद भगवान पर अधिक विश्वास था उसे।

ईश्वर तो जो करता है अच्छा ही करता है, बहन जी। शेष व्यक्ति को अपने कर्मों पर विश्वास होना चाहिए।“ – पन्नालाल जो नियम से ई’वर की आराधना करता था। अपने ई’श्वर प्रेम से परिचय करवाया उसने।

रमे’श कुमार व देव महसूस कर रहे थे कि बात बुजुर्गों की चल रही है। जो बिना छोर के आगे बढ़ती रहेगी। तब रमे’श कुमार ने बातचीत का विषय बदलते हुए कहा - ईश्वर ने ही संजोग

बनाया था देव और वीणा का तभी देखिए आप कहाँ थे और हम कहाँ। आज हम लोगों के बीच एक अटूट रिश्ता कायम हो चुका है।

- और फिर बोला – बाबूजी ने पूछ लिया है पण्डित से।

उसने नौ फरवरी की तारीख निकाली है। आप बताइए आपके पण्डित ने कोई और शुभ महूर्त बताया है?“

आपने पूछ लिया वही काफी है।” - पन्नालाल ने कहा।

इस पर रमे’ ने कहा तब ठीक है, नौ फरवरी को हम लोग शाम तक पहुँच जाएँगे। रात फेरे दिलवाकर दस की सुबह वापिस आ जाएँगे।

तब निर्मला ने कहा कृष्णा से, ”बहन जी, आपके रीति-रिवाजों का हमें कुछ अधिक नहीं पता। थोड़ा कुछ बता दीजिए।

अभी कृष्णा कुछ कहती कि देव बोल उठा, ”कोई रीति-रिवाज नहीं हैं। बस हम पाँच लोग आएँगे शान्ति से और हमें कुछ चाहिए भी नहीं।

शान्ति से नहीं बेटा। देहरादून में जब से हमने घर बनाया है यह हमारे घर की पहली शादी है। सुनीता की शादी हमने हिमाचल में ही की थी। सारी रि’श्तेदारी जो वहाँ है। अब वीणा की शादी कैसे सब चुप्पी से हो जाए। यह ठीक नहीं लगता। आप घर के लोग ही आएँ कोई बात नहीं। वैसे अच्छा लगता कि बारात आती। फिर भी मेरी प्रार्थना है बैंड-बाजा आए।

चलिए, आपकी बात रहेगी। ’शेष हमें कुछ नहीं चाहिए।रमे’श कुमार ने निर्णयात्मक स्वर में कह दिया।

और हमारी कोई माँग नहीं है। आपने जो देना है अपनी बेटी को देना है।” - कृष्णा ने कहा वैसे हमारे में सब भाई-बहन के कपड़े होते हैं। सभी रि’श्तेदारों ...अभी कृष्णा इससे आगे कुछ कहती कि देव ने तनिक आवे’श में कहा – कुछ नहीं होता हमारे में। न भाई-बहन का, न मेरा, न ही किसी रि’श्तेदार का।

फिर माँ के आमुख होकर बोला – मम्मी! आप समझती क्यों नहीं मुझे।..... मुझे कोई भी लेन-देन, दिखावा पसन्द नहीं है।

देव की बात सुनकर पन्नालाल व निर्मला को महसूस हुआ कि देव के शब्दों में कठोरता थी - अडि़ग थे शब्द उसके – जिन्हें कोई न बदल सका। और माँ अब खिसिया-सी गई, बोली, “मेरा ऐसा तो मतलब न था। बहन जी ने पूछा मैंने कहा।

ऐसा कहना और जताना एक ही बात है। माँ! इन बातों को रिश्तों के बीच न लाइए।देव ने कुछ इस तरह कहा कि जैसे ’शारा किया हो उसने इस बात को यहीं समाप्त करने का।

तब रमे’श कुमार ने समझदारी दिखाई और मालती को कहा- भई, खाने की तैयारी करो।

नहीं-नहीं, रमे जी, हम खाना नहीं खाएँगे।

खाना क्यों नहीं खाएँगे। आप तो इन पुरानी विचार धाराओं को न अपनाइए।

नहीं ऐसी बात नहीं।

तो फिर संकोच काहे का। अब यदि आपका घर हमारा है तो हमारा घर भी आप ही का है। इस रि’श्ते में संकोच नहीं होना चाहिए।

