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नई सुबह
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नई सुबह Voice and Text
     
नई सुबह से आगे (दो)
ISBN: 81-901611-13

 

 
 
देर से सो कर उठी प्रिया। अमित कब का उठ चुका था। अरुण के साथ सुबह की सैर करने चला गया था। वीणा तब तक अपने किचन का काम निपटा चुकी थी। सुबह की चाय पीते समय वीणा ने उसे बताया कि उनकी दिनचर्या सुबह पाँच बजे शुरु हो जाती है। सात बजे तक सुबह का नाश्ता व दिन भर का खाना तैयार करके, वह बच्चों के साथ-साथ ही काम पर निकल जाती है। बच्चे चार बजे स्कूल से लौटते हैं और वह पाँच बजे आफिस से घर आती है। अरुण पीछे से ज्यादातर घर ही रहता है। सप्ताह में एक-आध बार ही उसे बाहर जाना होता है। शेष जो कुछ भी काम है वह टेलीफोन के सहारे ही करता है। 
 
प्रिया अरुण की कहानी सुनने को इतनी उत्सुक न थी उसे तो अपनी बहन के पन्द्रह वर्षो का हिसाब जानने की उत्सुकता थी। उसने देखा, वीणा जैसे रात वाली वीणा नहीं। अब काफी तरोताजा लग रही है। रात को वह अपनी प्रिय बहन से मिलकर भावनाओं के आवेग के सामने बंधी दिख रही थी। अब वीणा जैसे उस आवेग से बाहर आ चुकी है। ऐसे में प्रिया ने सीधे शब्दों का प्रयोग करते हुए वीणा से कहा, "दीदी! जीजाजी के साथ कोई कष्ट तो नहीं आपको?" 
 
"कष्ट! कष्ट कैसा? इतना समय बीत गया। मैं और अरुण एक-दूसरे को अब पूरी तरह से पहचान चुके हैं। बच्चे हैं, मैं उन्ही के साथ व्यस्त रहती हूँ।" - वीणा ने सहज भाव से उतर दिया। 
 
"नहीं-नहीं, मेरा मतलब हैं आपको जिन्दगी के इन पन्द्रह वर्षो में कैसा लगा?" - प्रिया ने दूसरे शब्द प्रयोग किए। वह अपनी बहन के बीते दिनों को जानना चाह रही थी। 
 
वीणा ने तब कहना शुरु किया, "प्रिया! जीवन की सार्थकता तो उसी में है कि जो हो रहा होता है हमारे साथ, यदि हम उसमें सुख ही खोंजे, सुख ही देखें - तो कुछ भी बुरा नही लगता। यही मेरी आदत है शुरु से। मैं तो अपने बीते दिनों से कुछ सीखने के किए कभी-कभार याद कर लेती हूँ उन्हें। और अब मेरा एक पूरा परिवार बन गया है। बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते जा रहे है मुझे यही लगने लगा है कि मैने अब सब सुख भोग लिए हैं। अरुण से शादी के एकदम बाद पूछ लेता यदि कोई तो शायद कह देती, पहले ही अच्छा था। शादी न करती तो भी अच्छा था। लेकिन शिखा के आते ही मैं सब भूल गई। अरुण की निजी आदतें कैसी भी हो, उसने मेरे परिवार को सुखी रखने के लिए सब सहयोग दिया है। एक के बाद एक, इन तीनों बच्चों के आने के बाद तो मुझे अपने आगे-पीछे और कुछ दिखना भी बन्द हो गया। मुझे सिर्फ अपना परिवार ही दिखने लगा।" - वीणा ने अपनी बात कही। 
 
दीदी! हमें तो एक ही चिन्ता सताती रही इतने वर्ष कि आप ठीक से हैं भी या नहीं। सब आपके मन को समझते है। किसी से अपना कष्ट ना कहने की आदत से सब वाकिफ हैं और ऐसे में इतना समय बीत गया, आपने कभी आकर मिल जाने की भी नही सोची। ऐसे में सब अपनी कल्पना से, अपने-अपने तरीके से आपके पञों से हिसाब लगाते रहे। आप शादी करके ऐसी आईं यहाँ की पीछे का सब भूल गईं। वहाँ पीछे भी तो आपको याद करने वाले हैं?" - प्रिया भावुक हो चली थी। 
 
