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नई सुबह
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नई सुबह Voice and Text
     
नई सुबह से पहले (दो)
ISBN: 81-901611-13

वीणा देख रही थी विज्ञापन। अखबार में। अलग कमरे में बैठ कर देखती थी। इसलिए नहीं कि शादी के बिना उसे अब अच्छा नहीं लगता था। बल्कि इसलिए कि वह अपने माता-पिता की चिन्ता मिटाना चाहती थी। छोटी बहन रजनी का रिश्ता पक्का हो चुका था। घर वाले चाह कर भी रि’श्ता न ठुकरा सके। पाँच बेटियाँ थीं। एक सुनीता का विवाह ही हुआ था। उम्र में दो वर्ष का अन्तर था सबके, लेकिन वीणा थी कि उसे कोई पसन्द नहीं आता था। कहीं न कहीं उसे कोई कमी खटक जाती थी और इसीलिए वह ‘हाँ’ नहीं कहती थी। निर्मला भी तंग आ चुकी थी।

आखिर हर माँ की चाहत होती है कि वह अपनी पुत्री के लिए अच्छे से अच्छा वर तला’श करे। लेकिन वीणा के मामले में उसे लगने लगा था कि उसकी पसन्द कदापि भी वीणा की पसन्द नहीं हो सकती। ऐसे में वीणा की मानकर उन्होंने रजनी के रि’श्ते वालों से यही वायदा लिया था कि शादी पहले वीणा की करेंगे बस जैसे भी हो उन्हें साल-छः महीने प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। लड़के की पसन्द थी रजनी। सबने ‘हाँ’ कर दी। ऐसे में माँ को वीणा की चिन्ता सताए रहती थी इसीलिए उसने एक दिन वीणा को कह दिया था, गुस्से में, खीजते हुए - ”तुम्हारे लिए तुम्हारे सपनों का राजकुमार तो अब ढूँढ़ना मुझे टेढ़ी खीर लगता है। स्वयं ढूँढ़ कर बताओ तब मानूँ।“ इस पर वीणा कुछ बोली न थी। मन ही मन उसने कुछ ठान लिया था। इसी का परिणाम था कि हर रविवार को वह अखबार में वैवाहिक काॅलम को ध्यान से देखती और स्वयं अपने पिता की तरफ से पत्र लिख देती थी।

उस दिन भी वह देख रही थी विज्ञापन और ऐसे में ही एक विज्ञापन पर उसकी दृष्टि पड़ी। लिखा था - "Match for Ph.D. 32, 175 cms. Lecturer in Delhi University operated for Sigmoid Clostomy Simple Early Marriage, Reply Box………" वीणा ने महसूस किया कि वर अच्छा है। उसकी स्वयं की उम्र 28 थी। चार वर्ष का अन्तर तो कोई अधिक नहीं होता और आॅपरेशन की बात उसे कुछ महत्वपूर्ण नहीं लगी। न ही उसने किसी से जानने की कोशिश की कि यह आॅपरेशन किस चीज़ का होता है। उसने कागज कलम उठाई और लिखने बैठ गई। पत्र लिखते समय उसके दिल की धड़कन बढ़ गई थी। न जाने क्यों उसे लग रहा था कि वह उसके लिए सुयोग्य वर साबित होगा। वह स्वयं शिक्षिका थी - प्राईमरी स्कूल में और काॅलेज का लैक्चरार उसे अपने लिए अच्छा लगा। मन से भी वह किसी ऐसे वर की चाह करती थी। न उसे कोई व्यापारी पसन्द था, न ही उसके परिवार को। सभी पढ़े-लिखे थे और व्यापार करने वाले को अपने योग्य नहीं मानते थे। आखिर कई लोग हैं दुनिया में जो पैसे को प्राथमिकता नहीं देते। वीणा तो यही समझती थी कि पैसा स्वयं आ जाता है यदि व्यक्ति शिक्षित हो, सुलझा हुआ हो।

