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नई सुबह
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नई सुबह Voice and Text
     
नई सुबह से पहले (बाइस)
ISBN: 81-901611-13

 

 
 
"मेरी प्रिया

 

आज मुझे कुछ भी अच्छा नही लग रहा| आज मुझे हर कोई अपना दुश्मन लग रहा है| अपना ही नही तुम्हारा भी| और यह सब इसलिए कि सबके मन काले हैं, गन्दे है और सब अपनी भावनाओं की थाह रखते हुए दूसरों पर अपने दोष मढ़ देते हैं| हमें हमारी भावनाओं से, हमें हमारी जिन्दगी को ठोकर लगाकर, अपनी भावनाओं की रक्षा के लिए कुर्बानी देने को उकसाते है| 

यही कारण रहा है, मेरी प्रिया, शुरु से ही मेरी असन्तुष्टि का| तुम्हारापत्र पढ़ा तो मन हुआ मै सब से लड़ पड़ूँ - सबसे| तुम्हारी मम्मी से, सुनीता दीदी से और... और अपने बड़े भैया से| मैं समझा था प्रेम ने बात समाप्त करवा दी, लेकिन लगता है कोई है ऐसा जो इस चिंगारी को हवा देना चाहता है| मेरा मन समझाता है मुझे, आखिर मेरा उनके कहते रहने से क्या वास्ता? जिस बात को सोचने का मतलब नही, उसके लिए परेशान क्यों होना? मेरे-तुम्हारे भविष्य के निर्णायक ये नही हो सकते| और ऐसा उलटा-सीधा सोचने वालों को मैं अपने मन में कोई जगह नही दे सकता| यह ठीक है कि मुझे उनके सोचने के ढ़ंग को बदलने का कोई हक नहीं है| - तब क्या उन्हें मेरी भावनाओं को चोट पहुँचाने का कोई हक बनता है? 

मेरी जिन्दगी मेरी है और सदा मेरी रहेगी| हम-तुम दोनो मिलकर जितना हमसे हो सकेगा दूसरों को सुख देंगे - यह हमारे अपने दायरे की बात है - लेकिन हम दोनो को अलग-अलग रखकर यदि कोई निर्णय लेना चाहेगा तो यह उसकी बहुत बड़ी भूल होगी| ऐसा चाहने वाला न हमारे सुख की चाह रखता है, न किसी और की भावनाओं की थाह है उसे! 