वीणा भी अपनी बहन को सब मन की बता कर सन्तुष्ट करना चाहती थी। वह बोली, "समय ने मुझे खुशी दी। परिवार दिया। मेरा अपना परिवार बन गया। मैं अपने परिवार की दिवानी हो गई। मुझे यह खुशी बड़ी मुशिकल से मिली थी। यह खुशी जो मेरी अपनी थी। मुझे अरुण की बातें, उसके अपने परिवार की बातें बहुत बोर करती थी। मुझे उसकी आर्थिक तंगी कभी नही चुभी। वह बहुत समय तक परेशान रहा। मुझे भी छोटे-छोटे बच्चो को छोड़कर काम पर जाना पड़ा। लेकिन पैसे की परेशानी को हमने कभी अपने बच्चो के पालन में आडे नही आने दिया। अपने माँ-बाप से मिले संस्कारो ने भी तो यही सिखाया था। उन्हीं के सहारे सब निभता रहा। समय हँसी-खुशी बीतता जा रहा है और अपने बच्चो के साथ इस दुनियाँ में मस्त तुम्हारी दीदी को यह भी नहीं लगता कि वह यहाँ दूसरे किसी देश में है। मेरे लिए कनाडा और देहरादून में फर्क नहीं कहीं भी।" 
 
दीदी के मनोभावो को जानकर प्रिया को खुशी हुई कि चलो, एक बात तो अच्छी है की दीदी खुश है। लेकिन अपने परिवार में मस्त दीदी अपने बीते दिनों के सब साथी भूल गई। अपने माँ-बाप को भूल गई, यह बात प्रिया को नही जँची। बोली वह, "सुनकर अच्छा लगा कि दीदी आप अपने अतीत को भूल गई। लेकिन दीदी! अतीत के दर्द को भूलाना तो ठीक लगता है अपने आज को सँवारने में आप व्यस्त हो गई, यह भी ठीक है। लेकिन वहाँ मम्मी-डैडी भी है। आपके भाई-बहन भी है। उन सबको कैसे भूल गई आप? वह तो आज भी आप से जुडे है। आज वह भी इसी परिवार के ही अंग है। उन्हें भूला देना क्या सम्भव है?" 
 
प्रिया की बात सुनकर वीणा को याद हो आई अपनी माँ। मन उड़कर पलभर में माँ के पास जा पहुँचा। आँखें नम हो आई। बोली, "माँ को कैसे भूल सकती हूँ। डैडी की भी बहुत याद आती है। तुम सबकी बहुत याद आती है। लेकिन अपने आज से लिपटी तुम्हारी बहन को उन सब यादों से लिपट-लिपट कर रोना अच्छा नहीं लगता। सब भूल जाने की कोशिश करती हूँ। इसलिए नहीं की वह याद अच्छी नही। सिर्फ इसलिए कि उन यादो से लिपट कर जीने से मैं निष्क्रिय हो जाउँगी। मैं उनमें खोकर अपने बच्चो के साथ न्याय नही कर पाउँगी। उन्हें अपनी माँ का चेहरा बुझा सा नजर आएगा। मेरे पास तो अपने परिवार को पालने के लिए माँ का मूल मन्त्र है। वही मन्ञ मुझे सब भुलाए है। मुझे माँ का वही रुप दिखता है, उस मन्त्र में जब वह हम सब भाई-बहनों को अकेले पालती थी। जब डैडी नौकरी की वजह से महीने में केवल एक-दो दिन के लिए ही घर आ पाते थे। ऐसे में माँ यदि डैडी की कमी को लेकर परेशान रहती तो क्या हमें अच्छे संस्कार दे सकती थी?" - वीणा कहे जा रही थी। शायद बहुत दिनों बाद उसे अपने मन के हर कोने में सिमटी बातें सुनने वाला कोई मिला था - "मम्मी की हिम्मत याद करके मैं और हिम्मत पाती हूँ। उन्हें भी मेरी याद आती होगी। पर चलो, उनके आसपास और सभी बेटियाँ हैं। उनसे तो मिल ही लेती होंगी।" 
 