नौकरी करने वालों की जीवन चर्या अधिक अच्छी होती है, व्यापार करने वालों की अपेक्षा। क्योंकि व्यापार में अच्छे-बुरे दिन सभी देखने को मिल सकते हैं। नौकरी में बंधी-बंधाई आमदनी में जीने की कला स्वयं आ जाती है। पत्र लिखकर वीणा ने एक बार फिर पढ़ा। सन्तुष्ट हो गई । एकाएक न जाने क्या विचार आया मन में कि उठकर जल्दी से अपने पर्स में से अपनी एक फोटो निकाल लाई और उसे भी पत्र के साथ लिफाफे में बन्द कर दिया। कुछ देर वह लिफाफे को देखती रही, फिर कुछ सोचकर मुस्कुराई और उस पर अपना पता लिख दिया। पहले वीणा पत्र लिखने के बाद अपने पिता को दे दिया करती थी। वही लिफाफे में बन्द करके उसे डाक में डाल आया करते थे। लेकिन न जाने क्यों उसे आज किसी को भी कुछ भी बताने का मन नहीं हुआ। चुपचाप पत्र बन्द करके उसने पर्स में डाल लिया। यही सोचकर कि अगले दिन स्कूल जाते समय वह स्वयं उसे डाक में डाल देगी। वैसे भी रविवार के दिन डाक तो निकलती नहीं।

वीणा आज अपने मन को हल्का महसूस कर रही थी। कई बार उसका मन हुआ कि वह रजनी को बता दे। निर्मला को बता दे। लेकिन वह चुप रही। कहीं कोई मीन-मेख निकालने लगा पहले की तरह तो? - ऐसे में वह अपना मूड़ खराब नहीं करना चाहती थी। आखिर शादी उसे अपनी पसन्द के पुरुष से करनी थी और यही उसे अपनी पसन्द का लग रहा था।

आज डाक में एक बड़ा सा पैकेट आया देखकर अमित ने झपटकर उसे उठा लिया था। वह देव के वैवाहिक विज्ञापन के संदर्भ में आए पत्रों का पैकेट था जो कि हिन्दुस्तान टाइम्स वालों ने भेजा था। पहले तो अमित का मन हुआ कि उसे वह वहीं खोल ले। लेकिन फिर उसे ठीक नहीं लगा। उसे लेकर वह रमेश के पास चला गया।

रमेश उसके हाथ में पैकेट देखते ही बोला - ”लाओ, लाओ इन्हीं की प्रतीक्षा थी।“ और वह उठ कर बैठ गया। देव तब यूनिवर्सिटी गया हुआ था। अमित पैकेट रमेश कुमार को थमा कर स्वयं वहीं बैठ गया। एक-एक करके सभी पत्र रमेश ने देखे। अमित भी सभी देखे जा रहा था। कुल लगभग पचास पत्र थे। उसमें से केवल पाँच पत्र अलग किए थे रमेश ने। अमित ने उनमें से एक पत्र उठा लिया। उसमें फोटो भी था। लड़की देखने में अच्छी लग रही थी। पत्र एक बार दुबारा पढ़ा उसने। फिर अपनी राय जाहिर करने के लिए उसने मुँह खोला ही था कि रमे’श ने कहना शुरू कर दिया, ”लोगों को जरा भी अक्ल नहीं है। साफ-साफ लिखा था। विज्ञापन में आॅपरेशन के बारे में। कोई लिखता है - Sigmoid Clostomy क्या चीज़ होती है। कोई लिखता है कि क्या लड़के ने इस विषय में पी.एच.डी. की है। कोई क्या लिखता है, कोई क्या। एक यही पत्र है बस जिसमें इस लड़की का चित्र है - इसके पिता ने एक भी प्रश्न नहीं किया। - सुलझा हुआ लगता है यह व्यक्ति। जब आप एक बात खोल दें तो अधिक सवाल-जवाब करने से बेहतर है स्वयं ही जानकारी हासिल कर ली जाए।“ - रमेश को जैसे वह लड़की भी भा गई थी, ऐसा लग रहा था उसके शब्दों से, ”वैसे भी यह व्यक्ति अच्छी पोस्ट से रिटायर हुआ है। सभी बच्चे पढ़े-लिखे हैं। कोई एम.एस.सी. है कोई बी.एस.सी. में पढ़ रहा है। स्वयं अच्छे सरकारी पद से रिटायर हुआ है। विज्ञान कितनी तरक्की कर चुका है। ऐसी बातें तो अब आम चीज़ हैं।“