खाने के पश्चात पन्नालाल व निर्मला देहरादून लौटना चाहते थे। लेकिन सभी ने आग्रहपूर्वक उन्हें रोक लिया। निर्मला की भी चाह थी कि दिल्ली आई है तो बच्चों के लिए कुछ लेती जाए। उसके मन की बात जैसे अमित ने पढ़ ली हो। शाम की चाय के दौरान उसी ने कहा था, ‘‘आँटी आप बोर हो रही हैं, मन है तो चलिए आपको बाजार तक घुमा लाऊँ।

निर्मला ने देखा उसकी ओर। खु’श हुई। अच्छा लड़का है, उसके मन की बात समझ गया है। वैसे वह संकोची स्वभाव की थी। तभी तो कृष्णा से अधिक बात नहीं कर सकी थी अभी तक।

घर से बाहर आकर उसे बातें करने की अपेक्षा बातें सुनने में मजा आता था। जब भी घर से बाहर जाती थी ढ़ेर-सी बातें सुनकर ही आती थी और घर लौटकर सभी बच्चों को एक कहानी की तरह पिरो कर वही बातें सुनाती थी। तभी सभी बच्चे माँ की प्रतीक्षा में आँखें बिछाए बैठे रहते थे। माँ के बिना घर सभी को सूना लगता था।

‘‘जाना तो चाहती हूँ बेटा, यदि तुम्हें तकलीफ न हो।’’ – कुछ संकोच भरे लहजे में कहा निर्मला ने।

‘‘तो फिर उठिए, तैयार हो जाईए। अभी चलते हैं।’’ – अमित को जैसे मुँह मांगी मुराद मिल गई। लेकिन कृष्णा को यह सब अच्छा नहीं लगा। शायद वह चाहती थी कि निर्मला के साथ वह बाजार जाए। लेकिन वह ऐसा कुछ नहीं कहना चाहती थी कि जिससे देव नाराज हो जाए। देव का स्वभाव ही कुछ ऐसा था कि शुरू से ही घर में उससे या उसके सामने कोई भी अधिक नहीं बोलता था। ऐसे में कृष्णा को मन-मसोस कर रह जाना पड़ा।

अमित कुछ ही देर में तैयार होकर अपनी मोटर साइकिल पर निर्मला को बिठा कर कमला-नगर की तरफ चल दिया। वह निर्मला पर अपना अच्छा प्रभाव डालना चाह रहा था। उसकी हार्दिक इच्छा थी कि निर्मला उससे उसके बारे में कुछ पूछे उसके व्यापार के बारे में पूछे। ताकि वह उसे प्रभावित कर सके। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। निर्मला बाजार में घूमते हुए उसे बताती रही - कि वह क्या कुछ लेना चाह रही है। अमित उसकी जरूरत

के अनुसार किसी न किसी दुकान पर उसे लेकर जा रहा था।

निर्मला ने प्रिया के लिए एक स्वेटर, रजनी के लिए एक शाल, गीता के लिए एक जोड़ी सैंडल और प्रेम के लिए एक सिल्क की कमीज खरीदी। अमित ने उसे प्रिया की स्वेटर चुनने में अधिक रुची दिखाई, निर्मला ने भी ऐसा महसूस किया।

.......

सब हँस रहे थे, खिलखिलाकर। - रमे’श, देव, प्रमोद और अमित।

ड्राईंग रूम में बैठे थे सभी। सामने सभी के गिलास पड़े़ थे। व्हिस्की से भरे। देव के विवाह के शुभ महूर्त की खु’शी मना रहे थे वे सब। देव को महसूस हो रहा था उसके तनाव की घड़ियाँ,

अकेलेपन के सभी क्षण अब समाप्त होने जा रहे हैं। व्यावहारिक-जीवन में जो-जो मु’श्किलें उसके सामने थीं, वे सब अब उसे लग रहा था न के बराबर रह जाएँगी एक साथी के आ जाने से। इसी खुशी में आज उसने भी जी भर के पीने की ठान रखी थी। उसने ही क्या, सभी आज ढ़ेर सारी पीना चाह रहे थे। बाहर मौसम में ठंडक थी और भीतर बैठे इन सभी के ’शरीरों को शराब के घूँट गर्म किए जा रहे थे। कमरे के एक कोने में रिकार्ड-प्लेयर बज रहा था।