वीणा को अब माँ बहुत याद आने लगी थी। कहने लगी वह प्रिया से, "अब तुम आए हो तो उनकी याद बहुत आ रही है। दिल कर रहा है मैं भी जाकर मिल आउँ! पर क्या करुँ? अब लगने लगा है कि स्वयं को हमें भावनाओं के घेरे में इतनी बुरी तरह नहीं जकड़ देना चाहिए कि छटपटाते हुए भी लगे, यह तो जिन्दगी का हिस्सा है! यह तो आम बात है! मेरा कर्तव्य है अपने परिवार को देखना।" - वीणा के आँसू चुपचाप बह निकले। 
 
दीदी की बात सुनकर प्रिया मन्ञमुग्ध निहारती रही कुछ देर उसें फिर बोली, दीदी। प्यार करते है सभी अपने परिवार से। अपने बच्चों से। यह कर्तव्य है हमारा। पर आप तो, मुझे लगता है, इससे आगे कुछ सोचती भी नही। अरे! आप जैसे अपने बच्चो के लिए परेशान रहती हो, वैसे मम्मी-डैडी को भी तो आपकी चिन्ता सताती है। उन्हें भी तो परेशानी होती है। वह भी तो चिन्तित रहते है। मैं तो यही कहूँगी, समय निकालकर मिल कर आओ उनसे। कैसे भी कोशिश करो। बच्चे भी साथ जाएँ आपके। मम्मी-डैडी के भी तो कितने अरमान हैं अपने इन नातियों से मिलने के! कुछ किजिए, वक्त रहते उनसे मिल कर आईए।" 
 
तब वीणा ने कहाँ, " अब बनाउँगी मैं प्रोग्राम। क्रिसमिस की छुट्टियाँ होगी बच्चों की। और मेरी नौकरी भी शायद पक्की हो जाए तब तक। नहीं होगी, तब भी बनाउँगी। लेकिन अरुण पर सब निर्भर करता है। वह कोई न कोई बहाना बना देगा, तो मन और दुःखी हो जाएगा।" 
 
"दीदी, जीजाजी अगर नही जाना चाहते, तो आप अकेले भी तो बच्चों के साथ जा सकती है।" - प्रिया ने तब कहा। "ऐसा नहीं है प्रिया! मैं अकेली भी जा सकती हूँ। पहले भी कई बार सोचा है मैने। लेकिन एकाएक कोई ऐसी बात हो जाती है कि प्रोग्राम अगले वर्ष पर जा पहुँचता है। न जाने कैसा डर है अरुण के मन में, जो अब इण्डिया जाने के नाम पर कन्नी काट जाता है। अब तो कभी-कभी कहता है, बच्चे हाई-स्कूल कर लें। उन्हें होस्टल में डालकर , हम इण्डिया ही शिफ्ट हो जाएँगे।" 
 
तब प्रिया ने कहा, "ऐसे तो वक्त बीतता जाएगा। पन्द्रह वर्ष बीत गए, दस और बीत जाएँगे। मम्मी-डैडी तो यूँ ही इन्तजार करते रहेगे। डैडीजी की ही सोचिए जरा, पिचासी वर्ष के हो चले हैं। कब तक रहेंगे इस जीवन का कुछ नही पता। वह तो कुछ बोलते नही। किसी को शिकायत नही करते। मन में मगर आप ही की सोचते रहते है। मैंने देखा है, अलमारी से कई बार वह अकेले बैठे आपकी और देव की एलबम निकाल कर तस्वीरों को निहारते रहते है। कोई आ जाए तो एकाएक कह देते हैं, फोटो पर धूल जम गई थी, साफ कर रहा था।" प्रिया की आँखो से बरबस आँसू छलक पड़े। वीणा भी अपनी रुलाई न रोक पाई। प्रिया के साथ सिसकने लगी। 
 
"मुझे डैडी की बहुत याद आ रही है, प्रिया! इतना समय बीत गया। डैडी तो बहुत बूढ़े हो चुके होंगे। मैने ऐसा कभी नहीं सोचा। मुझे तो हमेशा से मम्मी का चेहरा ही याद आया। नहीं याद किया, सच में मैंने डैडी जी को। हमारे डैडी तो सन्त हैं। अपना दर्द किसी से नही कहते। बस मन ही मन में मग्न रहते है। मन में क्या है उनके, न हम जान पाए, न ही मम्मी। हम तो मम्मी से बंधे, मम्मी की दुनियाँ में ही मस्त रहे!" और वीणा फफकती रही। 
 
बात वहीं खत्म हो गई। अरुण व अमित जो टहलने गए थे, घर लौट आए थे। वीणा व प्रिया को भावानओ में लिपटा देख कर अमित का मन भी भर आया और अरुण तो वीणा के आँसू देखकर बेचैन हो गया। वह क्यों रो रही है? यही कहता रहा बार-बार। शब्दों के बिना दर्द समझना हर किसी के बस की बात नहीं शायद! 
 