तभी लगा देव आ गया है। रमेश ने उसे अपने कमरे में बुला लिया। देव भी समझ गया था पत्र आए हैं तभी बुलाया है। आकर बैठ गया। रमेश ने उसे देखते हुए कहा - ”पचास के करीब पत्र हैं उनमें से मुझे केवल एक पत्र ठीक लगा है। साथ में लड़की का फोटो भी है। तुम देख लो। वे लोग देहरादून रहते हैं। लड़की एम.ए. बी.एड. है। टीचर है केन्द्रिय विद्यालय में। सारी फेमिली पढ़ी-लिखी है। सुन्दर भी है।’’ रमेश जैसे आश्वस्त हो चुका था। देव ने फोटो देखा। अच्छा था। पत्र पर सरसरी निगाह डाली।

बोला - ”आॅपरे’शन के बारे में कुछ नहीं पूछा?“

”अरे भाई पढ़े-लिखे हैं। जो बात पहले कह दी विज्ञापन में साफ लिखा है। वह उससे ही समझ गए हैं।“ - रमेश कुमार ने अपने विचार प्रकट किए।

”लेकिन हमें फिर भी खुलासा करना चाहिए।“ देव ने अपनी इच्छा जाहिर की। लेकिन स्वर उसका भी दबा हुआ था। यानि उसको भी लड़की अच्छी लगी थी। अपने अनुकूल और रमेश को लगा वह चाहता है, यहीं बात बन जाए। ”हाँ, सब खुलासा कर लूँगा मैं स्वयं। आज ही पत्र लिख देता हूँ। साथ ही लिख दूँगा आॅपरेशन के विषय में कुछ और पूछना हो तो बताएँ।“ - रमेश ने कहा।

”बेहतर होगा यदि आप आॅपरेशन के विषय में विस्तार से लिखेंगे।“ देव ने फिर कहा।

रमेश तब थोड़ा और गम्भीर हो गया। उसने देव को समझाने के लहजे में कहा, ”देखो देव! मैंने दुनिया देखी है। जितना हम किसी बात को तूल देंगे उतना ही दूसरों का शक बढ़ जाएगा। और यह शक बढ़े, ऐसा मैं नहीं चाहता। फिर भी तुम चाहते हो तो मैं लिख दूँगा। ऐसे नाजुक मामलों में दूसरों की मान लेनी चाहिए।“

”सब ठीक है। आप लिख दें और जब देहरादून जाएँगे मैं स्वयं बता दूँगा।“ देव ने अपना निर्णय सुनाया। ”नहीं तुम कुछ नहीं कहोगे, ऐसा वायदा करो। सारी बात मैं स्वयं करूँगा। मैं बड़ा भाई हूँ तुम्हारा। यह मेरा फर्ज भी है और मुझे कहने का ढंग भी आता है।“ फिर कहा, ”तुम्हें लड़की पसन्द है मैं अभी लिख रहा हूँ विस्तार से। वि’श्वास न हो तो पढ़ लेना। और वहाँ भी सब बात मैं करूँगा लेकिन स्वयं सारी स्थिति समझ कर।“

‘‘मुझे पढ़ने की जरूरत नहीं। आपने कह दिया इतना ही काफी है। फिर उठने का उपक्रम करते हुए देव बोला, अब अपने कमरे में जाता हूँ। थोड़ा आराम कर लूँ।’’ - यह कहकर देव अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। रमेश कुमार ने राहत की साँस ली। जैसे उसके मन से कोई बोझ उतर गया हो। देव के साथ-साथ अमित भी चला गया। तब रमेश कुमार ने पत्र लिखना शुरू किया।

देहरादून में पन्नालाल के नाम। उसकी लड़की वीणा के सम्बन्ध के लिए। देव के सम्बन्ध में विस्तृत रूप से आॅपरेशन का लिखने लगे, फिर हाथ रोक लिया। साथ में मालती भी बैठी थी जो अभी तक चुपचाप स्वेटर बुनती हुई भाईयों का वार्तालाप सुन रही थी। रमे’श ने उसकी ओर देखते हुए कुछ सोचना शुरू कर दिया।

”क्या सोच रहे हो?“ - मालती ने पूछा, जब उसने देखा कि रमेश उसी को देखते हुए कुछ सोच रहा है।