इस सम्बन्ध में विस्तार में बात मैं तुमसे मिलने पर करुँगा| अगले इतवार को आने की कोशिश करुँगा| लेकिन अपने मन से एक उल्झन साफ कर दो कि मेरा कोई निर्णय तुम्हें अपने से अलग रखकर हो सकता है| मेरी जिन्दगी का कोई भी निर्णय होगा - वह तुम्हारे-मेरे एक समझे जाने के बाद होगा| और मैं तुम्हें अपने से अलग रखकर कोई निर्णय नही ले सकता| इसलिए ऐसा कोई निर्णय लेने का कोई प्रश्न ही नही उठता जिसमें मेरे-तुम्हारे अलगाव की बात उठे| समझीं? मेरी जिन्दगी! सब अपनी भावनाओं की कदर करते हैं, लेकिन किसीदूसरे की भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाली बात करने वाला कोई अक्लमंद नहीं| ऐसी बात मम्मी सोच सकती हैं, डैडी क्यों नही? ऐसी बात सुनीता दीदी सोच सकती है, प्रेम क्यों नही? और सबसे उपर जिसके सुख के लिए ये बात सोची जा रही थी, उस मेरी आदरणीय भाभी के मन को क्या सबने एक पशु से गिरा हुआ समझ लिया है? क्या वीणा भाभी कोई गाय है कि जब चाहे उसे किसी के हाथों सौंप दिया जाए? उस पर जो वज्रपात हुआ है उसे अलादीन के चिराग की सहायता से पल भर में दूर करने की सबने सोच ली! उसका मन, उसकी भावनाएँ जैसे कोई मायने नही रखतीं किसी के लिए| सच, तो यह है कि सभी को यह सबसे आसान रास्ता मिला था अपनी जिम्मेदारी से निबटने का| मैं पीछे देहरादून आ रहा था| फिर अपने आप सब बात समाप्त हो गई| सोचा था और विश्वास दिया गया था कि तुम तक कोई बात नही पहुँचेगी और जो कुछ जहाँ से शुरु हुआ है, वहीं आकर खत्म हो गया है| इसीलिए यह क्षणिक उलझन भी दूर हो गई थी| लेकिन मम्मी ने अपने मन में न जाने क्या बिठा रखा है, या उनके मन में न जाने क्या बिठा दिया गया है भैया-भाभी व सुनीता दीदी के द्वारा कि दूसरा कुछ सोच नहीं पा रही हैं! उनकी वास्तविक मनोदशा तुम जानती ही हो| यह ठीक है कि उनके दुःख का मै-तुम या कोई और मुकाबला नहीं कर सकता| लेकिन हम सब क्या उनके दुश्मन है? हम क्या उनके दुःख के जरा-से भी भागीदार नही? लेकिन यह तो कोई तरीका नही कि हमें चोट देकर कोई अपने दुःख की दवा लेने का प्रयत्न करे और उस पर जिसके भविष्य का निर्णय लिया जा रहा है उसकी मनोदशा का ध्यान रखे बिना! उसे शायद ऐसी बात कोई कह देगा तो वही उसका सबसे बड़ा दुश्मन बन जाएगा| उसके लिए कहा सुनीता दीदी ने, "कुछ नहीं होगा वीणा को| संभल जाएगी तो अपना लेगी अमित को| बस, अमित को कुर्बानी देनी होगी कुछ समय तक सब सहना होगा।" और मुझे उकसाने को यह कहा जाए कि "प्रिया तो वीणा के कारण अमित से बांधी है| वह अपनी बहन की खातिर उसे झट से भूल जाएगी।" - ऐसी-वैसी कई बातें हुई थीं जो बाद में निम्मी भाभी ने मुझे बताईं| यह तो प्रेम का भला हो जो उसने सारी बात संभाल ली और कड़े शब्दों में सबके मुँह बन्द कर दिए| 

मैं अपने को इनके बनाये तराजू में, जिसे इन्होंने त्याग का नाम दिया है, नहीं तोल सकता| इससे बेहतर तो मरना है| और सबसे बेहतर है अपने आप में द्रढ़ रहना - यही सत्याग्रह है! कह दो तुम इनसे कि तुम मुझे मुझसे भी ज्यादा प्यार करती हो! 

अब तुम अपने मन को शान्त करो| बुरे स्वप्न की तरह भूल जाओ इस बात को और अच्छे की कल्पना करो| अब कोई उलझन आए तो प्रेम भैया से सलाह करना - एक भाई की तरह नही, एक मित्र की तरह| मुझे उस पर पूरा विश्वास है| 

र वीणा भाभी के लिए चिन्ता मत करो| वह मेरी-तुम्हारी हम सबकी आदरणीय हैं| उसे अपना जीवन जिस तरह अच्छा लगेगा मैं यथायोग्य सहायता करुँगा| कल ही देव के कालेज के कुछ साथी आए थे| भाभी को देव के बदले कोई न कोई नौकरी मिल जाएगी और इससे उनका मन बहल जाएगा| हाँ एक बात और मैंने जो पहले तुमसे कभी नही की| मैने जबसे महसूस किया था कि देव अब नही बचेगा, तभी से सोच था कि भाभी को जब भी उसका मन ठीक हो जाएगा, मैं स्वयं उत्साहित करुँगा, स्वयं कोशिश करुँगा उनके लिए कोई बेहतर "वर" ढूँढने के लिए| लेकिन यह सब करने का अभी समय नही आया| अभी समय है उन्हें उनकी भावनाओं को कहीं ठेस न लगे और उन्हें कहीं यह न महसूस हो कि उन्हें असहाय जानकर सब उन पर अपनी इच्छा लादना चाह रहे है| 

आशा है मेरी भावनाओं को तुम समझ गई होगी और तुम सदा की तरह मेरा साथ दोगी| अब मुझे तुम्हारे पहले जैसे पत्रों की प्रतीक्षा रहेगी| 

अपने प्यार के साथ
सिर्फ तुम्हारा
अमित" 
 