 
 
अमित की नजर बहुत तेज थी। समझने की शक्ति उससे भी तेज। अगले ही दिन उसने महसूस किया कि अरुण घर से बाहर कम ही निकलता है। यानि काम के नाम पर वह कोई काम नहीं करता। ऐसी सोच एकाएक उसे अपनी अटपटी लगी। लेकिन सोचा है कुछ, चाहे अटपटा, चाहे किसी के लिए अच्छा, किसी के लिए बुरा। अब सोचा है तो खोजना भी होगा, सोच का नतीजा जानना भी होगा। 
 
"आप की छुट्टी किस दिन होती है?" सुबह नाश्ता करते ही पूछ लिया अमित ने। 
 
"अरे भाई, अपना क्या है, फील्ड वर्क है ज्यादा। टेलीफोन पर एप्वांटमेंन्ट लेता हूँ, फिर जाता हूँ। अब अगले सात दिन के लिए सब बन्द। तुम लोग आए हो ना, ऐसे में एक सप्ताह की पूरी छुटी ले ली है। वीणा भी नही जाएगी।" - अरुण ने कहा। 
 
"अरे, अरे! ऐसा मत कीजिए। आप जरुर जाएँ काम पर।" - अमित ने उसकी बात का उतर दिया। 
 
"नहीं भाई, इसकी जरुरत नहीं। मै किसी की नौकरी नही करता। इन्श्योरेंस ऐजेंट हूँ। एक सप्ताह बाद की तारीख फिक्स कर ली हैं।" - अरुण जैसे अपना सारा वक्त उनके साथ बिताना चाहता था। 
 
"तो क्या आप घर से ही सारा काम करते है?" अमित ने पूछा "हाँ। ज्यादातर काम घर से ही होता है। बस कभी नया कोई क्लाईंट मिल जाए तो जाना पड़ता है। वरना तो सब काम फिक्स है।" अरुण ने सरल शब्दों में बताया। उसे तो शायद बातचीत शुरु करने का अवसर चाहिए था, "मै तो अब कोई नया काम करना भी नहीं चाहता। बारह साल पहले तक मैं एक इन्श्योरेंस कम्पनी में मैनेजर था। लेकिन मेरे नीचे दो-तीन गोरे मेरे खिलाफ थे। उन्होने मुझे झूँटे केस में फंसा दिया मेरी नौकरी भी गई और लाइसेंस भी कैंसिल हो गया। तीन साल लगे मुझे केस लड़ने में। मैं जीत गया। लेकिन इस बीच यही फैसला कर लिया कि नौकरी नहीं करुँगा कभी। और उसके बाद से मैं बस प्राइवेट कम्पनी के लिए काम करता हूँ। अच्छी कमीशन मिल जाती है।" - अरुण ने अपनी बात पूरी की। 
 
अमित समझ गया। दाल में कुछ काला है। यूँ ही बिना कुछ पूछे इतनी बात कह गया अरुण! वास्तविक क्या होगी, इसका खुलासा होना जरुरी था। वह पूछने लगा उससे, "आप तो मैनेजर की पोस्ट पर काम कर चुके हैं। केस भी जीत गए। अच्छी खासी रकम मिली होगी आपको हर्जाने के रुप में? यहाँ तो सुना है, यदि केस जीत जाओ तो इतना हर्जाना मिलता है कि जीवन भर काम करने की जरुरत नहीं रहती!" 
 
