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नई सुबह
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नई सुबह (दो)
ISBN: 81-901611-13

 आज का दिन एक संदेश लिए आया है वीणा के लिए| कितनी काली रातोके बाद एक नई सुबह आई है उसके जीवन में| कोई और होता तो यह सुबह उसे मदहोश कर देती, उसके जीवन की धङकने बढ चुकी होती पल-पल जैसे युग के समान बीतता महसूस होता और ढेर से सपनों केसाकार रुप की आंगन में आहट होती महसूस होती| यूँ लगता कि जीवन के नए अध्याय के साथ जैसे सब कुछ बदलने सा लगा है|

 
लेकिन वीणा के साथ ऐसा कुछ नही घट रहा था जैसे सब कुछ वह स्वयं नहीं बदलना चाह रही बल्कि उसकी नियति यही चाहती हैं| जैसे-जैसे वह अपने विवाह के लिए साङी को अपने बदन से लपेट रही थी, उसे अपने दिल की धङकन ङूबती महसूस हो रही थी| घबराहट से उसके माथे पर बार-बार पसीना आ रहा था और साङी बाँधते उसके हाथ बार-बार गलती कर रहे थे| एक मन था उसका जो कह रहा था चीख-चीख कर उसे - 'ये क्या करने जा रही हो वीणा तुम - तुमने कैसे यह सब करने को हाँ कह दी - क्या तुम भूल पाओगी अपने बीते दिन? क्या तुम भूल पाओगी देव की उस परछाई को जो तुम्हारे साथ चल रही है पिछ्ले दो वषो से? और क्या तुम भूल जाओगी वे दिन जो तुमने किसी और की चाह में - किसी और के लिए और दिन-रात अपनी खुशियो की दुआएँ माँगते बिताए थे - वीणा को कमरा घूमता महसूस हो रहा था| उसे लगा वह गिर जाएगी| अधलिपटी साङी के साथ ही वह पलंग पर बैठ गई और दोनो हाथों से उसने अपना माथा पकङ लिया| आँसू भर आए थे उसकी आंखो में| बीती बातें, बीतें दिन, उन दिनो की सब यादें रह-रहकर कचोटती हैं मन को| मन बोझिल हो चाहे, पर चुप नही रहता नए-नए चित्रअंकित करता है, मानस पटल पर| ऐसा ही वीणा के साथ हो रहा था|
 
तभी उसके कमरे का दरवाजा खुला| बड़ी बहन थी उसकी सुनीता| भीतर चली आई| वीणा को यूँ बैठे देखकर वह झट से आगे बढ़ी और बोली "ये क्या हो गया तुझे फिर से?" प्यार से उसने वीणा का चेहरा अपने हाथों में ले लिया |