अमित का आधा ध्यान सबकी बातों में और आधा ध्यान रिकॉर्ड-प्लेयर की ओर था। जब-जब रिकार्ड समाप्त होता, वह झट से उठकर बदल देता था, अपनी पसन्द का सुनने के लिए। इस बार जब रिकॉर्ड खत्म हुआ तो प्रमोद बोला अमित से – अब ये हल्के गाने-गजल छोड़ो, अमित! कोई भड़कीला गाना लगाओ। वो है न तुम्हारे पास रिकार्ड इरप्शनवही लगाओ।“ - प्रमोद नशे में झूम रहा था, “वन वे टिकिट मैं नाचूँगा आज।और अमित ने अभी रिकार्ड लगाया भी न था कि वह अपनी कुर्सी से खड़ा होकर अपने मन की धुन पर थिरकने लगा था। अमित ने रैक से उसकी पसन्द का रिकार्ड निकाल कर लगा दिया। फास्ट करो फास्ट - हल्की आवाज़ से मजा नहीं आएगा।और अमित ने आवाज़ भी तेज कर दी। तब प्रमोद जोर-जोर से नाचने लगा था। वह नाच क्या रहा था, झूम रहा था। लेकिन इसी में उसे आनन्द आ रहा था। शेष सभी उसे ऐसा करते देख कर हँस रहे थे। तभी प्रमोद ने अमित की तरफ बढ़कर उसे भी बीच में खींचा। - चलो आओ, तुम भी मेरे साथ डांस करो। अरे - इतनी बड़ी खु’शी का दिन है आज। डॉक्टर साहब की शादी है।और वह जोर से नाचने लगा। हा-हूकी आवाज़ निकालते देख कर प्रमोद पर सभी हँस रहे थे। अमित भी उसके साथ, उसके सामने खड़ा नाच रहा था। कुछ देर तक ऐसे ही चलता रहा।

वन वे टिकिट’ – “समाप्त होते ही रमे’ ने सुईं ऊपर उठा दी और कहा प्रमोद से - ‘‘मजा आ गया। आज प्रमोद तुम्हारा बढि़या मूड़ देखकर। वैसे क्या ख्याल है अब खाने के बारे में?”

- ‘‘खाना खाएँगे, सभी खाएँगे। पहले नाचो सभी।’’  प्रमोद रिकार्ड की आवाज़ बन्द हो जाने के बावजूद नाच रहा था।

‘‘नाचेंगे भाई, पहले खाना खा लेते हैं।’’ - तब रमे ने अमित से कहा, ‘‘जाओ। भाभी से बोलो खाना लगा दें।’’

‘‘जी अच्छा।’’ और अमित उठकर बाहर रसोई घर की तरफ चला गया। तब रमेश कुमार ने रिकार्ड की सुईं नीचे कर दी और आवाज़ कम कर दी।

प्रमोद को भी देव ने अपने पास बिठा लिया था। लेकिन प्रमोद से बैठा नहीं गया। वह देव की गोद में सिर रखकर लेट गया।

‘‘आज फिट हो गया है, प्रमोद।’’ देव ने कहा और रमे’श कुमार की ओर देखने लगा।

‘‘आज खु’श है बहुत।’’ रमेश कुमार ने प्रमोद की ओर देखते हुए कहा। उसे लग रहा था प्रमोद मदहो’श है जैसे। लेकिन रमे’श की बात सुनते ही उसने अपना सिर उठाकर कहा- ‘‘खुश क्यों न होऊँ! मेरे यार की शादी पक्की हो गई है। मेरे लिए ये सबसे अच्छी खबर है। ...’’ फिर कुछ रुक कर बोला - ‘‘अब तो रोज ज’श्न चलेगा। कल मैं पार्टी दूँगा...।’’ और फिर प्रमोद ने देव के गालों को चूम लिया। वह बहुत खुश था।

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