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नई सुबह
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नई सुबह Voice and Text
     
नई सुबह से पहले (तीन)
ISBN: 81-901611-13

मित की उम्र पच्चीस के आसपास थी। कद देव की तरह लम्बा था। पूरा छः फुट। स्वास्थ्य की दृष्टि से वह इकहरे बदन का था, लेकिन काम में अत्यधिक चुस्त। घर में सबसे छोटा था, लेकिन हर बात में सबसे आगे। और घर वाले उसे रखते भी सबसे आगे थे, क्योंकि वही एक ऐसा था जो अपनी कमाई का हर पैसा बेझिझक अपने परिवार पर खर्च कर देता था। बड़े भाई उसके ऑफीसर थे, लेकिन अमित से अपनी जरूरतें पूरी करवाते थे। क्या रमे’श, क्या देव, और क्या सबसे बड़े भाई कर्नल मोहन कुमार। अमित काफी अच्छा कमा लेता था अपने व्यापार में। ठेकेदारी का धन्धा था उसका। इसीलिए अमित की घर भर में पूछ थी। और यही कारण था कि अमित आज भी देहरादून आया हुआ था।

उसे इसी से खु’शी हो जाती थी कि सभी उसका महत्व समझते हैं। पैसा तो हाथ का मैल है, किस्मत भी अच्छी है फिर खर्च करने की परवाह किसे। - शायद यही कारण था उसकी दरियादिली का और इसीलिए वह दिन दूनी रात चैगुनी तरक्की कर रहा था। उसकी तरक्की से सभी खु’श थे क्योंकि सभी की जरूरतों का वह ध्यान रखता था।

अमित बाहर ही खड़ा रहा प्रमोद के साथ जब सभी भीतर चले गए। प्रेम ने उन दोनों को भी कहा था भीतर आने को लेकिन वे अपनी बातों में इतने तल्लीन थे कि भीतर जाना भी भूल गए। प्रमोद देव का अभिन्न मित्र था। वह भी लैक्चरार था यूनिवर्सिटी में। दोनों ने एक साथ पी.एच.डी. की थी। उनकी दोस्ती की जड़ इतनी मजबूत थी कि सभी को उनसे ईष्या होती थी। देव व प्रमोद एक दूसरे के पूरक थे। और अलग-अलग रहते हुए भी यूनिवर्सिटी में कभी उन्हें किसी ने अकेले घूमते नहीं देखा। जब देखो, साथ-साथ। रात देर से ही दोनों बिछुड़ते थे। प्रमोद जबकि विवाहित था। लेकिन उसका विवाहित जीवन भी रात दस बजे के बाद शुरू होता था और सुबह दस बजे तक चलता था। इस बीच प्रमोद घर रहता था। शेष समय यूनिवर्सिटी में देव के साथ - पढ़ाना, रिसर्च व घूमना सब एक साथ। हाँ छुट्टी के दिन उन दोनों के साथ कोमल होती थी। कोमल यानि प्रमोद की पत्नी।

आज लेकिन वह नहीं आ सकी थी उनके साथ। एक तरह से मालती उसे लाना नहीं चाहती थी क्योंकि कोमल उसकी ईष्या का पात्र थी। देव की चहेती भाभी का दर्जा मालती भाभी के बजाय कोमल को जो मिला हुआ था।

सो, अमित! डॉक्टर साहब आज बंध गए।प्रमोद ने अमित के कन्धे पर अपने हाथ टिकाते हुए कहा। वह देव को हमे’शा डॉक्टर साहबकहता था।

हाँ, और अब शादी भी जल्दी हो जानी चाहिए।अमित भी खु’श था। खु’श इसलिए कि उसने एक अर्से बाद देव को खु’श देखा था। देव फालतू बोलता भी कहाँ था। घर भर में थोड़ी रमे’श कुमार के साथ बात करता था, वह भी जब वह छुट्टी आता था और थोड़ी बहुत बात-चीत अमित के साथ करता था। शेष समय घर में भी अपनी किताबों में तल्लीन रहता था। अमित के साथ वह थोड़ा घनिष्ट हुआ था अपनी बीमारी के दौरान। तब देव ने पाया कि अमित ने उसके कष्ट के पल को उसके साथ सहा है।