”सोच रहा हूँ, लिखूँ कि नहीं?“

”क्या लिखूँ कि नहीं? - मालती ने प्रश्न किया।

तब रमेश कुमार ने कहा - ”यही आॅपरेशन के बारे में देव के।“ फिर स्वयं राय भी दे दी। - ”सोच रहा हूँ लिखने का कोई फायदा नहीं। इतना भर लिख देता हूँ कि लड़के के आॅपरेशन के बारे में और अधिक पूछना है तो बेझिझक पूछ सकते हैं।“ ”और जब वहाँ जाओगे तब?“ मालती ने आगे की बात सोची। ”तब का तब देख लूँगा। अभी जवाब तो आने दो।“ - रमेश ने अभी आगे की बात टाल दी।

”देख लो! जैसी तुम्हारी मर्जी।“ - मालती तटस्थ भाव लिए बोली, ‘‘यह तुम भाईयों का मामला है, इसमें मैं राय नहीं देना चाहती।’’ ”मर्जी तो ऊपर वाले की है। को’शिश करना हमारा कर्तव्य है भाई।“ और यह कह कर रमेश कुमार ने पत्र वहीं समाप्त कर दिया। लिफाफे में बन्द करके उसने अमित को आवाज़ लगाई और पत्र डाल आने के लिए दे दिया। जब अपने किसी के दर्द का प्रश्न हो तो मन सब कुछ छिपाना चाहता है। देव का आॅपरेशन आज कोई महत्व नहीं रख रहा था। किसी के लिए भी। वह बिल्कुल ठीक है। देव इतना अपना है, उसे उन्हें फिर से तो नहीं अपनाना। अपनाना है किसी दूसरे परिवार ने। दो परिवारों से निकलकर एक नए परिवार का जन्म होता है, ’शादी के बाद। यह परिवार कैसा होगा, कल कुछ और हो गया तो इस नए परिवार का क्या होगा। इसकी किसी को चिन्ता नहीं। आज यह परिवार बस जाए। उससे आगे कोई नहीं सोचना चाहता।

पत्र का जवाब भी चन्द दिनों में आ गया। पन्नालाल ने उन्हें देहरादून आकर लड़की देखने का निमन्त्रण दिया था। हाँ, यह बात अमित ने जरूर नोट कर ली थी कि पहले पत्र की हस्तलिपि और इस पत्र की हस्तलिपि में अन्तर था। तब उसने हँसते हुए कहा था रमेशा को ”लगता है पहला पत्र लड़की ने स्वयं लिखा था अपने पिता की तरफ से और इस बार उसके पिता ने लिखा है स्वयं।“ और वास्तविकता भी यही थी। लेकिन यह कोई असाधारण बात नहीं थी कि बहस छिड़ती। सबने आने वाले रविवार को देहरादून जाने का प्रोग्राम बना लिया। और इसी आशय की तार रमेश कुमार ने देहरादून भिजवा दी।

खाना वीणा ने उन लोगों के साथ ही खाया। उसने कई बार महसूस किया कि देव रह-रह कर कनखियों से उसे देख रहा है। वह लजा-सी गई थी। कुछ अधिक नहीं बोल पाई थी। वैसे भी वह अपने काम से काम रखने वाली थी। घर में भी ज्यादा नहीं बोलती थी। सुनीता के साथ उसके सम्बन्ध सखियों जैसे थे। बस, उसी से अपने मन की बात कहती थी। और सबसे निजी बातें नहीं करती थी। घरेलू लड़की थी और स्कूल से आने के बाद सदा माँ के कामों में हाथ बँटाती थी।

घर का वातावरण भी एक सुशिक्षित मध्यम वर्गीय परिवार जैसा था। तड़क-भड़क में, ऊपरी दिखावे में कोई विश्वास नहीं रखता था। माता-पिता, भाई-भहन सभी शिक्षित थे, लेकिन सादगी से रहना सभी की विशेषता थी। माता-पिता ने शुरू से ही बच्चों को ऐसी सीख दी थी कि कभी किसी को झिड़कने की, समझाने की अवश्यकता नहीं पड़ी थी। मूक-अनुशासन में रहता हुआ परिवार आस-पड़ोस वालों के लिए सुखद उदाहरण था, इसीलिए आस-पड़ोस वालों की दृष्टि हर समय उनकी गतिविधियों पर टिकी रहती थी।