तब अरुण ने कहा, "मेरे केस में कुछ ऐसा नहीं था। कुछ गल्तियाँ मुझसे भी हुई थी, इसलिए हमने मिलजुल कर फैसला कर लिया, और बदले में मुझे केवल तनख्वाह और अपना लाइसेंस वापिस मिल गया। देखो, यहाँ के कायदे -कानून बहुत अजीब हैं। कभी कुछ न करने पर भी हजारों-लाखों का फायदा हो जाता है और कभी कुछ भी कर दो, तो भी आपको कोई नही पूछता।" अरुण बात बदलना चाह रहा था। अमित को भी लगा कि बात कुछ अधिक व्यक्तिगत है। अरुण से और अधिक पूछेगा तो उसे बुरा लग सकता है। इसलिए वह अरुण का विषय छोड़ वीणा से बात करने लगा। 
 
"दीदी! आप बताओ!" अमित ने कहा वीणा से। भाभी के स्थान पर दीदी शब्द का प्रयोग उसे पन्द्रह वर्ष बाद बड़ा अटपटा लग रहा था। लेकिन भाभी अब कह नहीं सकता था और दीदी से ज्यादा अपनेपन का रिश्ता अब और कोई न था "आपकी क्या दिनचर्या है?" 
 
"मैं तो अभी तक पार्ट-टाईम जाब करती हूँ। ओल्ड-ऐज होम में। बूढ़े लोगों के लिए दिन भर के खाने का सारा मीनू तैयार करना। उनकी अगले दिन की जरुरतों का ख्याल रखना ही मेरा काम है।" - उतर दिया वीणा ने। 
 
लेकिन पार्ट-टाईम क्यों? - पूछा अमित ने। 
 
"नाम के लिए। मुझे एक सप्ताह में लगभग सातों दिन जाना पड़ता है। छुट्टी होती है तो भी किसी सप्ताह के बीच के दिन। शनि-रवि को तो जरुर जाना पड़ता है। दर-असल मेरी नौकरी उसी दिन होती है जब कोई-ना-कोई स्टाफ छुट्टी पर हो। और ऐसा सप्ताह में लगभग चार दिन जरुर होता है। इसके इलावा शनि-रवि को तो जरुर जाना है।" 
 
"लेकिन फिर भी आप उसे पार्ट-टाईम क्यों कहती हैं?" - अमित ने पूछा। 
 
"क्योंकि मुझे रोज पैसे मिल जाते हैं और नौकरी का और कोई भी फायदा नही मिलता। सात साल हो गए है। अब जरुर उम्मीद लगी है कि शायद मेरी नौकरी पक्की हो जाए।" वीणा ने सहज भाव से उतर दिया। 
 
"इसका मतलब तो यह हुआ कि आप यदि कुछ दिन जाने में असमर्थ है, तो वह किसी और को चाँस दे देंगे?" - फिर पूछा अमित ने। 
 
"हाँ क्यों नही! पहली डिलीवरी के बाद मैं एक महीना नहीं जा सकी। तब मुझे फिर से काम पाने के लिए छः महीने प्रतीक्षा करनी पड़ी। बस फिर अगली दो बार तो मैं पाँचवे दिन ही काम पर चली गई।" यह शब्द कितना दर्द लिए थे, अमित व प्रिया को एकाएक लगा। वीणा अपनी, अपने परिवार की सारी कहानी इन शब्दों में पिरो गई। कह गई सारी दास्तान इन शब्दों के सहारे। 
 