देव महीना भर अस्पताल रहा, तब भी अमित रात-दिन उसके साथ रहा। उससे पहले भी देव जहाँ-जहाँ जाता था, अमित ही साये की तरह साथ जाता था। बीमारी के बाद यूनिवर्सिटी तक भी अमित देव को छोड़ने जाता रहा। इसी कारण देव अमित को प्रमोद के बराबर पाता था।

अमित अभी प्रमोद से कुछ और कहने ही जा रहा था कि उसकी निगाहें बाहर गेट की तरफ उठ गईं। सामने से एक लड़की आ रही थी। अमित उस लड़की को एकटक देखता रह गया। आहा! कितनी सुन्दर है यह लड़की। अमित ने उसे अपनी आँखों में उतारा। प्रमोद की उपस्थिति में उसने उस लड़की से नजरें चुरा लीं। लेकिन तब तक प्रमोद भी उस लड़की को देख चुका था।

‘‘अमित कुमार जी। कहाँ खो गए हैं। उसने अमित की मनःस्थिति भी भाँप ली थी।’’ लेकिन अमित ने एकदम नकारात्मक स्वर में कहा धीरे से - कहीं भी नहीं- किसी को देखना गुनाह तो नहीं।’’

‘‘हर किसी का देखने का अन्दाज अलग होता है।’’ - प्रमोद ने फिर हल्के लहजे में कहा। वह लड़की तब तक भीतर जा चुकी थी।

‘‘चलो, हम भी अन्दर चलते हैं।’’ प्रमोद ने कहा और भीतर जाने को हुआ।

‘‘अभी रुक जाओ।’’ अमित के मन में चोर था जिसको प्रकट कर ही बैठा वह।

‘‘क्यों? कहीं वह लड़की यह न समझ ले कि तुम उसके पीछे-पीछे भीतर आए हो।’’ प्रमोद ने उसके मन की बात कह दी।

फिर बोला -‘‘पागल! देख लो, जान लो किसकी सहेली है। अच्छी लगी तो काम बड़ी आसानी से बन जाएगा।’’

और प्रमोद के साथ अमित को भी भीतर जाना पड़ा। तब तक उस लड़की का देव से परिचय हो चुका था और वह देव के पास बैठी थी। उन दोनों के भीतर जाते ही देव ने उनको उस लड़की का परिचय दिया कि वह वीणा की छोटी बहन है प्रेम से छोटी और गीता से बड़ी प्रिया।

प्रिया! प्रिया!अमित के मन ने आवाज़ लगाई। उसकी प्रिया! उसने प्रिया की तरफ पलभर के लिए देखा - वह तब हँस रही थी खिलखिलाकर गीता की कोई बात सुनकर।

अमित ने उसी खिलखिलाहट को मन में बिठा लिया। देव वहाँ से बंध कर जा रहा था और अमित किसी को मन में बिठा कर। कविता की पक्तियाँ बनाकर गुनगुना रहा था अमित।

‘‘बिना बात किए, मुलाकात किए पलकों में कौन बस जाता है आँखों में सपने बन कर कौन रात-रात मुस्काता है।’’

घर भर में हर कोई खु’ था वीणा की शादी पक्की हो जाने की खबर सुनकर। एक महीने में ही सब कुछ होने जा रहा था। अभी आठ दिन पहले तो बात पक्की हुई थी और आज तारीख भी निकाल ली थी। बीस दिन बाद वीणा की शादी थी। लड़के

वाले तो चाहते थे और भी जल्दी हो जाए लेकिन पन्नालाल के लिए यह इतना सरल नहीं लग रहा था। उन्हें लग रहा था कि ढ़ेर-सी तैयारियाँ करनी हैं वह सब वे बीस दिन में कैसे पूरी कर सकेंगे। लड़के वालों ने उन्हें वि’श्वास दिलाया था कि उन्हें किसी चीज़ की आवश्यकता नहीं है। वे सिर्फ लड़की चाहते हैं – सिर्फ अपने लड़के की दुल्हन। - न बैंड-बाजा, न बारात, बस सादगी से विवाह।