आज भी तो पड़ोस की थापा आँटी सुबह-सुबह ही बहाना बना कर उनके घर आ गई थीं। तब निर्मला ने उन्हें बता दिया कि वीणा को देखने कुछ लोग दिल्ली से आ रहे हैं और यह सुनकर मिसेज़ थापा वहीं रुक गई थी, सब थाह लेने को। इसीलिए आज रसोई में और किसी को जाने की आव’श्यकता नहीं पड़ी। निर्मला और मिसेज़ थापा ने मिलकर सारा खाना बना लिया था। और ऐसे में खाने के समय भी मिसेज़ थापा घर के सदस्यों के बीच एक सदस्य सी बनी विराजमान थीं।

देव को भी लगा कि घर के सभी बच्चे मिसेज़ थापा को कोई महत्व नहीं दे रहे हैं। हाँ, वह स्वयं खाना खाते समय निर्मला देवी को कुछ-कुछ कहती जा रही थी। और इसीलिए देव को लग रहा था कि खाने के बाद होने वाली बातों में भी मिसेज़ थापा ही पहल करेंगी। उसका अनुमान सही निकला। खाना समाप्त कर सभी बैठे हुए कोई बात करने की भूमिका बना रहे थे कि मिसेज़ थापा ने रमेश की ओर देखते हुए कहा, ”अच्छा होता यदि कपूर साहब आप अपनी राय बता देते?“ ”हाँ हाँ जरूर! यदि आपको लड़का पसन्द है तो हमें कोई भी ऐतराज नहीं है।“

”क्यों बहन जी। क्या कहना है आपको।“ मिसेज़ थापा ने सीधे सवाल किया निर्मला देवी से। जिनका उत्तर बिल्कुल सरल-सा मिला उन्हें, ”वीणा से पूछ लेती हूँ और लड़की-लड़के की राय जाननी ही ठीक है। हमें तो कोई एतराज नहीं।“

- वीणा खाना खाकर दूसरे कमरे में जा चुकी थी और निर्मला देवी उसी के पास चली गई। पन्नालाल व सुनीता भी पीछे-पीछे चले गए थे। कुछ देर नहीं लगी उन्हें लौटने में। निर्मला देवी व सुनीता प्रसन्न थीं। यानि वीणा को देव पसन्द था और देव भी हाँ कर चुका था। तब मिसेज़ थापा ने फिर से कहा - ”आप लोग दिल्ली से आए हैं।“ अच्छा होगा यदि हम लोग अभी टीका कर लें लड़के को, ताकि बात पक्की हो जाए।

"इस पर रमेश कुमार ने कहा - ”जरूर-जरूर। हम लोगों का मुँह मीठा करवा दीजिए, बस! यही काफी है। हमारे लिए यही टीका है।" उसकी यह बात सुनकर घर के सभी सदस्य प्रसन्न हो गए। तभी देव ने रमेश को आँखों ही आँखों में कुछ कहा। रमेश उसका मतलब समझकर बोला, ”अच्छा रहेगा यदि हम लोग कुछ देर लड़का-लड़की दोनों को बात करने दें।“

तब उठने का उपक्रम करते हुए उसने पन्नालाल से कहा, ”आईए गुप्ता जी, हम लोग बाहर चलते हैं।“तब प्रमोद, रमेश, अमित उठ गए। पन्नालाल व प्रेम उनके साथ बाहर आ गए बरामदे में। रमे’श धीरे से पन्नालाल को साथ लेकर एक कोने में खड़े होकर इधर-उधर की बातें करने लगा। पन्नालाल से रमेश की क्या बातें हुई। देव को नहीं मालूम।

उसे वि’श्वास था कि वह उन्हें उसकी सारी स्थिति समझा देंगे। देव स्वयं वीणा से कुछ कहना चाहता था। लेकिन बात वह किस तरह से शुरू करे, उसे समझ नहीं आ रहा था। आखिर साहस करके उसने वीणा से कहा, ‘‘आप को कुछ पूछना हो मेरे विषय में तो बेझिझक पूछ लीजिए।’’

वीणा ने पल भर सोचा फिर बोली, ‘‘आपके विषय में सब कुछ तो पता है और क्या पूछना।’ देव इतना ही पूछकर आ’श्वस्त हो गया। इस विश्वास में उसने कुछ और पूछना उचित नहीं समझा। यह एक आम कमजोरी है पुरुष की, अपनी कमी का खुलासा सरलता से नहीं कर पाता। सच को घुमा-फिरा कर कहना ही उसे अच्छा लगता है। और लड़की के मामले में यदि वह पसन्द हो तो हासिल करने में अपनी कमी छुपानी ही बेहतर समझता है।

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