एक दिन, दो दिन, सप्ताह में पाँच या छः दिन। दिनों के हिसाब से नौकरी। नौकरी करनी पड़ रही है। यह भी विवशता समझ आ गई। क्यों नही आती? रोज के रोज पैसे मिलते है। घरवाला घर बैठा है। लाईसेंस है। लेकिन जिस पर कभी केस चला हो। जिसकी नौकरी कभी केस के कारण चली गई हो और जो फैसला करके केस से छूटा हो। उस पर भला नए लोग क्यों विश्वास करेंगे? कौन करवाएगा उससे इंश्योरेंस? और तभी वीणा को काम करना पड़ता है अपनी डयूटी समझ। तभी संडे हो या मंडे, रात हो या दिन किसी भी समय उसे डयूटी पर जाना पड़ता है। तभी एक दिन में दो-दो शिफ्ट वो काम करती है। ऐसे में "मैं इण्डिया नहीं आ सकती" ही कह सकती है। यह तो नही कह सकती "मैं इण्डिया नही आ सकती, क्योंकि मुझे अपना परिवार पालना है। क्योंकि मुझे तीन-तीन बच्चों का ध्यान रखना है। क्योंकि न केवल तीन बच्चों का बल्कि अपने पति का ध्यान रखना है! जो न काम पर जाता है, न ही घर के काम में हाथ बंटाता है। बस, केवल बातें करता है। उँची-उँची बातें करता है। सपनों में रहता है। हमेशा तीस साल पीछे चला जाता है। अपने पूर्वजों की बात करता है। किसी राजा की बात करता है। उस राजा के वजीर की बात करता है। उस राजा की रानी की बात करता है। उस रानी की सौत की बात करता है। उस सौत को वह डायन का दर्जा देता है। उस डायन को वह अपनी ओर छुरी लेकर दौड़ता देखता है। और बस उसके आगे कुछ नही। वह डर कर मैदान छोड़ आया और उसने यहाँ आकर बहुत मेहनत की। बहुत-सी मेहनत की। आज वह बहुत-बड़ा बन गया है। तीन बच्चों का बाप! उनके लिए उसने बैंक-बैलेंस छोड़ दिया है। इंश्योरेंस करवा दी है। यदि उसे कुछ हो गया तो वे आसानी से पड़-लिख लेंगे। और उसने सब सोचा है, आने वाले कल के लिए। या फिर वह सोचता है बीते हुए कल के लिए! उसका आज कैसा है? उसकी उसे चिन्ता नही! क्योंकि अमित ने पाया कि अरुण आज में तो जीता ही नही। आज में तो केवल वीणा ही जीती नजर आई उसे। आज से तो वीणा ही जूझती नजर आई उसे। आज की हर जरुरत तो वीणा ही पूरी करती है। आज रोज होता है। आज रोज बीत जाता है और अरुण केवल कल की बात करता है! बीते कल की या आने वाले कल की! इसीलिए तो अमित से उसकी तकरार भी हो गई तीसरे तीन। 
 
छोटे-छोटे काटेजनुमा घर थे सभी आसपास। भारतीय मूल के लोग बहुत ही कम थे। सारे शहर की आबादी शायद दिल्ली की किसी एक कालोनी से कम होगी। जून का महीना और फूलों की बहार। जिधर देखो फूल ही फूल! गहरे रंग। प्रिया जब देखती हर बार कहती "देखो इनके रंग कितने शोख हैं। यह गुलाब देखो, यह गुलदाउदी देखो, इस डेलिए को देखो! रंग कितना खिला है!" 
 
और तब अमित कहता, "यहाँ का मौसम देखो! कितना सुहावना है! आसमान देखो! कितना साफ-स्वच्छ-निर्मल कभी देखा है क्या? ऐसा अच्छा वातावरण है तो सब सुन्दर ही होगा!" और तो और लोग बड़े मिलनसार लगे। शायद इसलिए की भीड़ दिखती नही, अपने, बहुत कम है इसलिए हर किसी को अपना बनाने की चाह में हर राहगीर उन्हें "हाय", हैलो" जरुर करता। 
 
दो दिन से यही सब हो रहा था। सुबह सब तैयार होते। नाश्ता करते। बाजार चले जाते। दिन भर "विन्डो-शापिंग या फिर कहीं कुछ पसन्द आ जाता तो खरीद लेते। अरुण गाड़ी चलाता। अमित उसके साथ बैठता और दोनो बहने व बच्चे पीछे। वीणा के बच्चे उस समय स्कूल गए होते थे। बहनों की बातें अपनी थी। बच्चे तो बस बहार का नजारा देखने मे ही मस्त रहते। उनके लिए तो यह सपनों का देश था। अमित कभी बाहर देखता कभी कुछ देखकर अरुण से जानकारी ले लेता। 
 
अरुण पहले तो बहुत उत्सुकता के साथ उन्हें बाहर ले जाने को तैयार दिखा। लेकिन बहनों ने जब तीसरे दिन का प्रोग्राम उसके सामने रखा तो वह बोला, "भई, अभी एक दिन मुझे भी चाहिए। मुझे अमित से बहुत सी बातें करनी है। मुझे उससे बहुत सी जानकारी लेनी है। ऐसे में मैं सोच रहा था कि आज का दिन घर में ही बिताया जाए। या फिर कार में बैठ आज कोई और बात ना बोले, बस, मैं बोलूँगा और आप सब सुनोगे।" 
 