लेकिन निर्मला ने इस पर एतराज किया था। सुनीता की शादी तो उन्हें बिलासपुर जाकर करनी पड़ी थी, इसलिए उनके कई शौक पूरे हुए बिना रह गए थे। वीणा की शादी में वह पूरा धूम-धड़ाका देखने की लालसा लिए थी। उन्हें बुरी नहीं लगी यह बात कि लड़के वाले बारात लेकर नहीं आएँगे। उन्हें केवल यही अखरा कि चाहे वे घर के लोग ही आएँ लेकिन बैंड-बाजा जरूर साथ हो, बारात जरूर सजे, इतनी ही सादगी से हो यह विवाह!

हाँ, वीणा की शादी होनी थी इस घर में। नए घर की पहली शादी। यह घर पन्नालाल ने लिया था अपने रिटायर हो जाने के बाद। जब यह तय हो गया था कि वे अब परिवार सहित देहरादून ही सैटल होंगे। शुरू से ही बच्चों की ’शिक्षा यहीं हुई थी। नौकरी के दौरान उन्हें दूर-दूर रहना पड़ा अपने परिवार से लेकिन निर्मला बच्चों के प्रति माँ-बाप दोनों का कर्तव्य यहाँ रह कर निभाती रही।

ढ़ेर-सी कठिनाईयाँ आईं उनकी राह में, लेकिन सब का सामना करने का साहस वह जुटाती रहीं। बंधी हुई आय में अपने परिवार का खर्च चलाया बड़े सुचारु रूप से निर्मला ने।

उसकी साध थी उसके सब बच्चे अच्छी ’शिक्षा ग्रहण करें उसी के लिए उसने अपने सब शौक अपने से दूर रखे। बचपन में बहुत शौक थे निर्मला के। घर भर की इकलौती लड़की। पिता की ढ़ेर सारी जमीन जायदाद। किसी चीज़ की घर में कमी नहीं थी। दिन-भर इधर से उधर घूमती रहती। जो

फरमाईश करती कभी माँ, कभी पिता, कभी बड़े भाई पूरी करने को आतुर रहते। शक्ल से जितनी सुन्दर थी, अक्ल भी उतनी ही अच्छी पाई थी उसने। पढ़ने में भी बड़ी तेज थी। लेकिन यह सब का सब बदल गया एकदम। पिता नहीं रहे। चल बसे एकाएक बीमारी में। घर की आमदनी रुक गई। जो थोड़ी बहुत आय थी उसमें माँ ने अपना पेट काटकर बच्चों को पढ़ाना जारी रखा।

लेकिन बलि का बकरा बनी निर्मला। बच्चों में लड़कों की पढ़ाई ज्यादा जरूरी समझकर, उसकी पढ़ाई रोक दी गई छठी कक्षा के बाद। बहुत रोई थी निर्मला। उसके शिक्षक भी घर पर चलकर आये थे। यही कहने कि उसे कस्बे में जाने दिया जाए, वे उसकी फीस माफ करवा देंगे। लेकिन माँ नहीं बता सकी उन्हें कि फीस के अलावा भी बाकी खर्चे हैं जो चार-चार बच्चों के लिए पूरे करना उनके बस की बात नहीं। निर्मला की पढ़ाई छूट गई और वह घर पर रहकर अपनी माँ के कामों में हाथ बटाने लगी। माँ ने घर रहते उसे सिलाई-कढ़ाई सब सिखा दी।