अमित ने अपना लिखा पत्र एक बार फिर पढा और पत्र अच्छी तरह से बन्द करके नवीन भाई साहब को दे दिया, जो कि प्रिया के पड़ोसी थे और प्रिया व अन्य सभी उन्हें अपने बड़े भाई की तरह मानते थे| 

पत्र देने के बाद अमित को प्रिया के पत्र की प्रतीक्षा थी| उसका दिल डर रहा था किसी अनहोनी को| सच, दो दिल दूर हो तो छोटी-सी शंका का निवारण होने में कुछ पल नहीं कई दिन लग जाते हैं और ऐसे में पल-पल युग के समान लगता है| 

 

प्रिया को पत्र मिला| पढ़कर समझ गई कि भावनाओं के आवेश में उसने मन में आई बात तो लिख दी थी लेकिन उसने मम्मी और उसके बीच हुई बात का खुलासा नहीं किया था| यही कारण था कि अमित मम्मी से नाराज हो गया था| ऐसे में प्रिया के पास पत्र लिखने के अतिरिक्त कोई और साधन नहीं था| वह अमित को पत्र लिखने बैठ गईः- 

 
"मेरे प्रिय अमित, 

नवीन भाई साहब द्वारा तुम्हारा पत्र मिला| अमित बहुत नाराज हो न तुम मम्मी से| लेकिन तुम गलत समझ रहे हो और बेवजह तुम मम्मी से रुष्ट हो गए| मम्मी ने मुझसे कुछ नहीं कहा और न ही मुझ पर किसी तरह का दवाब डाला बल्कि वह तो इस पक्ष में बिल्कुल भी नहीं हैं| 

तुमने मम्मी को कसम दी थी कि वह मुझे इस विषय में कुछ न बताएँ और सच, मम्मी मुझे कुछ बताना भी नहीं चाहती थीं| वास्तव में मैं कमरे में आँखें बन्द करके लेटी हुई थी| मम्मी ने समझा की मैं सो रही हूँ| तब वह थापा आँटी से बात कर रही थीं कि मोहन भैया तो स्वयं प्रिया से पूछने के लिए देहरादून आने को तैयार हो गए थे| अमित बहुत रोया| यह सुनकर मै एकदम बैठ गई और मम्मी से पूछा कि क्यों रोया था अमित? मुझसे क्या पूछने के लिए आ रहे थे मोहन भैया? और फिर मैने बहुत जिद्द की तब मम्मी ने मुझे सब कुछ बता दिया| सब सुनते-सुनते मैं रोने लगी। तब मम्मी ने कहा, बेटा ऐसा कभी सम्भव नही हो सकता| अगर तुम दोनों मान भी जाते हो तो वीणा कभी क्या इस बात को मानेगी? लेकिन यह सब सुनकर मेरे तुम्हारे भैया-भाभी के प्रति आदर भावना बढ गई है कि वे दीदी के लिए इतना कुछ सोच सकते हैं तो आगे भी उनके लिए कुछ न कुछ करने को तत्पर रहेंगे| अमित जो तुमने लिखा कि ऐसा सब मम्मी व सुनीता दीदी के मन में भी था, ऐसा नहीं है| यह बात तो तुम्हारे ही घर से शुरु हुई थी| और जब मुझे कहा गया कि अमित भी तैयार हो गया था मेरी राय जानना चाहता था, तभी मैने तुम्हें लिख दिया था कि तुम अपना निर्णय लेने कि लिए स्वतन्ञ हो| अमित मैंने तुम्हें गलत नही समझा| 
मैं बहुत परेशान हो गई थी ये सब सुनकर| मम्मी से और कुछ नही पूछा, स्वयं ही मेरे मन में बहुत से विचार आने लगे थे| सब दीदी के लिए कुछ करना चाहते है, सभी उसे सुखी देखना चाहते है तब मैं रोड़ा क्यों बनूँ? तब मन में उनकी भावनाओं के विषय में कोई बात नहीं आई थी| व्यक्ति बहुत अधिक भावुक हो जाता है तब एक तरफा बात ही सोचता है| 
अब सब ठीक है अमित| बस, अब हमें विश्वास होना चाहिए कि हम एक-दूसरे को चाहते हैंऔर चाहते रहेंगे सदा, दुनियाँ में कोई ताकत हमें एक-दूसरे से अलग नही कर सकती| हम सब दीवारों को तोड़ कर मिलेंगे| हाँ, अमित मैं तुम्हारा हमेशा साथ दूँगी| दुःख मे, सुख में, जीने में, मरने में| अमित प्रिया तुमसे अलग नहीं| ये बात सदा याद रखना| 