एकाएक ऐसी शर्त को कोई जैसे तैयार नही था। ये क्या हुआ! वीणा ही बोली "देखिए, हमें वही करना चाहिए जो ये लोग चाहें। अगर अमित का मूड आज घूमने जाने का नहीं है या केवल आपकी ही बात सुनने का है तो हमें क्या ऐतराज हो सकता है? लेकिन रही कार में सिर्फ आपकी बात सुनने की बात तो यह बहुत कठिन शर्त है। उससे बेहतर होगा कि आज हम कहीं न जाएँ।" 
 
बच्चों का मुँह उतर गया। प्रिया-अमित तो शिष्टाचारवश कुछ न बोल सके एकाएक। कुछ देर बाद अमित ने कहा, "ऐसा करते है, अभी कहीं नहीं जाते। आज शाम को चलेंगे। जब बच्चे भी आ जाएँगे। सबको साथ लेकर कहीं डिनर करने।" 
 
"बाहर डिनर! न बाबा न, नौ लोगों की बारात का पूरा खर्चा हमारे एक महीने का बजट गड़बड़ा देगा!" एकाएक अरुण के मुँह से ऐसी बात सुनकर सब सकते में आ गए। ये क्या कह गया! 
 
वीणा का चेहरा शर्म और गुस्से से तमतमा गया। ऐसा कभी नही देखा था उन्होंने वीणा का रुप। कभी भी। एकदम से बोली, "क्या कह रहे है आप? कुछ तो समझदारी की बात कीजिए! किस बजट के बिगड़ने की बात कर रहे है आप? कितनी बार कोई प्रिय हमारा आया है जिससे हमें कुछ कष्ट हुआ हो? पहली बार मेरा कोई अपना मिलने आया है और ऐसे में आप कैसी घटिया बात कर रहे हैं?" आँसू निकल पड़े वीणा की आँखों से। बोली, "मेरे पास बहुत है अपना जो मैं अपनों पर खर्च कर सकूँ। यदि आप और बच्चे मेरे है तो प्रिया व इसका परिवार भी उतना ही मेरा है!" 
 
एकदम चुप्पी छा गई। बिल्कुल चुप्पी। अरुण को जैसे साँप सूंघ गया। ज्यादा बोलने वाला कभी-कभी ऐसी बात बोल जाता है जो उसे अपने तक ही रखनी चाहिए। इसलिए तो बडे-बुजुर्ग कह गए है, "पहले तोलो, फिर बोलो!" 
 
वीणा का एकाएक फूट पड़ना देखकर ही अमित ने महसूस किया कि धैर्यशील वीणा के मर्म को बहुत गहरे तक छू गई थी अरुण की ये बात। जो पन्द्रह वर्ष से सह रही है कितना! कुछ समझ आ रहा था, कुछ नहीं। क्योंकि वीणा तो यही कहती थी जब-तब "सब ठीक है।" लेकिन एक शब्द भी कभी-कभी किसी की पूरी जीवनी का दर्पण बन जाता है। दर्द किसी के दिल को समझने के लिए पूरे पन्द्रह वर्षो की दस्तान जानना जरुरी नहीं! 
 
"मैं तो यूँ ही कह गया। बस जुबान फिसल गई, वीणा!" इतनी जल्दी हथियार डाल देगा अरुण, आश्चर्य हुआ प्रिया को। और उसकी रुआसी आवाज सुनकर वीणा भी एकाएक पिघल गई। यह बन्धन उन्ही भावनाओं के खिलवाड़ पर ही बंधा है, अमित जान गया। वीणा भावुक है, अति भावुक उससे भी अधिक भावुक और अरुण उसकी इस कमजोरी को जानता है। इन भावनओ के घेरे में, तीन बच्चो की भावनाएँ, अपने छोटे-से घर-संसार की भावनाएँ, अरुण के प्यार के भावनाएँ, अरुण के दर्द भरे अतीत की भावनाएँ और इन भावनाओ के सागर में गोते खाती वीणा! उसे कितना प्रिय लगता है संसार यह अपना! यह अलग बात है कि अमित और प्रिया उसके इस भावनात्मक रुप के कायल थे। विरक्त थी वीणा अपने आप से कि अपनी सुध नहीं, अपने परिवार की सुध-बुध में लीन, उसी में मग्न! 
 
बात बदल गया अमित तब, "चलिए जीजा जी, हम आज चाय बनाते है और साथ पकौड़े। बाहर लान में बैठकर आराम से-सुनेंगे आपकी कहानी"।
 
और तब छोटा-सा भावनाओ का तूफान एकाएक थम गया।