अभी एक ही वर्ष और बीता था कि माँ बीमार पड़ गई। उसके बचने की उम्मीद भी न रही। माँ को लगा वह अब नहीं बचेगी। ऐसे में उसे निर्मला की चिन्ता सताने लगी। बीमारी के साथ-साथ यही सोचकर घुलती रहती थी कि उसके बाद निर्मला का क्या होगा। लड़के तो अपने को स्वयं संभाल लेंगे लेकिन उसे कौन संभालेगा। और ऐसे में माँ को एक ही रास्ता सुझाई दिया - निर्मला का विवाह। अभी वह पन्द्रह साल की थी, लेकिन समय के लिहाज से वह उम्र विवाह योग्य ही थी। और ऐसे में पन्नालाल का रि’श्ता आया। वह विधुर था। उम्र में निर्मला से पन्द्रह वर्ष बड़ा। लेकिन माँ ने ऐसा कुछ नहीं सोचा। अपनी बेटी के योग्य वर माना उसे, वह वक्त नहीं गंवाना चाहती थी और न ही और अच्छा परिवार उसके सामर्थ्य में था - बस झटपट शादी रचा दी उसने निर्मला की।

पहले-पहल तो निर्मला को बहुत अटपटा लगा था, लेकिन जल्द ही उसके कि’शोरामन ने एक प्रौढ़ का रूप धारण कर लिया था। पन्नालाल भी उसका बहुत ध्यान रखता था। समय के साथ-साथ उसकी सन्तानें हुईं। तब निर्मला को लगा कि वह अपने बचपन के सपने इन सन्तानों के माध्यम से पूरा करेगी। उसकी माँ उसे नहीं पढ़ा सकी लेकिन वह अपनी लड़कियों को खूब पढ़ाएगी। वह जो करना चाहेंगी, उसके लिए हर साधन जुटाएगी। चाहे उसे भूखे क्यों न रहना पड़े।

इसीलिए पन्नालाल की तनख्वाह का मुख्य भाग तो बच्चों की पढ़ाई में और दूसरी जरूरतें पूरी करने में चला जाता था। लेकिन निर्मला के संयम और आत्मविश्वास का उसके बच्चों पर भी असर पड़ा। किसी पर भी समय के बदलते स्वरूप का असर नहीं पड़ा। सभी को अपनी सीमित आर्थिक द’शा का ज्ञान था और किसी ने माँ को किसी बात के लिए परे’शान नहीं किया।

ऐसे में पन्नालाल जब रिटायर होने को आए तब तक केवल सुनीता का ही विवाह हो सका था। हाँ वीणा और रजनी अपनी पढ़ाई पूरी करके केन्द्रिय विद्यालय में अध्यापिकाएँ लग चुकी थीं। और तब पन्नालाल ने निर्मला के जोर देने पर अपनी बच्चियों की शादी की चिन्ता के बदले रिटायरमेन्ट पर मिली ग्रेचयुटी की रकम से देहरादून में अपने लिए एक अच्छा सा मकान ले लिया।

निर्मला का एक वर्षों से संजोया स्वप्न पूरा हो गया। बच्चों को भी अपने नए घर में जाने की खु’शी थी। पन्नालाल रिटायर होने के बाद घर नहीं बैठा। उसने एक लोकल फर्म में नौकरी कर ली थी। घर की जरूरतें सभी पहले से ही सीमित थीं और उसकी तनख्वाह से घर भर का खर्च चल रहा था।

वीणा व रजनी दोनों की तनख्वाह बैंक में जाती थी। हाँ दोनों बहनें अपनी छोटी बहनों की सभी जरूरतों का ध्यान रखती थीं। प्रेम इस बीच बी.एस.सी. पूरी करके फौज में भर्ती हो गया था। अभी लेफ्टिनेंट था। जो कुछ भी बचता था वह माँ को सौंप देता था। ऐसे में वीणा की शादी की अधिक चिन्ता नहीं थी निर्मला को। उसने अपने लिए अच्छी रकम जोड़ ली थी और साथ में लड़का भी ऐसा मिला था जिसकी कोई माँग नहीं थी।

शादी सादगी से होनी थी, लेकिन निर्मला अपने पहचान वाले सभी लोगों को आमन्त्रित करना चाहती थी। घर में एक तड़क-भड़क का उत्सव मनाना चाहती थी। इसीलिए उसने लड़के वालों को कहा था बैंड-बाजे के साथ आने को।

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