अमित, आजकल मुझे कुछ अच्छा नही लगता| अपना मन थोड़ा दूसरी ओर लगाने के लिए मैंने पेंटिंग कोर्स मे प्रवेश ले लिया है| घर पर बैठ कर तो बस पिछली बातें घूमती रहती है| रह-रह कर वीणा दीदी का चेहरा, आँसूओं से भरी आँखें| कितना अन्याय हुआ है उसके साथ| विधवा का कलंक लगा दिया उसके साथ, जबकि उसको जान-बूझ कर विधवा बनाया गया है| उसकी शादी के समय सब अन्जाम से वाफिक थे| जो-जो जानते थे सब चुपचाप देखते रहे एक मासूम पर अन्याय होते हुए| अब सहानुभूति से क्या होगा? उसका जो खो चुका है अब उसे नही मिल सकता| किसी की हमदर्दी उसका घाव नही भर सकती| दुःख सभी को है, पर सभी भूल जाएँगे कुछ समय पश्चात्| कुछ समय पश्चात् सभी की दिनचर्या वैसी ही हो जाएगी जैसी थी| लेकिन वीणा दीदी का दुःख - सूनापन जिन्दगी भर का है| 

अमित आजकल हम सभी की और सबसे अधिक मम्मी की दशा बड़ी सोचनीय हो रही है| घर पर सभी जान-पहचान वाले आते रहते हैं और सौ तरह के प्रश्न करते हैं| जैसे कि कैंसर इतनी जल्दी तो नही फैल जाता| उन्हें बहुत पहले से पता होगा| और भी न जाने क्या-क्या तर्क करते हैं| अब कौन उन्हें सारी बातें विस्तार से बताए! बस, चुप होकर रह जाते है| अमित तुम्हारे परिवार वाले बड़े मजे से कहते हैं कि हमने तो शादी से पहले अखबार में छपवाया था, सारा कुछ विस्तार से बताया था| लेकिन सच्चाई अब सभी जानते हैं| वीणा दीदी में ऐसी क्या बुराई थी जो हमने सब कुछ जानते हुए उसकी शादी कर दी| तुम्हारे रिश्तेदार भी यही सोचते होंगे कि हमने जानबूझ कर उन्हें गर्त में धकेल दिया| अमित, मैं ये सब नही लिखना चाहती थी लेकिन लोगों की बात सुन-सुनकर कभी-कभी बहुत रोष आता है और तब दिल करता है कि जोर-जोर से चिल्ला कर कहूँ कि हमारे साथ धोखा हुआ है| एक अन्याय हुआ है किसी की जिन्दगी पर| पर अब क्या फायदा? तुम बुरा मत मानना, इन सब बातों का तुमसे कोई सम्बन्ध नही और न ही तुम्हारा कोई दोष है| और तुमने हमेशा उनके साथ अच्छा ही किया है| यह सब लिख कर मैं अपना मन हल्का कर रही हूँ| अमित, आज मैं कितनी स्वार्थी हो गई हूँ जो कि अपने मन को हल्का करने के लिए तुम्हारे दिल को दुःखा रही हूँ| अमित अपने मन में आई हर बात तुम्हें बताने से मुझे शान्ति मिलती है| अमित! अब तुम अपने मन को शान्त कर लो। मम्मी वास्तव में तुम्हें बहुत चाहती है| घर भर में सब तुम्हारा आदर करते है और मम्मी तो अभी भी कह रही हैं कि कुछ दिन बाद तुम स्वयं वीणा दीदी को लेकर देहरादून चले आना| कुछ दिन यहाँ रह लोगे तो तुम्हारा मन शान्त हो जाएगा| 

इसी के साथ

अपने प्यार के साथ 
तुम्हारी प्रिया."